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सैयद सोहेल शो: योगी-अखिलेश को ओवैसी का चुनावी चैलेंज, बोले- गढ़ छोड़कर मैदान में आइए, AIMIM हरा देगी

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले असदुद्दीन ओवैसी ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और सपा प्रमुख अखिलेश यादव को खुली चुनौती देकर सियासी माहौल गरमा दिया है. 

असदुद्दीन ओवैसी ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और सपा प्रमुख अखिलेश यादव को खुली चुनौती दी है.

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अब करीब छह महीने का समय बचा है. ऐसे में AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने राज्य के दो बड़े नेताओं, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव, को खुली चुनौती देकर सियासी बहस छेड़ दी है. राजनीतिक जानकार इसे चुनावी माहौल में खुद को और अपनी पार्टी को चर्चा के केंद्र में लाने की कोशिश के तौर पर देख रहे हैं.

योगी को संभल से चुनाव लड़ने की चुनौती

ओवैसी ने कहा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अपने पारंपरिक गढ़ गोरखपुर की बजाय संभल से विधानसभा चुनाव लड़ना चाहिए. उन्होंने दावा किया कि यदि योगी संभल से चुनाव लड़ते हैं तो AIMIM का उम्मीदवार उन्हें हरा देगा.

संभल को मुस्लिम बहुल जिला माना जाता है और यहां समाजवादी पार्टी का प्रभाव भी मजबूत रहा है. ओवैसी को उम्मीद है कि इस क्षेत्र में उनकी पार्टी मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ बना सकती है.

अखिलेश को गोरखपुर आने का न्योता

ओवैसी ने सिर्फ योगी को ही नहीं बल्कि अखिलेश यादव को भी चुनौती दी. उन्होंने कहा कि अखिलेश को गोरखपुर से चुनाव लड़ना चाहिए. फिलहाल अखिलेश यादव कन्नौज से सांसद हैं और विधानसभा के सदस्य नहीं हैं.

ओवैसी का मानना है कि जिस तरह उन्होंने योगी को संभल जाने की चुनौती दी है, उसी तरह अखिलेश को भी गोरखपुर जाकर राजनीतिक ताकत दिखानी चाहिए. उन्होंने दावा किया कि AIMIM दोनों नेताओं को चुनाव में चुनौती देने की क्षमता रखती है.

गोरखपुर में बीजेपी का मजबूत किला

गोरखपुर लंबे समय से बीजेपी का मजबूत गढ़ माना जाता है. 2022 विधानसभा चुनाव में जिले की सभी नौ विधानसभा सीटों पर बीजेपी ने जीत दर्ज की थी. गोरखपुर सदर सीट से खुद योगी आदित्यनाथ विधायक हैं. गोरखनाथ मठ के प्रभाव और संगठनात्मक ताकत के चलते यहां बीजेपी की मजबूत पकड़ मानी जाती है.

संभल और गोरखपुर की सियासी गणित

राजनीतिक नजरिए से देखें तो संभल और गोरखपुर की सामाजिक और चुनावी तस्वीर काफी अलग है. संभल में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या अधिक मानी जाती है, जबकि गोरखपुर में उनका अनुपात अपेक्षाकृत कम है. ऐसे में ओवैसी की चुनौती सिर्फ चुनाव लड़ने की नहीं बल्कि दोनों नेताओं को अपने मजबूत क्षेत्रों से बाहर निकलकर मुकाबला करने की भी है.

यूपी चुनाव नजदीक आते ही राजनीतिक दलों के बीच बयानबाजी तेज हो गई है. ओवैसी की इस चुनौती के बाद अब नजर इस बात पर रहेगी कि बीजेपी और समाजवादी पार्टी की ओर से इसका क्या जवाब दिया जाता है.

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