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योगी कैबिनेट का विस्तार है यूपी 2027 के चुनाव से पहले बड़ा संदेश

योगी सरकार के कैबिनेट विस्तार को 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बड़े सियासी संदेश के तौर पर देखा जा रहा है. इसमें जातीय और क्षेत्रीय संतुलन साधने के साथ महिलाओं, अति पिछड़ों और दलितों को प्रतिनिधित्व देकर बीजेपी सोशल इंजीनियरिंग को मजबूत करने की कोशिश करती दिख रही है, ताकि चुनाव से पहले सत्ता विरोधी लहर को कम किया जा सके.

उत्तर प्रदेश सीएम योगी आदित्यनाथ
  • यूपी चुनाव से पहले योगी सरकार ने कैबिनेट विस्तार कर विभिन्न जाति और क्षेत्रीय समूहों को प्रतिनिधित्व दिया
  • ब्राह्मण, जाट, गुर्जर, दलित-पासी, लोधी, अति पिछड़े वर्ग के नेताओं को मंत्री बना सामाजिक संतुलन बनाने का प्रयास
  • कैबिनेट विस्तार के पीछे बंगाल मॉडल की तर्ज पर महिलाओं, अति पिछड़ों और क्षेत्रीय पहचान को महत्व देना रणनीति

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार का अपने दूसरे कार्यकाल में दूसरा और संभवत अंतिम कैबिनेट विस्तार किया गया है. अगले साल फरवरी में होने वाले विधानसभा चुनाव से महज कुछ ही महीने पहले हुए इस विस्तार में कई राजनीतिक संदेश देने के प्रयास किए गए हैं. नाराज जातियों को खुश करने से लेकर क्षेत्रीय संतुलन बैठाना और दलबदलुओं को जगह देकर दूसरी पार्टियों के नेताओं को लुभाने जैसे संदेश निकल कर आ रहे हैं. पश्चिम बंगाल की प्रचंड जीत के बाद महिलाएं और अति पिछड़ों की लामबंदी के हिट फार्मूले को बीजेपी यूपी में भी लागू करना चाह रही है. ब्राह्मण, जाट, गुर्जर, लोध, पासवान, अति पिछड़े वर्ग को नुमाइंदगी देकर बीजेपी ने चुनाव से पहले सोशल रिसेट किया है.

यह कैबिनेट विस्तार लंबे समय से लटका हुआ था. कई बार कैबिनेट विस्तार की चर्चा चली, लेकिन किसी न किसी कारणवश यह नहीं हो सका. अटकलें लगाई गईं कि शायद लखनऊ और दिल्ली के बीच सब कुछ ठीक नहीं है और इसी कारण कैबिनेट विस्तार में देरी हो रही है. लेकिन पार्टी सूत्र इससे साफ इनकार करते हैं. उनके मुताबिक पूरी ऊर्जा पश्चिम बंगाल और असम को जीतने में लगाई गई थी इसलिए चाहे बिहार हो या यूपी, दोनों जगह कैबिनेट विस्तार पांच राज्यों के चुनाव परिणाम आने के बाद ही करने का फैसला किया गया था. यह जरूर है कि चुनाव के दौरान ही योगी कैबिनेट के विस्तार का होमवर्क पूरा कर लिया गया था. राष्ट्रीय महासचिव विनोद तावड़े ने लखनऊ के अपने दौरे में ग्राउंड वर्क पूरा किया. इसी तरह आरएसएस के नेताओं के साथ लखनऊ में बैठक में भी इस पर मंथन किया गया था. बीजेपी नेताओं के अनुसार जल्दी ही नए अध्यक्ष पंकज चौधरी की टीम का गठन भी कर दिया जाएगा ताकि कैबिनेट और संगठन दोनों के पुनर्गठन से मिशन 2027 के लिए कमर कस कर तैयार हो सकें.

