- समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने विधानसभा चुनाव प्रचार की शुरुआत नोएडा से करने का निर्णय लिया है
- 2011 में भी अखिलेश यादव ने नोएडा से चुनाव प्रचार शुरू किया था और उसके बाद सपा को पूर्ण बहुमत मिला था
- योगी आदित्यनाथ ने इस अशुभ मान्यता को तोड़ा और नोएडा का दौरा कर इसे अंधविश्वास करार दिया था
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव एक बार फिर नोएडा जा रहे हैं. वही नोएडा जहां से साल 2011 में उन्होंने 2012 के विधानसभा चुनाव की रैलियों की शुरुआत की लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद नोएडा के ‘अपशगुन' के डर से पांच साल नोएडा में पैर नहीं रखा. इस बार फिर अखिलेश यादव नोएडा जा रहे हैं और उसी नोएडा से अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए अपनी पार्टी के प्रचार की शुरुआत करेंगे. ये देखना दिलचस्प होगा कि क्या नोएडा उनके लिए शुभ' साबित होगा या ‘अशुभ'.
नोएडा कभी शुभ साबित हुआ था
दरअसल, समाजवादी पार्टी रविवार 29 मार्च से अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के प्रचार अभियान की शुरुआत करने जा रही है. सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव नोएडा के ‘समानता भाईचारा रैली' से विधानसभा चुनाव प्रचार की शुरुआत कर रहे हैं. अखिलेश यादव में साल 2011 में भी विधानसभा चुनाव के प्रचार की शुरुआत नोएडा से ही की थी. इसके अगले साल यूपी में पूर्ण बहुमत की सपा की सरकार बनी थी. तब समाजवादी पार्टी को 403 में से 224 सीटें हासिल हुई थीं.
रविवार को होगा शक्तिप्रदर्शन
रविवार को नोएडा के दादरी स्थित मिहिर भोज डिग्री कॉलेज के मैदान में आयोजित इस जनसभा के सपा 50 हज़ार से ज़्यादा की भीड़ इकट्ठी करने का दावा कर रही है. अखिलेश यादव सुबह 11.50 बजे कार्यक्रम स्थल पर पहुंचेंगे और दोपहर 12 बजे से कार्यक्रम की शुरुआत होगी. माना जा रहा है कि नोएडा से की जा रही इस शुरुआत के बाद अखिलेश यादव पहले पश्चिमी यूपी के अलग अलग जिलों में रैलियां करेंगे और उसके बाद यूपी के हर ज़िले में जाकर लोगों से समर्थन मांगेंगे.
नोएडा को अपशगुनी क्यों माना गया
1980 के दशक में तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह से ये मिथक या यूँ कहें टोटका शुरू हुआ. कांग्रेस नेतृत्व ने वीर बहादुर सिंह को सीएम पद छोड़ को कहा. ये तब कहा गया जब वीर बहादुर सिंह नोएडा से लौट रहे थे. इसके बाद कुछ ऐसे वाक़ये हुए जिसमें किसी मौजूदा मुख्यमंत्री ने नोएडा का दौरा किया और उसके कुछ दिनों बाद उस सीएम की कुर्सी चली जाती. ऐसे में लोगों ने ये मान लिया कि क़सूर नोएडा का है. नोएडा के अपशगुन की वजह से ही वहां के दौरों के बाद सीएम की कुर्सी चली जाती है.
कौन कौन इसे मानता रहा
वीर बहादुर सिंह के बाद इस मिथक को मानने वालों में मुलायम सिंह यादव से लेकर कल्याण सिंह, राम प्रकाश गुप्ता, राजनाथ सिंह और अखिलेश यादव का नाम आता है. हालांकि मायावती ने 2007 में सीएम बनने के बाद नोएडा का दौरा किया था. हालांकि 2012 में उनकी सत्ता गई तो लोगों ने बीएसपी की हार को नोएडा के टोटके से जोड़ दिया. आलम तो ये था कि नोएडा में एशियन डेवलपमेंट बैंक की बड़ी बैठक में भी तत्कालीन सीएम अखिलेश यादव ख़ुद नहीं गए थे.
योगी ने तोड़ा मिथक
साल 2017 में योगी आदित्यनाथ यूपी के सीएम बने तो माना गया कि वो भी शायद नोएडा से “उचित दूरी” बनाये रखेंगे. हालांकि ऐसा नहीं हुआ. योगी आदित्यनाथ नोएडा भी गए और नोएडा ना जाने को लेकर अपने पूर्ववर्ती मुख्यमंत्रियों को निशाने पर भी लिया. उन्होंने एक सभा में कहा था कि जो लोग हमारी आस्था को अंधविश्वास कहते थे, वो नोएडा जाने से बचते थे. उन्हें नोएडा जाने पर कुर्सी जाने का डर था. लोगों ने मुझसे कहा कि जो सीएम नोएडा जाते हैं, उनकी कुर्सी चली जाती है. मैंने कहा कि कुर्सी जानी है तो जाए, लेकिन यूपी का भला होगा तो नोएडा ज़रूर जाएंगे.
यूपी में अगले साल होगा चुनाव
उत्तर प्रदेश में अगले साल फरवरी मार्च में विधानसभा में चुनाव होंगे. 403 सीटों वाली विधानसभा के चुनाव की तैयारियां अभी से शुरू हो गई हैं. अखिलेश यादव जानते हैं कि तैयारियों के लिहाज़ से यूपी में एक साल का समय बहुत कम है. इसी वजह से उन्होंने अभी से रैलियों की तैयारी कर ली है. पीडीए के रथ पर सवार अखिलेश यादव अगले साल सरकार बनाने की ज़द्दोज़हद में लगे हैं. 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा को मिली बेहतरीन जीत के बाद अब अखिलेश यादव विधानसभा में भी बेहतर करने की उम्मीद में हैं.
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