इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महिला सीनियर सिटीजन की तरफ से दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार से पूछा है कि क्या राज्य सरकार ने वरिष्ठ नागरिकों और माता–पिता की सुरक्षा के लिए बने माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 (The Maintenance & Welfare of Parents and Senior Citizens Act, 2007) की धारा 22 (2) के तहत कोई व्यापक एक्शन प्लान अभी तक तैयार किया है. इसके लिए कोर्ट ने सरकार से एक्शन प्लान का स्टेट्स मांगा है. कोर्ट ने इस एक्ट पर विचार करते हुए कहा है कि क्या स्पेशल कानून को लागू करने के लिए कुछ गाइडलाइंस स्थाई रूप से तय की जा सकती है. कोर्ट ने इस बात को साफ़ करने के लिए यूपी के प्रिंसिपल सेक्रेटरी गृह को इस बारे में एक एफिडेविट फाइल करने को कहा है जिसमें ये जानकारी दी गई हो कि जिलाधिकारी द्वारा वरिष्ठ नागरिकों खासकर जो कमज़ोर हालत में है उनकी जान और प्रॉपर्टी की सुरक्षा के लिए क्या एक्शन ले सकते है. यह आदेश जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की डिवीजन बेंच ने याची गुलाब कली की याचिका पर दिया है.
मामले के अनुसार प्रयागराज के हंडिया तहसील के उतरांव थाना क्षेत्र की रहने वाली याचिकाकर्ता गुलाब कली एक 80 साल की सीनियर सिटिज़न है और सेहत ठीक नहीं रहती है. याचिका में कहा गया कि वो अपनी दो पोतियों के साथ अकेली रहती है जिनमें से एक दिव्यांग है. घर में उनको सहारा देने, बचाने या मदद करने के लिए कोई और पुरुष सदस्य नहीं है.
हालांकि, उन्हें डर है कि याचिका में बताए गए कुछ लोग उन्हें गैर-कानूनी तरीके से उनके घर से बेदखल करने और उनकी पुश्तैनी आबादी की ज़मीन पर कब्ज़ा करने के लिए ज़बरदस्ती कर सकते है. इसलिए याची गुलाब कली ने मुख्य रूप से किसी प्राइवेट व्यक्ति के एक्शन से प्रोटेक्शन के लिए ये याचिका इलाहाबाद हाईकोर्ट में दायर की.
कोर्ट ने वृद्ध महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि आम तौर पर कोर्ट ऐसे मामले में दखल नहीं देगा जहाँ दो प्राइवेट पार्टियों के बीच सिविल झगड़ा हो. हालांकि फैक्ट्स और स्पेशल कानून (मेंटेनेंस एंड वेलफेयर ऑफ़ पेरेंट्स एंड सीनियर सिटिज़न्स एक्ट, 2007) के होने को देखते हुए कोर्ट इस केस की और गहराई से जांच करना ज़रूरी समझता है ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या स्पेशल कानून को लागू करने के लिए कुछ गाइडलाइंस स्थाई रूप से तय की जा सकती है क्योंकि कोर्ट के सामने ऐसे कई केस आ रहे हैं जो सीनियर सिटिज़न्स ने फाइल किए है. उनकी प्रॉपर्टीज़ पर प्राइवेट पार्टियों द्वारा कब्ज़ा करने या पूरी तरह से कब्ज़ा करने का खतरा है.
कोर्ट ने कहा है कि हमने स्पेशल एक्ट के परिभाषा खंड को देखा है और पाया है कि मेंटेनेंस में सीनियर सिटिज़न को खाना, कपड़े, रहने की जगह और मेडिकल अटेंडेंस और ट्रीटमेंट देना भी शामिल है. इस एक्ट के तहत एक ट्रिब्यूनल है जिसे सीनियर सिटिज़न की शिकायतों पर विचार करने का अधिकार है. हालांकि कोर्ट को पार्टियों ने बताया है कि यूपी में आज तक ऐसा कोई ट्रिब्यूनल नहीं बनाया गया है. सुनवाई के दौरान सरकारी वकील ने कोर्ट का ध्यान स्पेशल एक्ट के सेक्शन 22 की ओर दिलाया जिसमें राज्य के उन अधिकारियों का ज़िक्र है जिन्हें एक्ट के नियमों को लागू करने का अधिकार दिया गया है.
सेक्शन 22 (1) के तहत डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट को इस एक्ट के नियमों को लागू करने का अधिकार होगा बशर्ते राज्य उन्हें ऐसी शक्तियां दे. कहा गया कि एक्ट के सेक्शन 22(2) के तहत राज्य पर यह ज़िम्मेदारी है कि वह सीनियर सिटिज़न्स की जान और प्रॉपर्टी की सुरक्षा के लिए एक पूरा एक्शन प्लान बनाए. एक्ट का सेक्शन 32 राज्य सरकार को नियम बनाने का अधिकार देता है.
कोर्ट ने कहा कि ऐसा लगता है कि एक्ट के सेक्शन 32 के तहत अधिकार का इस्तेमाल करके नियम बनाए गए है और माता-पिता और सीनियर सिटिज़न्स के मेंटेनेंस और वेलफेयर रूल्स, 2014 और इन रूल्स के रूल 21 में साफ़ तौर पर यह ज़रूरी है कि डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट सीनियर सिटिज़न्स की जान और प्रॉपर्टी की सुरक्षा पक्की करने के लिए काम करेंगे ताकि वो सुरक्षा और इज़्ज़त के साथ रह सकें.
कोर्ट ने सरकार की तरफ से पेश हुए चीफ स्टैंडिंग काउंसिल मनोज कुमार सिंह से ये सवाल पूछा कि क्या राज्य सरकार ने एक्ट के सेक्शन 22 (2) के तहत उनसे ज़रूरी एक पूरा एक्शन प्लान तैयार किया है. कोर्ट ने इस बात को साफ़ करने के लिए यूपी के प्रिंसिपल सेक्रेटरी, गृह से इस मामले में एफिडेविट दाखिल करने को कहा है जिसमें ये बताया जाए कि डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट ऐसे वरिष्ठ नागरिकों जो.कमजोर हालत में है उनकी जान और प्रॉपर्टी की सुरक्षा के लिए क्या एक्शन ले सकते है.
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