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Photo Credit: IANS

सोशल इंजीनियरिंग

आज के विस्तार के जरिए योगी सरकार ने समाज के कई तबकों को बड़ा संदेश दे दिया है. कई मुद्दों पर योगी सरकार से नाराज हो रहे ब्राह्मण समाज से मनोज पांडेय को मंत्री बना कर बीजेपी ने उन्हें लुभाने का प्रयास किया है. बीजेपी को लगता है कि उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक हों या फिर मनोज पांडेय और ऐसे ही अन्य नेता, इन्हें सरकार और संगठन में महत्व देकर ब्राह्मणों को मजबूत संदेश दिया जा सकता है जो यूजीसी गाइडलाइंस और ऐसे ही कई अन्य मुद्दों को लेकर बीजेपी से नाराज चल रहे हैं. इसी तरह भूपेंद्र चौधरी को पश्चिमी यूपी के जाट प्रतिनिधित्व के रूप में, सोमेंद्र तोमर को गुर्जर, कृष्णा पासवान को दलित-पासी समाज के लिए और सुरेंद्र दिलेर को वाल्मीकि समुदाय के लिए आगे बढ़ाया जा रहा है. वहीं लोधी और विश्वकर्मा जैसे पिछड़े और अति पिछड़े समूहों पर भी फोकस दिख रहा है.

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राजनीतिक रूप से इसका सबसे बड़ा संदेश यह है कि बीजेपी अब “सिर्फ़ गैर-यादव OBC” की राजनीति से आगे बढ़कर “माइक्रो सोशल ब्लॉक्स” पर काम कर रही है. 2024 लोकसभा चुनाव में यूपी में बीजेपी को जिन इलाकों और जातियों में नुकसान हुआ था, पार्टी अब उसी गैप को भरने की कोशिश कर रही है.  पश्चिम यूपी में जाट समीकरण लोकसभा में पूरी तरह स्थिर नहीं दिखे थे. इसी तरह मायावती के कमजोर से होने से दलित वोट का एक हिस्सा समाजवादी पार्टी की ओर गया था. अखिलेश यादव ने पीडीए के जरिए अति पिछड़ी जातियों को भी साथ जोड़ा था. इसलिए इस विस्तार के जरिए इन सभी तबकों को संदेश दिया जा रहा है कि सत्ता में उनकी हिस्सेदारी है.

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मिशन 2027

यूपी में बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत अभी भी योगी आदित्यनाथ की व्यक्तिगत छवि, कानून-व्यवस्था और कल्याणकारी योजनाएँ हैं. लेकिन अब पार्टी समझ रही है कि केवल केंद्रीय योजनाएँ और हिंदुत्व पर्याप्त नहीं होंगे; सामाजिक प्रतिनिधित्व भी उतना ही अहम है. यहीं पर बंगाल मॉडल की चर्चा महत्वपूर्ण हो जाती है. पश्चिम बंगाल में बीजेपी की हालिया सफलता के बाद पार्टी के भीतर यह धारणा मजबूत हुई है कि महिलाओं, अति पिछड़ों, दलितों और क्षेत्रीय पहचान को साथ लेकर चलने वाला मॉडल अधिक प्रभावी है. बंगाल की नई बीजेपी सरकार में महिला, मतुआ, आदिवासी, ओबीसी और क्षेत्रीय संतुलन को विशेष महत्व दिया गया है.

यूपी में उसी मॉडल को तीन स्तरों पर लागू करने की तैयारी दिख रही है. सबसे पहले महिला वोट बैंक. बीजेपी ने पिछले कुछ वर्षों में यूपी में महिला मतदाताओं के बीच मजबूत आधार बनाया है. उज्ज्वला, आवास, शौचालय, राशन और “लाभार्थी महिला” मॉडल को अब राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जोड़ने की कोशिश होगी. इसलिए कैबिनेट में महिला चेहरों को महत्व देना केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि चुनावी रणनीति का हिस्सा है. दूसरा है अति पिछड़ा वर्ग पर फोकस. बंगाल में बीजेपी को जिन समुदायों से समर्थन मिला, उनमें वे समूह प्रमुख थे जो खुद को मुख्यधारा की ओबीसी राजनीति में उपेक्षित मानते थे. यूपी में भी बीजेपी निषाद, मौर्य, कुशवाहा, विश्वकर्मा, प्रजापति, लोधी, पाल, बिंद जैसे समूहों पर फोकस बढ़ा रही है. इसका उद्देश्य सपा की मुस्लिम-यादव राजनीति के मुकाबले “बहुस्तरीय OBC गठबंधन” तैयार करना है.

