Muharram Date: इस्लामी कैलेंडर के पहले महीने मुहर्रम का चांद बुधवार की शाम नजर आते ही इस्लामी नए साल की शुरुआत हो गई है. इसकी पुष्टि शिया और सुन्नी समाज की तरफ से भी कर दी गई है. मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली और शिया धर्मगुरु सैफ अब्बास ने मोहर्रम के आगाज को लेकर अपने बयान जारी किए और शांतिपूर्ण माहौल में मातम और जुलूस निकालने की अपील जनता से की. इसके साथ ही लखनऊ में 17 से पहली शाही जुलूस की शुरुआत होगी.
दरअसल, मुहर्रम का महीना इस्लाम धर्म के मानने वालों के बीच काफी महत्व रखता है. इस्लाम के धर्म में 10वीं मुहर्रम को यौम-ए-आशूरा कहा जाता है. दरअसल, आशूरा अरबी शब्द 'अशरा' से बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ 'दसवां' होता है. इस्लाम में इस दिन का बहुत अधिक ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व है, जिसे मुस्लिम जगत के अलग-अलग संप्रदाय अलग रूप में मनाते हैं. सुन्नी मुस्लिम इस दिन और इसके अगले या पिछले यानी 9-10 या 10-11 मुहर्रम को पैगंबर हज़रत मूसा (PBUH) और उनके अनुयायियों को मिस्र के राजा फिरौन से मिली आजादी की याद में शुक्राने के तौर पर रोज़ा रखते हैं.

10 मुहर्रम को मुसलमान इस वजह से रखते हैं रोजा
खुद पैगंबर मुहम्मद (PBUH) ने इस दिन रोजा रखने के लिए कहा था. छपरौली स्थित नूर मस्जिद के इमाम और खतीब मौलाना जियाउद्दीन हुसैनी ने बताया कि हदीस में आता है कि जब पैगंबर हजरत मुहम्मद (PBUH) जब मक्का से मदीना पहुंचे, तो मदीना के यहूदियों को 10 मुहर्रम को रोजा रखते देखा, तो इसकी वजह पूछी, तो बताया गया कि इसी दिन हजरत मूसा (PBUH) को मिस्र के जालिम बादशाह फिरौन से आजादी मिली थी. ये सुनने के बाद पैगंबर मुहम्मद (PBUH) ने फरमाया कि हजरत मूसा तो यहूदियों से ज्यादा मुझ से करीब है. लिहाजा, अगर हम जिंदा रहे, तो अगले वर्ष से हम एक की जगह दो रोजे रखेंगे. लिहाजा, मुसलमान इन दो दिनों का रोजा रखते हैं और अल्लाह की इबादत करते हैं.
आशूरा के दिन ही हुई थी इमाम हुसैन की शहादत
इस दिन की अहमियत इस वजह से भी है, क्योंकि इसी दिन पैगंबर मुहम्मद (PBUH) के नवासे (नाती) हजरत इमाम हुसैन को एक जालिम मुसलमान बादशाह यजीद के सेनापतियों ने इराक के कर्बला के मैदान में उनके परिवार और सगे संबंधियों समेत 72 लोगों को शहीद कर दिया गया. दरअसल, इमाम हुसैन ने इस जालिम बादशाह की बादशाहत को कबूल करने के बजाए, शहादत को कबूल कर लिया था. इसी से प्रभावित होकर मुसलमान जालियों के सामने निहत्थे होकर भी डट जाते हैं और अपनी जान तो दे देते हैं, लेकिन लगत को स्वीकार नहीं करते हैं. हाल में अमेरिका-इजरायल और ईरान युद्ध में ईरान ने इसी डॉक्ट्रिन पर अमल शुरू कर दुश्मन देशों के छक्के छुड़ा दिए.
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इस दिन ईमान हुसैन की शहादत की वजह से मुसलमानों के एक बड़े समूह इस दुखद घटना की याद में शोक मनाते हैं और मातमी जुलूस निकालते हैं. इस दौरान लोगों को जगह-जगह शरबत और खाने पीने के चीजों के लंगर लगाए जाते हैं. इस दौरान लोगों को बिना किसी धर्म और जाति के भेद के सभी को खाने-पीने के सामान दिए जाते हैं. इस मौके पर देश के कुछ इलाकों में ताजिए भी निकाले जाते हैं. हालांकि, ताजिए का इस्लाम धर्म से कोई संबंध नहीं है. यह विशुद्ध रूप से एक भारतीय परंपरा है, जिसकी शुरुआत भारत के शिया मुस्लिम शासक तैमूर लंग के वक्त हुई थी. दरअसल, तैमूर हर साल मुहर्रम के महीने में इराक के कर्बला स्थित इमाम हुसैन के मजार पर जाया करते थे, लेकिन बुढ़ापे में जब उन्हें दिल की बीमारी हो गई, तो हकीमों ने उन्हें घोड़े की सवारी करने से मना कर दिया. इसकी वजह से जब पहली बार वह कर्बला नहीं जा पाए, तो उनके सिपहसालारों ने इमाम हुसैन के कर्बला स्थित मकबरा की आकृति का बांसों की खिमचियों, कपड़ों व कागजों से बनाकर हवेली में रख दी. इसके बाद देखते ही देखते ये परंपरा पूरे देश में फैल गई. इस तरह से पूरी भारतीय उपमहाद्वीप (भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान और म्यांमार) में ये परंपरा शुरू हो गई.
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