संत रविदास जयंती: यूपी में दलितों को साधने का बड़ा अभियान क्यों छेड़ रही BJP? कल वाराणसी से शंखनाद
बीजेपी संत रविदास जी महाराज की जन्मस्थली वाराणसी के सीरगोवर्धनपुर से उनकी पवित्र जन्मभूमि की मिट्टी 131 कलशों में भर यूपी समेत दूसरे राज्यों तक पहुंचाएगी.
उत्तर प्रदेश चुनाव को लेकर बीजेपी ने अभी से अपनी तैयारियां शुरू कर दी है. अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर पार्टी जातीय समीकरण साधने में जुट चुकी है. भारतीय जनता पार्टी संत शिरोमणि गुरु रविदास जी महाराज की 650वीं जयंती को भव्य अंदाज में मनाने जा रही है, सात महीने तक मुहिम चला बड़ा संदेश देने की तैयारी है.
बीजेपी संत रविदास जी महाराज की जन्मस्थली वाराणसी के सीरगोवर्धनपुर से उनकी पवित्र जन्मभूमि की मिट्टी 131 कलशों में भर यूपी समेत दूसरे राज्यों तक पहुंचाएगी. फिर वहां उन कलशों का पूजन होगा और सामाजिक समरसता और मानवता का संदेश दिया जाएगा. बीजेपी इस कार्यक्रम को 29 जुलाई को शुरू करेगी और अगले साल 20 फरवरी तक जारी रखने वाली है.
अब बीजेपी अभी के लिए इस कार्यक्रम को किसी भी तरह चुनाव से जोड़कर नहीं दिखाना चाहती है. लेकिन जानकार मानते हैं कि उत्तर प्रदेश की एक बड़ी दलित आबादी को साधने के लिए पार्टी को इस रणनीति को अपनाना पड़ा है. जानकारी के लिए बता दें कि उत्तर प्रदेश में 22 फीसदी दलित आबादी है जो सभी राजनीतिक दलों के लिए मायने रखती है. मायावती इसी दलित वोटबैंक के सहारे चार बार सीएम की कुर्सी तक पहुंची हैं. ऐसे में अगर बसपा का जनाधार 2027 के यूपी चुनाव में और ज्यादा बिखरता है तो बीजेपी इसका फायदा उठाना चाहती है.
पिछले चुनावों में किसे मिला दलित वोट?
2012 के यूपी विधानसभा चुनाव की बात करें तो तब जाटव वोट तो बसपा की तरफ रहा था. सीएसडीएस लोकनीति के पोस्ट पोल एनालिसिस के मुताबिक बसपा को 62 फीसदी जाटव वोट मिला था. समाजवादी पार्टी को 15 फीसदी मिला था और बीजेपी को सिर्फ 5 फीसदी. अगर गैर जाटव वोटों की बात करें तो यहां भी बसपा का दबदबा रहा था, उसे 45 फीसदी वोट मिले थे. सपा को 18 प्रतिशत वोट मिले थे और बीजेपी को 11 फीसदी. 2017 के यूपी चुनाव पर आए तो तस्वीर पूरी तरह बदल गई थी. जाटव वोटों में जरूर बसपा की पकड़ मजबूत रही, लेकिन गैर जाटव वोटों में बीजेपी ने बड़ी सेंधमारी की.
2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी को जाटव के 87 फीसदी वोट मिले थे, बीजेपी को 8 फीसदी और सपा को 3 फीसदी के करीब. लोकनीति सर्वे के मुताबिक गैर जाटव वोटों में एक बड़ा शिफ्ट देखने को मिला था. बसपा को अगर 44 प्रतिशत वोट मिला था तो बीजेपी को भी 32 फीसदी हासिल हुआ था. सपा को उस चुनाव में गैर जाटव का 24 फीसदी के करीब वोट मिला था.
