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सामाजिक समरसता है समाज में एकता का आधार, लखनऊ में बोले RSS प्रमुख मोहन भागवत

सरसंघचालक ने कहा कि भारत एक दिन ग्लोबल साउथ का नेतृत्व करेगा. टैरिफ वार से हमारा कुछ नहीं बिगड़ेगा. हम किसी देश से नहीं दबेंगे, खड़े रहेंगे. कुछ दिन बाद सबकुछ सामान्य हो जाएगा. भारत की अर्थव्यवस्था पूंजीपतियों और बैंको में हाथों में नहीं, हमारे घरों मे है. भारत के पास इतना सामर्थ्य है कि वह दबाव सहन करके भी आगे बढ़ सकता हैं.

सामाजिक समरसता है समाज में एकता का आधार, लखनऊ में बोले RSS प्रमुख मोहन भागवत
मोहन भागवत ने लखनऊ में दिया बड़ा बयान
NDTV
  • RSS प्रमुख डॉ मोहन भागवत ने हिन्दू धर्म को सच्चा मानव धर्म बताते हुए सामाजिक समरसता पर जोर दिया
  • डॉ भागवत ने परिवारों में धर्म शिक्षा और परंपराओं के महत्व को बताया तथा संयुक्त परिवारों के टूटने पर चिंता जताई
  • संघ द्वारा पांच हजार गांवों के विकास का कार्य किया गया है जहां शिक्षा, भूमि वितरण और रोजगार जैसे सुधार हुए हैं
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लखनऊ:

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघ चालक डॉ मोहन भागवत लखनऊ में एक जनगोष्ठी को संबोधित किया. इस खास मौके पर मोहन भागवत ने कहा कि हिन्दू धर्म ही सच्चा मानव धर्म है. दुनिया मे पंथ निरपेक्षता वाला कोई समाज है तो वह हिन्दू समाज है. संघ का काम देश के लिए है. अनेक जाति, पंथ संप्रदाय बताने से अच्छा है कि हम सब अपनी पहचान हिन्दू माने. सामाजिक समरसता समाज मे एकता का आधार है. ये बातें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघ चालक डॉ मोहन भागवत ने बुधवार को प्रमुख जन गोष्ठी में कहीं. उन्होंने कहा कि जाति, भाषा की पहचान महत्वपूर्ण नहीं हैं. हम सब हिन्दू हैं यह भाव रखना होगा. जाति नाम की व्यवस्था धीरे-धीरे जा रही है. तरुण पीढ़ी के आचरण में यह दिख रहा है. संघ में किसी की जाति नहीं पूछी जाती है. सब हिन्दू सहोदर हैं, इस भाव से काम करते हैं. समाज से जाति को मिटाने के लिए जाति को भुलाना होगा. समाज में जिस दिन जाति-पाति को महत्व नहीं मिलेगा, उस दिन जाति पर राजनीति करने वाले नेता भी बदल जाएंगे. 

बच्चों को पहले घर में धर्म की शिक्षा दें

मोहन भागवत ने कहा कि दूर-दूर रहने वाले परिवार भावनात्मक रूप से जुड़े रह सकते हैं. हमें अपने बच्चों को नाते रिश्तेदारों, संबंधियों से मिलाते रहना चाहिए. परिवारों को वर्ष मे एक बार कुल परंपरा परिवार के संस्कार के निर्वहन के लिए एकत्रित होना चाहिए. इससे परिवारों में पीढ़ियों का जुड़ाव बना रहता है. एक अच्छे परिवार से अच्छे समाज का निर्माण होता है. उन्होंने संयुक्त परिवारों में हो रहे विघटन के संदर्भ में कहा कि आधुनिकता हमारी रगों में है लेकिन हम पश्चिमीकरण के विरोधी हैं. हम अपने बच्चों को पहले घर मे ही धर्म की शिक्षा दें. धन का प्रदर्शन करने की परंपरा हमारी नहीं रही है. संयुक्त परिवार में संस्कारों का वास होता है. 

भक्तों के हाथ में होना चाहिए मंदिरों का नियंत्रण 

RSS प्रमुख ने आगे कहा कि मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराने के सवाल पर सरसंघचालक ने कहा कि हम भी यह चाहते हैं कि मंदिरों का नियंत्रण भक्तों के हाथों में हो. धर्माचार्य और सज्जन लोग मिलकर मंदिरों का संचालन करें. लेकिन इसके लिए हमें तैयारी करनी होगी. विश्व हिन्दू परिषद इस दिशा में काम कर रहा है. मंदिरों का पैसा राष्ट्रहित व हिन्दू कल्याण में लगना चाहिए. 

व्यक्ति निर्माण करता है संघ 

संघ व्यक्ति का निर्माण करता है. संघ की कार्यपद्धति में देने की बात है,लेने की नहीं. इसलिए हमारे समर्पित कार्यकर्ताओं मे निराशा नहीं आती. अपने प्रयासों से अनेक गांवों को विकसित करने का काम संघ ने हाथ में लिया है. देश में पाँच हजार गांवों को संघ ने विकास के लिए चयनित किया है. जिसमें से 333 गाँव अच्छे बन गए हैं. ऐसे गांवों में जहां कुछ नही था, वहां ग्राम वासियों ने 12वीं तक विद्यालय बना दिये. गाँव में कोई मुकदमा नहीं हैं. भूमिहीन किसानों को भूमि मिली है. गांव में ही रोजगार सृजित किया है. इससे गांव के किसानों की उन्नति हुई है.

हम किसी देश से नहीं दबेंगे 

एक सवाल के जवाब में सरसंघचालक ने कहा कि भारत एक दिन ग्लोबल साउथ का नेतृत्व करेगा. टैरिफ वार से हमारा कुछ नहीं बिगड़ेगा. हम किसी देश से नहीं दबेंगे, खड़े रहेंगे. कुछ दिन बाद सबकुछ सामान्य हो जाएगा. भारत की अर्थव्यवस्था पूंजीपतियों और बैंको में हाथों में नहीं, हमारे घरों मे है. भारत के पास इतना सामर्थ्य है कि वह दबाव सहन करके भी आगे बढ़ सकता हैं. उन्होंने सज्जन शक्ति से आह्वान किया कि उन्हें किसी न किसी समाज परिवर्तन के प्रकल्प से जुड़कर काम करना चाहिए. उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को जानने के लिए संघ की शाखा में आएं और संघ को जाने. संघ की शाखा में आना संभव न हो तो संघ से जुड़े कार्यक्रमों में आएं. अगर यह भी संभव नहीं हो सकता है, तो वे किसी न किसी सामाजिक गतिविधि से जुड़े.

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