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पुलिस सोशल मीडिया में छाने के लिए कर रही एनकाउंटर, मार रही पैरों के नीचे गोली - जानिये HC ने ये बड़ी बात क्यों कह दी 

मामले के अनुसार जेल में बंद आवेदक राजू उर्फ राजकुमार ने अपने खिलाफ अगस्त 2025 में मिर्जापुर के कोतवाली देहात थाने में चोरी के दर्ज मामले में ट्रायल के दौरान जमानत देने की मांग करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट में जमानत याचिका दाखिल की थी.

पुलिस सोशल मीडिया में छाने के लिए कर रही एनकाउंटर, मार रही पैरों के नीचे गोली - जानिये HC ने ये बड़ी बात क्यों कह दी 
  • HC ने यूपी पुलिस द्वारा आरोपियों के पैर में गोली मारकर एनकाउंटर बताने की प्रवृत्ति पर कड़ी नाराज़गी व्यक्त की
  • कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के PUCL मामले के निर्देशों का पालन न करने पर पुलिस को सख्त चेतावनी दी है
  • पुलिस एनकाउंटर में घायल व्यक्ति का बयान मजिस्ट्रेट या मेडिकल अधिकारी के सामने दर्ज करना अनिवार्य किया गया है
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प्रयागराज:

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा आरोपियों को उनके पैर में गोली मारने और फिर इन घटनाओं को एनकाउंटर बताने के बढ़ते चलन पर गंभीर चिंता जताते हुए कड़ी नाराज़गी व्यक्त की है. कोर्ट ने यूपी पुलिस की इस कार्यप्रणाली पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि कोर्ट के सामने कई ऐसे मामले आए है जिसमें प्रथम दृष्टया यह पता चलता है कि कुछ पुलिस अधिकारी जो पुलिस एनकाउंटर में शामिल पुलिस टीम का हिस्सा थे वो सिर्फ़ समय से पहले प्रमोशन पाने या बड़े अधिकारियों से तारीफ़ पाने या सोशल मीडिया पर मशहूर होने के लिए बेवजह हथियार का इस्तेमाल करते है और आरोपी के घुटने के ठीक नीचे पैर में गोली मार देते है.

कोर्ट ने कहा कि ऐसा काम कानून की नज़र में मंज़ूर नहीं है क्योंकि आरोपी को सज़ा देने का अधिकार न्यायपालिका के पास है, पुलिस के पास नहीं. भारत एक लोकतांत्रिक देश है. इसे भारत के संविधान के मूल्यों और निर्देशों के अनुसार चलाया जाना चाहिए जो विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की भूमिकाओं को साफ़ तौर पर अलग करता है. तारीफ़ पाने या दूसरे मकसदों के लिए पुलिस अधिकारियों को बेवजह गोली चलाकर और शरीर के गैर-ज़रूरी हिस्से पर भी चोट पहुंचाकर किसी अपराधी को सज़ा देने का न्यायपालिका का काम करने की इजाज़त नहीं दी जा सकती. कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा PUCL के मामले में जारी गाइडलाइंस का पालन पुलिस को करने का सख्त आदेश दिया है. यह आदेश जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की सिंगल बेंच ने राजू उर्फ राजकुमार की जमानत अर्जी को सशर्त मंजूर करते हुए दिया है. 

मामले के अनुसार जेल में बंद आवेदक राजू उर्फ राजकुमार ने अपने खिलाफ अगस्त 2025 में मिर्जापुर के कोतवाली देहात थाने में चोरी के दर्ज मामले में ट्रायल के दौरान जमानत देने की मांग करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट में जमानत याचिका दाखिल की थी. पुलिस ने आवेदक राजू को मुठभेड़ के दौरान गिरफ्तार कर जेल भेजा था. इस दौरान उसको पुलिस की गोली भी लगी थी. सुनवाई के दौरान FIR को देखने पर कोर्ट ने पाया कि यह मामला एक पुलिस एनकाउंटर से जुड़ा है जिसमें आवेदक को गंभीर चोटें आई थी. इसके बाद 13 जनवरी 2026 के आदेश के ज़रिए कोर्ट ने सरकारी वकील को 2014 के पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ (PUCL) और अन्य बनाम महाराष्ट्र स्टेट के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पालन में निर्देश लेने का निर्देश दिया था. खासकर इस बारे में कि क्या पुलिस एनकाउंटर के संबंध में कोई FIR दर्ज की गई और क्या घायल व्यक्ति का बयान किसी मजिस्ट्रेट या किसी मेडिकल अधिकारी के सामने दर्ज किया गया.

