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राम मंदिर ट्रस्ट कर रहा था भर्ती, किसी योग्यता की जरूरत नहीं: ड्राइवर बना खजांची, सफाईकर्मी बने कैशियर

राम मंदिर ट्रस्ट के गठन के बाद से ही पर्दे के पीछे बैकडोर एंट्री का एक बड़ा सिंडिकेट काम कर रहा था. मंदिर के बेहद संवेदनशील वित्तीय कामकाज और करोड़ों रुपये की नकदी संभालने की जिम्मेदारी ऐसे लोगों को सौंप दी गई, जिनकी एकमात्र योग्यता ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और अन्य प्रभावशाली पदाधिकारियों का करीबी होना था.

राम मंदिर ट्रस्ट कर रहा था भर्ती, किसी योग्यता की जरूरत नहीं: ड्राइवर बना खजांची, सफाईकर्मी बने कैशियर

अयोध्या के भव्य राम मंदिर में रोजाना देश-विदेश से आने वाले हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का चढ़ावा पहुंच रहा है, लेकिन इसी के  आड़ में एक ऐसा खेल चल रहा था जिसने सबको हैरान कर दिया है. दरअसल राम मंदिर ट्रस्ट के गठन के बाद से ही पर्दे के पीछे बैकडोर एंट्री का एक बड़ा सिंडिकेट काम कर रहा था. मंदिर के बेहद संवेदनशील वित्तीय कामकाज और करोड़ों रुपये की नकदी संभालने की जिम्मेदारी ऐसे लोगों को सौंप दी गई, जिनकी एकमात्र योग्यता ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और अन्य प्रभावशाली पदाधिकारियों का करीबी होना था. बिना किसी पुलिस वेरिफिकेशन या जरूरी शैक्षणिक योग्यता के हुई इन भर्तियों ने धीरे-धीरे एक बड़े चंदा चोरी घोटाले का रूप ले लिया है, जिसमें रसूखदारों के ड्राइवर से लेकर उनके रिश्तेदारों तक के नाम सामने आ रहे हैं.

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चंपत राय के ड्राइवर और साले का रसूख

इस पूरे घोटाले के केंद्र में मुख्य आरोपी लवकुश मिश्रा और उसका साला अनुकल्प मिश्रा शामिल हैं.लवकुश मिश्रा की असल पृष्ठभूमि बेहद सामान्य थी और वह ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय के ड्राइवर के तौर पर काम करता था.

इसी करीबी और भरोसे का फायदा उठाकर लवकुश ने न सिर्फ ट्रस्ट के भीतर अपनी गहरी पैठ बनाई, बल्कि अपने साले अनुकल्प मिश्रा को भी इस सिस्टम का हिस्सा बना दिया. ड्राइवर से सीधे मंदिर के चढ़ावे और बैंक प्रबंधन से जुड़े संवेदनशील कार्यों में दखल पाने वाले लवकुश और अनुकल्प ने चंद दिनों में ही लाखों-करोड़ों की बेनामी संपत्ति खड़ी कर ली.

अनुकल्प मिश्रा ने जहां अयोध्या के सबसे पॉश इलाके कौशलपुरी में एक आलीशान मकान खरीद लिया, वहीं लवकुश ने सोहावल तहसील के बनबीरपुर गांव में अपनी पत्नी सुप्रिया के नाम पर करीब 30 लाख रुपये का अवैध प्लॉट खरीदकर मकान बनवाना शुरू कर दिया, जिसकी सरकारी कीमत महज 8 लाख 80 हजार रुपये थी. अब इन दोनों की अवैध संपत्तियों पर अयोध्या विकास प्राधिकरण बुलडोजर चलाने की तैयारी कर रहा है.

गोपाल राव और अनिल मिश्रा की 'करतूतें' और बैकग्राउंड 

ट्रस्ट के भीतर सिंडिकेट को मजबूती देने में डॉ.अनिल मिश्रा और गोपाल राव की भूमिका भी सवालों के घेरे में है. होम्योपैथिक चिकित्सक रहे डॉ. अनिल मिश्रा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के अवध प्रांत के प्रांत कार्यवाह रह चुके हैं और राम मंदिर आंदोलन से लंबे समय से जुड़े रहने के कारण उन्हें ट्रस्ट का सदस्य बनाया गया था. वहीं गोपाल राव भी संघ के बड़े चेहरों में शामिल रहे हैं और ट्रस्ट के कामकाज को देख रहे थे. आरोप है कि इन दोनों रसूखदार चेहरों की छत्रछाया में ही चंदा चोरी का यह पूरा नेटवर्क फल-फूल रहा था.

मंदिर के पूर्व कर्मचारियों ने चौंकाने वाले खुलासे करते हुए  NDTV को बताया कि अनिल मिश्रा और गोपाल राव की सीधी सिफारिशों पर ही कई ऐसे लोगों को सीधे कैश काउंटर और वित्तीय प्रबंधन में एंट्री दी गई थी, जिनका कोई क्रेडेंशियल चेक नहीं हुआ था.