अगर पिछले विधानसभा चुनाव की बात करें तो यहां भी बसपा का जनाधार गिरा और बीजेपी को सीधा फायदा पहुंचा. इस चुनाव में बसपा को तो 65 फीसदी जाटव वोट मिला तो वहीं बीजेपी को भी 21 फीसदी हासिल हुआ. बात अगर गैर-एसी की करें तो यहां भी बीजेपी को बड़ी बढ़त मिली और उसने अपने खाते में 41 फीसदी वोट लिए, बसपा का आंकड़ा सिमटकर 27 फीसदी रह गया.
अब आगामी यूपी चुनाव में फिर दलितों पर सभी दलों का फोकस शिफ्ट हुआ है। उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों की बात करें तो दलितों का प्रभाव काफी ज्यादा रहता है, 84 सीटें तो उनके लिए आरक्षित हैं. इसके अलावा भी 150 के करीब सीटों पर दलितों की उपस्थिति निर्णायक साबित होती है. पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी और उसके सहयोगी दलों ने मिलकर 63 अनुसूचित जाति वाली सीटें अपने नाम की थी, तब सपा गठबंधन को सिर्फ 20 सीटें मिली थी. पश्चिमी UP, बुंदेलखंड और पूर्वी यूपी कुछ ऐसी बेल्ट हैं जहां दलित वोटों का प्रभाव सबसे ज्यादा रहता है.
अखिलेश का पीडीए फॉर्मूला
सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने भी पीडीए फॉर्मूले के जरिए खुद को यूपी की राजनीति में फिर मजबूत करने की कवायद की है. उनकी तरफ से 2024 में इसी प्रयोग के जरिए बीजेपी को बड़ा नुकसान पहुंचाया गया है. पीडीए के जरिए पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रही है.
अखिलेश यादव के विनिंग फार्मूले 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) से 2024 में बीजेपी मात खा चुकी है. यूपी की 80 लोकसभा सीट में से सपा 37 सीटें जीती तो बीजेपी 33 सीट पर सिमट गई थी. इसका ही नतीजा था कि बीजेपी बहुमत के आंकड़े से दूर रह गई और सहयोगी दलों के सहारे केंद्र में सरकार बनानी पड़ी. अखिलेश यादव अपने इस फार्मूले को विस्तार देना चाहते हैं तो सपा ने उसे काउंटर करने की रणनीति बनाई है. मुस्लिम यादव समीकरण से आगे बढ़ने के लिए अखिलेश यादव इस रणनीति पर आगे बढ़ रहे हैं. बताया तो यह भी जा रहा है कि इस बार 100 के करीब सामान्य सीटों पर भी सपा दलित प्रताशियों को मौका दे सकती है.
बीजेपी कैसे जीतेगी दलितों का दिल?
सपा की इस बदलती रणनीति की वजह से भी बीजेपी को दलित वोटरों पर अपना फोकस शिफ्ट करना पड़ा है. एक तरफ पार्टी रविदास जयंती को भव्य तरीके से मना रही है, इसके अलावा उसने दलित अस्मिता और सामाजिक न्याय से जुड़े महापुरुषों का सम्मान कर भी बड़ा सियासी संदेश देने का प्रयास किया है. इस साल 6 अप्रैल से लेकर 14 अप्रैल के बीच भी अंबेडकर जयंती पर बीजेपी ने कई कार्यक्रम आयोजित किए थे. इसके अलावा सीएम योगी आदित्यनाथ ने जिस तरह से आंबेडकर की मूर्तियों पर छतरी निर्माण का ऐलान किया है, इसे भी उसी कवायद से जोड़कर देखा जा रहा है. जानकार मानते हैं कि बीजेपी दलित मसीहाओं का सम्मान कर उन्हें अपने राष्ट्रवाद और विकास की राजनीति के साथ जोड़ना चाहती है. ऐसा होने से बसपा का मजबूत वोटबैंक भी बिखरेगा और सपा का पीडीए फॉर्मूला भी जमीन पर कम प्रभावी दिखेगा.
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