LNG यानी लिक्विफाइड नेचुरल गैस जो पर्यावरण अनुकूल ईंधन है. इस फ्यूल को अब भारतीय रेल भी ट्रेन चलाने के लिए इस्तेमाल करने जा रही है. भारत में पहली LNG ट्रेन साबरमती से शुरू की जा रही है. LNG का इस्तेमाल अमेरिका, रूस, चीन, कनाडा और स्पेन जैसे देश कर रहे हैं. अब भारत भी इसमें शामिल हो गया है. फिलहाल गुजरात में साबरमती और महेसाणा जंक्शन के बीच पहली LNG ट्रेन चलाई जा रही है. LNG ट्रेन में डुअल-फ्यूल तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा. जैसे की कार में CNG और पेट्रोल का इस्तेमाल किया जाता है.
LNG ट्रेनों को चलाने के लिए डुअल-फ्यूल (दोहरे ईंधन) इंजन तकनीक का उपयोग किया जाता है. ट्रेन का इंजन केवल एक ईंधन पर निर्भर रहने के बजाय डीजल और LNG दोनों के मिश्रण से चलता है.
क्या है LNG?
LNG यानी द्रवीकृत प्राकृतिक गैस जो स्वच्छ, सुरक्षित और पर्यावरण-अनुकूल ईंधन है. इस बारे में विशेषज्ञ बताते हैं कि प्राकृतिक गैस (मुख्य रूप से मीथेन) को लगभग -162°C (-260°F) के अत्यधिक ठंडे तापमान पर ठंडा किया जाता है, तो यह गैस से तरल (Liquid) रूप में बदल जाती है. तरल रूप में बदलने से इसका आयतन (Volume) लगभग 600 गुना कम हो जाता है, जिससे इसे ट्रेन के छोटे टैंकों में अधिक मात्रा में स्टोर करना और लंबी दूरी तक ले जाना आसान हो जाता है.
LNG से कैसे चलेगी ट्रेन
इस बारे में रेलवे ने जानकारी दी है कि राष्ट्रीय ट्रांसपोर्टर पहली बार ट्रेन की ड्राइविंग पावर कारों (DPCs) में LNG-आधारित ईंधन सिस्टम का इस्तेमाल कर रहा है. नई डुअल-फ्यूल टेक्नोलॉजी से एक ही इंजन LNG और डीजल दोनों पर चल सकता है, जो ईंधन की उपलब्धता पर निर्भर करता है.
LNG के लिए ट्रेन में स्पेशल क्रायोजेनिक टैंक का इस्तेमाल किया जाएगा. यह ट्रेन के ड्राइविंग पावर कार (DPC) में एक विशेष रूप से डिजाइन किया गया इंसुलेटेड टैंक है, जो LNG को अत्यंत ठंडे तापमान (-162°C) पर सुरक्षित रखता है. जब ट्रेन चलती है तो री-गैसीफिकेशन प्रक्रिया शुरू होती है, तो लिक्विड LNG को वापस गैस के रूप में बदला जाता है. यह गैस इंजन में भेजी जाती है, जहां यह डीजल के साथ मिलकर ईंधन का काम करती है. इसमें लगभग 40% से 50% तक डीजल की खपत कम हो जाती है और उसकी जगह स्वच्छ LNG ले लेती है.
LNG हाई स्पीड और DEMU ट्रेन के लिए खास
LNG तकनीक हाई स्पीड DEMU ट्रेन के लिए खास है. क्योंकि इससे फ्यूल की लागत में काफी बचत होती है. डीजल की तुलना में LNG काफी सस्ती होती है. इससे रेलवे को हर ट्रेन पर सालाना लाखों रुपये के ईंधन खर्च की बचत होती है. LNG जलने पर बहुत कम धुआं और हानिकारक गैसें (जैसे कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर ऑक्साइड) छोड़ती है. इससे रेल यात्रा अधिक हरित (Green Transport) बनती है.
तरल रूप में अधिक ईंधन स्टोर होने के कारण ट्रेन बिना बार-बार रीफिल किए 200 किमी से अधिक की यात्रा आसानी से तय कर सकती है. डुअल-फ्यूल सिस्टम से इंजन पर लोड कम पड़ता है और ट्रेन को सुचारू पिकअप (Acceleration) मिलता है, जिससे गति और दक्षता दोनों में सुधार होता है.
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