भारत समेत दुनियाभर में जलवायु परिवर्तन तेजी से हो रहा है और उसका असर मौसम पर भी दिखाई दे रहा है. वनस्पतियां भी इसके असर से अछूती नहीं हैं. आमतौर पर वसंत ऋतु की फरवरी-मार्च में खिलने वाला पहाड़ी पुष्प बुरांश इस बार जनवरी महीने में ही खिल गया, जिसने आम लोगों के साथ पर्यावरणविदों और विशेषज्ञों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है.
जलवायु परिवर्तन से हो रहीं समस्याएं
वैसे तो जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान की वजह से समय पर बारिश और बर्फबारी नहीं हो रही है. जलवायु परिवर्तन की वजह से यह सभी समस्याएं देखी जा रही हैं. दिसंबर 2025 भी बिना बारिश के गुजरा और जनवरी 2026 आधा गुजर चुका है, लेकिन बारिश और बर्फबारी नही हुई है. नतीजन, उत्तराखंड के जोशीमठ, यमनोत्री, रुद्रप्रयाग के ऊखीमठ के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बुरांश के वृक्षों में फूल खिलने लग गए हैं. वैसे यह फूल वसंत ऋतु में फरवरी और मार्च के महीने में खिलते हैं.
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बुरांश वृक्ष के फूल की खासियत
बुरांश का पेड़ उत्तराखंड का राज्य वृक्ष भी है. उत्तराखंड के कई ऊंचाई वाले हिस्सों में 1500 से 4000 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में इसका वृक्ष होता है, जिस पर फूल खिलता है, जो फरवरी के मिड और मार्च में आता है. बुरांश के वृक्ष पर लाल, गुलाबी, सफेद रंगों में फूल मिलता है और इसके फूलों से शरबत, चटनी बनती है, जो ठंडक और स्वास्थ्य लाभ देती है. सेहत के लिए यह बुरांश का फूल बेहद उपयोगी है. हृदय, लिवर, त्वचा रोगों और एनीमिया में यह फायदेमंद है साथ ही एंटीऑक्सीडेंट गुणों से भरपूर होता है.
फूल जल्दी खिलने से क्या नुकसान?
अब जानिए बुरांश का फूल जल्दी खिलने से क्या नुकसान हो सकता है? प्रोफेसर और पर्यावरणविद् एसपी सती बताते हैं, "जिस साल बारिश कम होती है. सर्दियों के मौसम में उस साल बुरांश का फूल अक्सर पहले ही खिल जाता है. इस वृक्ष और फूल का एक नेचर है और वह जलवायु के मुताबिक ही अपने आप को ढालता है, लेकिन यह कभी-कभी होता है. अक्सर इस तरह की घटनाएं सामने देखने को नहीं मिलती हैं."
दूसरी तरफ, इसके आर्थिक और सामाजिक प्रभाव भी हैं. उत्तराखंड के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बुरांश के फूल से लोगों की आर्थिकी की भी जुड़ी हुई है. अगर फूल समय पर पहले खिलता है तो उसकी गुणवत्ता और उसमें जो रस की मात्रा होनी चाहिए उसमें भी कमी आएगी, जिससे बुरांस के जूस और उससे बनने वाले अन्य उत्पाद की क्वालिटी पर भी असर आएगा.
स्थानीय विषयों के जानकार क्रांति भट्ट ने बताया कि, "मौसम का यह बदला हुआ स्वरूप सभी को आश्चर्य में डाल रहा है. समय पर बर्फ न गिरना और बुरांश का समय से पहले खिलना जलवायु परिवर्तन के गंभीर संकेत है. अगर मौसम का यही मिजाज बना रहा तो इसका असर खेती, जल स्रोतों और जैव विविधता पर भी देखने को मिल सकता है."
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