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तीसरा है क्षेत्रीय संतुलन साधना. यूपी में पश्चिम, बुंदेलखंड, अवध, पूर्वांचल और केंद्रीय यूपी के संतुलन पर ध्यान दिया जा रहा है. पूर्वांचल से प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, प्रदेश अध्यक्ष और कई वरिष्ठ मंत्री आते हैं. ऐसे में इस बार अवध और पश्चिम का प्रतिनिधित्व बढ़ाया गया है. पश्चिमी यूपी (जाट-गुर्जर), पूर्वांचल (राजभर-निषाद) और मध्य यूपी (कुर्मी-पाल) के नेताओं को जगह देकर हर क्षेत्र के वोट बैंक को जोड़ने की कोशिश है.

एक और दिलचस्प पहलू यह है कि बीजेपी अब “सॉफ्ट सोशल इंजीनियरिंग और हार्ड हिंदुत्व” का मिश्रण बना रही है. इसे मंडल और कमंडल का मेल कहा जा रहा है. यानी योगी मॉडल की कानून-व्यवस्था और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की छवि बनी रहेगी, लेकिन उसके साथ सामाजिक प्रतिनिधित्व और लाभार्थी राजनीति को और आक्रामक तरीके से जोड़ा जाएगा.

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एंटी इंकम्बेंसी का मुकाबला

उत्तर प्रदेश में बीजेपी 2017 से लगातार सत्ता में है. उसने दो लोक सभा और दो विधानसभा के चुनाव लगातार जीते लेकिन पिछले लोक सभा चुनाव में उसे झटका लगा था. इसके पीछे एक बड़ा कारण अधिकांश सांसदों को दोबारा टिकट देना भी बताया गया था. बीजेपी हेट्रिक लगाने के लिए मैदान में उतर रही है जो कि राज्य की राजनीति और इतिहास के हिसाब से बहुत बड़ी चुनौती है. ऐसे में इस विस्तार का एक उद्देश्य सत्ता विरोधी लहर को कम करना भी है. नए चेहरों को शामिल कर पार्टी जनता को यह संदेश देना चाहती है कि वह बदलाव और नई ऊर्जा के लिए तैयार है. यह विस्तार 2027 के राज्य चुनावों के लिए 'लॉन्चपैड' का काम करेगा. बीजेपी चुनाव से पहले गुटबाजी और नाराजगी को बढ़ावा नहीं देना चाहती. इसीलिए किसी मौजूदा मंत्री को नहीं हटाया गया. इसी तरह पंचायत चुनाव भी टाल दिए गए थे ताकि स्थानीय स्तर पर गुटबाजी होने से विधानसभा चुनाव में नुकसान न हो. दूसरे दलों से आए नेताओं को मंत्री बना कर बीजेपी विपक्षी दलों के उन नेताओं को भी संदेश दे रही है जो चुनाव से पहले पाला बदलने का मन बना रहे हैं.

हालांकि नए मंत्रियों के पास कुछ करके दिखाने के लिए अधिक समय नहीं है. लेकिन जैसा कि खुद कैलाश राजपूत ने कहा कि वे लोध राजपूतों में घूम-घूम कर बताएंगे कि कैसे बीजेपी ने नुमाइंदगी दी है, यह स्पष्ट है कि नए मंत्रियों के लिए प्रशासन से अधिक राजनीतिक संदेश पहुंचाने की जिम्मेदारी है.
इस विस्तार के बाद योगी कैबिनेट अधिकतम 60 के आंकड़े पर पहुंच गई है. यानी अब कोई जगह खाली नहीं बची. हालांकि यह विस्तार केवल मंत्रियों की संख्या बढ़ाना नहीं है, बल्कि 2027 की सत्ता की चाबी माना जा रहा है. भाजपा अति-पिछड़ों को 'हिस्सेदारी' और महिलाओं को 'नेतृत्व' देकर विपक्षी एकता के जातिगत दांव को कमजोर करने की कोशिश कर रही है.

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