- केदारनाथ धाम में वर्ष 2013 में चोराबाड़ी ग्लेशियर टूटने से भीषण सैलाब आया था.
- सैलाब के बाद मंदाकिनी नदी में भयंकर बाढ़ और भूस्खलन के कारण हजारों लोगों की जान चली गई.
- NDTV की टीम ने 3600 मीटर की ऊंचाई पर चोराबाड़ी ग्लेशियर के पास जाकर तबाही के निशान देखे.
केदारनाथ धाम में साल 2013 में आए भीषण सैलाब को सालों बाद भी भला कौन भूल सका है. इस त्रासदी ने पूरे केदारनाथ धाम में तबाही मचा दी थी. उस तबाही को करीब 13 साल का लंबा वक्त बीत चुका है, बावजूद इसके तबाही के निशान आज भी जस के तस हैं. एनडीटीवी की टीम उस जगह पर पहुंची, जहां सालों पहले यह सैलाब आया था. केदारनाथ धाम से ऊपर चोराबाड़ी ग्लेशियर है, जिसकी ऊंचाई समुद्र तल से करीब 3800 मीटर है. एनडीटीवी की टीम करीब 3600 मीटर की ऊंचाई पर पहुंची. इस ऊंचाई से साफ नजर आता है कि कैसे वह सैलाब ऊपर से नीचे की ओर आया और दो हिस्सों में बढ़ते हुए केदारनाथ धाम तक पहुंचा.
केदारनाथ धाम में 16-17 जून 2013 की रात को यह भीषण आपदा आई. भारी बारिश के कारण चोराबाड़ी झील (गांधी सरोवर) पर बना ग्लेशियर टूट गया और मंदाकिनी नदी में आई भयंकर बाढ़ और भूस्खलन ने भारी तबाही मचाई, जिसमें हजारों लोगों की जान चली गई थी. उस मंजर को जिसने भी देखा उसे अपनी आंखों पर एक बार तो यकीन ही नहीं हुआ.

केदारनाथ धाम में तबाही के निशान
साल 2013 में आई उस त्रासदी के 13 साल बाद भले ही केदारनाथ धाम नया रूप ले रहा है, लेकिन आज भी कई ऐसी जगह हैं, जहां पर तबाही के निशान बाकी हैं. उस वक्त चोराबाड़ी झील मौजूद थी, जिस पर एक ग्लेशियर का बहुत बड़ा हिस्सा टूटकर गिरा और जिसकी वजह से यह सैलाब आया.
एनडीटीवी की टीम केदारनाथ धाम से पैदल चोराबाड़ी ग्लेशियर के बेहद नजदीक पहुंची. यह स्थान समुद्र तल से करीब 3600 मीटर की ऊंचाई पर है. उस दिन झील का पानी एक ओर से तेजी से बहने लगा और अपने साथ बड़े-बड़े पत्थरों और मलबे को लेकर नीचे की ओर बहुत ही तेजी से पहुंचा. उस सैलाब के निशान आज भी साफ देखे जा सकते हैं. उस जगह की गहराई करीब 60 से 80 मीटर की और चौड़ाई करीब 100 से 120 मीटर की हैण्

इसलिए कहा जाता है 'गांधी सरोवर'
केदारनाथ धाम के पीछे मेरु और सुमेर दो पर्वत हैं. केदारनाथ धाम के पीछे ही चोराबाड़ी ग्लेशियर और कैंपेनिंग ग्लेशियर मौजूद है. चोराबाड़ी ग्लेशियर में बनी चोराबाड़ी झील है. पुराणों में मान्यता है कि इस झील को प्राचीन काल में ऋषियों द्वारा ध्यान स्थल के रूप में उपयोग किया जाता था और इसे 'कांति सरोवर' कहा जाता था. यही नही वर्तमान में इसको गांधी सरोवर भी कहा जाता है. इसकी वजह है कि 1948 में महात्मा गांधी की अस्थियों को इस झील में विसर्जित किया गया था, जिसके बाद से इसे 'गांधी सरोवर' कहा जाने लगा.
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