शुक्रवार को सरकारी वकील ने कोर्ट को बताया कि ऐसे निर्देश पेश किए जिनसे पता चलता है कि पुलिस मुठभेड़ के संबंध में पुलिस स्टेशन लालगंज, जिला मिर्जापुर में केस क्राइम नंबर 343/2025 के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी. हालांकि, यह स्वीकार किया गया कि घायल का बयान न तो मजिस्ट्रेट के सामने और न ही किसी मेडिकल ऑफिसर द्वारा दर्ज किया गया था. इसके अलावा पुलिस मुठभेड़ की घटना की एफआईआर में जांच अधिकारी को सब-इंस्पेक्टर के रूप में दिखाया गया था. हालांकि कोर्ट को बताया गया कि बाद में इस मामले में एक इंस्पेक्टर को जांच अधिकारी नियुक्त किया गया. कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ (PUCL) और अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी निर्देशों को देखने से यह साफ़ है कि अगर किसी पुलिस एनकाउंटर में आरोपी को गंभीर चोटें आती है तो तुरंत FIR दर्ज की जानी चाहिए. 

और जांच या तो CBCID या किसी दूसरे पुलिस स्टेशन की पुलिस द्वारा की जानी चाहिए और किसी भी हाल में एनकाउंटर में शामिल पुलिस पार्टी के मुखिया से सीनियर रैंक के पुलिस अधिकारी द्वारा की जानी चाहिए. आवेदक को अधिवक्ता कुसुम मिश्रा ने कोर्ट में दलील दी कि आवेदक राजू को झूठे मामले में फंसाया गया. कथित पुलिस मुठभेड़ में सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों का पालन नहीं किया गया है. 28 जनवरी को कोर्ट ने इसे गंभीरता से लेते हुए अपर गृह सचिव संजय प्रसाद और डीजीपी राजीव कृष्णा को वीडियो कान्फ्रेंसिंग के जरिए 30 जनवरी को तलब कर जवाब भी मांगा था.

शुक्रवार को दोनों अधिकारी वीसी के जरिए कोर्ट में पेश हुए और दोनों ने कोर्ट को बताया कि DGP द्वारा एक अगस्त 2017 और 11 अक्टूबर 2024 को जारी किए गए सर्कुलर को पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) और अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का पालन करने के लिए जारी किया गया था पुलिस एनकाउंटर के संबंध में जिसमें मौत या गंभीर चोटें लगी थी. हालांकि दोनों अधिकारियों ने यह समझाने की कोशिश की कि PUCL के मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का काफी हद तक पालन किया जा रहा है. जब उन्हें इस मामले के साथ-साथ जुड़े हुए मामलों के तथ्यों से अवगत कराया गया तो वे इस बात से इनकार नहीं कर सके कि PUCL के मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का कई पुलिस अधिकारियों द्वारा काफी हद तक पालन नहीं किया जा रहा है.

हालांकि बार-बार सर्कुलर जारी किए गए है. दोनों अधिकारियों ने कोर्ट को आश्वासन दिया कि वो सभी पुलिस अधिकारियों को पुलिस एनकाउंटर के संबंध में PUCL के मामले में जारी निर्देशों का सख्ती से पालन करने के लिए नए निर्देश जारी करेंगे. उन्होंने कोर्ट को यह भी आश्वासन दिया कि जब भी जरूरत होगी वो मामले को देखेंगे और यदि कोई अधिकारी सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन करने में लापरवाह पाया जाता है जिसमें आरोपी की पुलिस एनकाउंटर में मौत या गंभीर चोटें लगी है तो उसके साथ सख्ती से निपटा जाएगा.

कोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा PUCL मामले का हवाला देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी किए गए निर्देशों से यह साफ है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 141 के अनुसार ये निर्देश देश का कानून हैं और पुलिस को इनका अनिवार्य रूप से पालन करना होगा और यह हाईकोर्ट के साथ-साथ डिस्ट्रिक्ट कोर्ट का भी कर्तव्य है कि वो सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करें. भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और स्वतंत्रता की सुरक्षा देता है जिसमें गरिमा भी शामिल है. कोर्ट ने आवेदक राजू उर्फ राज कुमार की जमानत याचिका को मंजूर कर लिया. कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले कर जोर देते हुए पुलिस एनकाउंटर में आरोपी को गंभीर चोट लगने से संबंधित कुछ गाइडलाइंस भी पुलिस अधिकारियों को जारी की है जो इस प्रकार है:–

अगर किसी जानकारी के आधार पर पुलिस मौके पर पहुँचती है और मुठभेड़ होती है जिसमें पुलिस पार्टी द्वारा हथियार का इस्तेमाल किया जाता है और इसके परिणामस्वरूप आरोपी या किसी अन्य व्यक्ति को गंभीर चोट लगती है तो इस संबंध में एक FIR उसी पुलिस स्टेशन या पास के पुलिस स्टेशन में पुलिस मुठभेड़ में शामिल पुलिस के प्रमुख द्वारा दर्ज की जाएगी लेकिन उस FIR की जाँच CBCID या किसी अन्य पुलिस स्टेशन की पुलिस टीम द्वारा एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की देखरेख में की जाएगी जो पुलिस मुठभेड़ में शामिल पुलिस पार्टी के प्रमुख से कम से कम एक स्तर ऊपर हो.

  • FIR में एनकाउंटर में शामिल पुलिस पार्टी के सदस्यों का नाम आरोपी/संदिग्ध की कैटेगरी में लिखना ज़रूरी नहीं है बल्कि सिर्फ़ टीम का नाम लिखा जा सकता है चाहे वह STF हो या रेगुलर पुलिस.
  • घायल अपराधी/पीड़ित को मेडिकल सहायता दी जानी चाहिए और उसकी चोट की जांच की जानी चाहिए. उसके बाद उसका बयान मजिस्ट्रेट या मेडिकल ऑफिसर द्वारा घायल व्यक्ति के फिटनेस सर्टिफिकेट के साथ रिकॉर्ड किया जाना चाहिए.
  • पुलिस एनकाउंटर की घटना की पूरी जांच के बाद रिपोर्ट सक्षम कोर्ट को भेजी जानी चाहिए जो PUCL के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले में बताए गए प्रोसीजर का पालन करेगा.
  • पुलिस एनकाउंटर होने के तुरंत बाद पुलिस पार्टी के ऑफिसर को आउट ऑफ टर्न प्रमोशन या गैलेंट्री अवॉर्ड नहीं दिया जाएगा. यह पक्का किया जाना चाहिए कि ऐसा इनाम तभी दिया जाए या रिकमेंड किया जाए जब पुलिस हेड द्वारा बनाई गई एक कमेटी द्वारा व्यक्ति की बहादुरी का इनाम बिना किसी शक के साबित हो जाए.
  • अगर पुलिस एनकाउंटर में घायल व्यक्ति के परिवार को लगता है कि ऊपर बताए गए प्रोसीजर का पालन नहीं किया गया है या स्वतंत्र जांच की कमी है या किसी भी अधिकारी द्वारा दुर्व्यवहार या पक्षपात का पैटर्न मौजूद है तो वो उस जगह के सेशंस जज से शिकायत कर सकता है जिसके अधिकार क्षेत्र में पुलिस एनकाउंटर की घटना हुई है. शिकायत मिलने पर संबंधित सेशंस जज शिकायत की मेरिट देखेंगे और उसमें बताई गई शिकायत का समाधान करेंगे.

कोर्ट ने पुलिस को चेतावनी देते हुए कहा है कि जारी की गई गाइडलाइंस और पुलिस महानिदेशक के आश्वासन को देखते हुए आदेश दिया जाता है कि अगर यह पाया गया कि किसी भी जिले में पुलिस अधिकारी ने PUCL केस में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पुलिस एनकाउंटर के संबंध में दिए गए दिशानिर्देशों का पालन नहीं किया है जिसमें मौत या गंभीर चोट लगी हो तो न केवल पुलिस टीम का नेतृत्व करने वाला व्यक्ति, बल्कि जिला पुलिस प्रमुख, चाहे वह SP/SSP/कमिश्नरेट पुलिस हो वो पुलिस विभाग द्वारा शुरू की गई अनुशासनात्मक कार्यवाही के अलावा कोर्ट की अवमानना के लिए भी ज़िम्मेदार होगा.

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