पूर्व कर्मचारियों का दावा है कि जब भी किसी ने इस सिंडिकेट और इन पदाधिकारियों की करतूतों के खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश की, उसे नौकरी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया.
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राम मंदिर में नौकरी के नाम पर रिश्वत का बड़ा खेल

इस मामले में एक और बेहद सनसनीखेज मोड़ आ गया है. मंदिर के भीतर केवल चढ़ावे की चोरी ही नहीं हो रही थी, बल्कि वहां नौकरियां देने के नाम पर भी भारी वसूली का खेल चल रहा था. शुरुआती जांच और खुलासों में यह बात सामने आई है कि राम मंदिर में अलग-अलग पदों पर भर्ती कराने के बहाने करीब 125 कर्मचारियों से मोटी रिश्वत ली गई थी. इन बेरोजगारों से लाखों रुपये ऐंठकर उन्हें ट्रस्ट के प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए अंदर एंट्री दिलाई गई. रिश्वत देकर आए इन कर्मचारियों का एकमात्र मकसद किसी भी तरह मंदिर के खजाने और चढ़ावे तक पहुंच बनाना था, ताकि दी गई रिश्वत की रकम को कई गुना बढ़ाकर वसूला जा सके. इस बड़े रैकेट के उजागर होने के बाद अब पूरी भर्ती प्रक्रिया ही संदेह के घेरे में आ गई है.

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मुख्य आरोपी टिन्नू यादव पर मेहरबानी

इस घोटाले की परतें तब और गहरी हो गईं जब मामले के मुख्य आरोपी टिन्नू यादव को लेकर खुद चंपत राय का रुख सामने आया. शुरुआत में जब टिन्नू यादव पर चंदा चोरी और वित्तीय अनियमितताओं के गंभीर आरोप लगे, तब चंपत राय ने संगठनात्मक रसूख के दबाव में उसे क्लीन चिट देते हुए उसका बचाव करने की पुरजोर कोशिश की थी.ट्रस्ट के शीर्ष नेतृत्व द्वारा आरोपियों को बचाने के इस रवैये ने ही इस पूरे सिंडिकेट के हौसले बुलंद किए, जिससे मंदिर परिसर के भीतर ही एक समानांतर अवैध व्यवस्था खड़ी हो गई.

हाउस कीपिंग स्टाफ से कराया पैसे गिनने का काम

इस खेल में केवल रसूखदार ही नहीं, बल्कि बैंक और आउटसोर्सिंग एजेंसियां भी गंभीर सवालों के घेरे में हैं. राम मंदिर में आने वाले चढ़ावे को सुरक्षित रूप से बैंक तक पहुंचाने के लिए अयोध्या के तुलसी नगर स्थित स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) ने वाराणसी की 'सैनिक सिक्योरिटी सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड' के साथ एक करार किया था. इस एजेंसी का काम केवल 'हाउस कीपिंग' यानी साफ-सफाई के लिए कर्मचारी देना था.

एजेंसी ने बैंक की सिफारिश और ट्रस्ट के अंदरूनी दबाव में 22 कर्मचारियों को काम पर रखा. नियमों को पूरी तरह ताक पर रखकर, इन सफाईकर्मियों को सीधे मंदिर का चढ़ावा और नकदी गिनने के बेहद संवेदनशील काम पर लगा दिया गया.

इन कर्मचारियों का कोई बैकग्राउंड चेक या वेरिफिकेशन नहीं किया गया था, जिसका फायदा उठाकर साले-बहनोई के इस सिंडिकेट ने चढ़ावे की रकम को धीरे-धीरे अपनी जेबों में भरना शुरू कर दिया.
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जांच के बीच एजेंसी और ट्रस्ट की रहस्यमयी चुप्पी

इतने बड़े चंदा और चढ़ावा चोरी विवाद के सामने आने के बाद भी संबंधित आउटसोर्सिंग एजेंसी और ट्रस्ट के बड़े पदाधिकारी पूरी तरह चुप्पी साधे बैठे हैं. इस पूरे मामले में अंदरूनी मिलीभगत साफ नजर आ रही है क्योंकि बिना किसी उच्च प्रशासनिक रसूख या चंपत राय जैसे प्रभावशाली लोगों की मौन सहमति के, किसी ड्राइवर और सामान्य हाउस कीपिंग स्टाफ को सीधे गर्भगृह और लॉकर के पैसों को संभालने की इजाजत मिलना मुमकिन नहीं था. फिलहाल पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है और अयोध्या विकास प्राधिकरण इन आरोपियों की अवैध संपत्तियों का सर्वे कर चालानी कार्रवाई करने जा रहा है ताकि एक कड़ा संदेश दिया जा सके.
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