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शादी या रील के लिए उड़ा रहे हैं ड्रोन? भूलकर भी न करें ये गलती, सीधे जा सकते हैं जेल!

शादी या रील्स के लिए ड्रोन उड़ाने से पहले जरूर जान लें नए नियम. Green, Yellow और Red जोन का समझ लें फर्क, वरना हो सकती है जेल और जुर्माना.

शादी या रील के लिए उड़ा रहे हैं ड्रोन? भूलकर भी न करें ये गलती, सीधे जा सकते हैं जेल!

आजकल हर कोई ड्रोन उड़ा रहा है. शादियां हों, रील्स हों, खेत-खलिहान हों या फिर रियल एस्टेट के विज्ञापन, सब जगह आपको ड्रोन देखने को मिल जाएंगे. लेकिन नियमों की जानकारी ज्यादातर ड्रोन उड़ाने वाले को नहीं होती है. क्या आपको पता है कि ड्रोन उड़ाने में नियम का पालन न करने पर आपको जेल तक हो सकती है? 

कल्पना कीजिए पंजाब में एक शादी हो रही है. बारात नाच रही है. 50,000 रुपये का ड्रोन और इंस्टाग्राम पर छा जाने का सपना लिए परिवार का कोई लड़का परफेक्ट एरियल शॉट लेने के लिए ड्रोन को हवा में उड़ा देता है. हर कोई तालियां बजाता है. अब वह ड्रोन की उड़ते-उड़ते पास के किसी एयरबेस के थोड़ा ज्यादा करीब पहुंच जाता है. बस यही वह पल है जहां से सब कुछ बदल जाता है.

तेजी से बढ़ रही है ड्रोन इंडस्ट्री

ड्रोन अब कोई नई या अनोखी चीज नहीं रह गए हैं. वे अब एक आदत बन चुके हैं. रिपोर्ट के अनुसार, फरवरी 2026 तक, भारत में लगभग 40,000 रजिस्टर्ड ड्रोन और इतने ही DGCA-सर्टिफाइड रिमोट पायलट मौजूद थे. साथ ही 244 अप्रूव्ड ड्रोन ट्रेनिंग स्कूलों को जोड़ लें, तो साफ पता चलता है कि ये इंडस्ट्री काफी तेजी से आगे बढ़ी है.

शादियां तो बस शुरुआत भर हैं. किसान कीटनाशक छिड़कने के लिए ड्रोन का इस्तेमाल करते हैं. रियल एस्टेट एजेंट्स प्रॉपर्टी के वीडियो बनाने के लिए इन्हें उड़ाते हैं. छोटे कारोबारी प्रमोशनल रील्स के लिए इनका इस्तेमाल करते हैं. जमीन का सर्वे करने वाले ड्रोन की मदद लेते हैं. वहीं इन्फ्लुएंसर्स उस एक परफेक्ट ओवरहेड शॉट के लिए ड्रोन उड़ाते हैं जो एल्गोरिदम का ध्यान खींच सके. ड्रोन चुपचाप आम भारतीय जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं. दिक्कत ये है कि नियमों को लेकर लोगों में वैसी जागरूकता नहीं आई है. यही कमी परेशानियों की वजह बनती है.

इन तीन जोन को जरूर जानें

भारत का एयरस्पेस कोई खुली छूट वाली जगह नहीं है. इसे कलर-कोड में बांटा गया है. हर ड्रोन पायलट चाहे शौकिया हो या प्रोफेशनल, उनसे उम्मीद की जाती है कि वह इनके फर्क को समझे.

ग्रीन जोन: ये वह इलाका है जहां ज्यादातर लोग ड्रोन उड़ाते हैं. खुले खेत, ग्रामीण इलाके और ज्यादातर रिहायशी कॉलोनियां. अगर आपका ड्रोन रजिस्टर्ड है, तो आप बिना किसी की परमिशन के 400 फीट की ऊंचाई तक ड्रोन उड़ा सकते हैं.

येलो जोन: ये कंट्रोल्ड एयरस्पेस होता है. इसमें एयरपोर्ट्स, सिटी सेंटर्स और अन्य संवेदनशील इलाकों के आसपास के क्षेत्र आते हैं. यहां उड़ान भरने से पहले आपको Digital Sky प्लेटफॉर्म के जरिए परमिशन लेनी होती है. कम जोखिम वाली उड़ानों के लिए यह मंजूरी आमतौर पर जल्दी मिल जाती है.

रेड जोन: ये वह जोन है जो लोगों को असली मुसीबत में डालता है. रेड जोन में अंतरराष्ट्रीय सीमाएं, मिलिट्री ठिकाने, संसद भवन और अन्य हाई-सिक्योरिटी वाली जगहें आती हैं. यहां बिना साफ सरकारी मंजूरी के कोई भी ड्रोन नहीं उड़ सकता है. हालांकि, ऐसी मंजूरी बहुत ही कम मामलों में मिलती है.

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मैप पर जरूर करें चेक

ध्यान देने वाली बात है कि ये जोन हमेशा एक जैसे नहीं रहते हैं. चुनावों, क्रिकेट मैचों, VVIP दौरों और राष्ट्रीय त्योहारों के दौरान ये बदल जाते हैं. जो इलाका पिछले महीने ग्रीन था, वह इस महीने येलो हो सकता है. ये पक्के तौर पर जानने का एकमात्र तरीका यही है कि हर उड़ान से ठीक पहले आप उस जगह के जोन के बारे में Digital Sky मैप पर चेक करें.

अनऑथोराइज्ड क्षेत्र में घुसते ही अलर्ट शुरू

जब कोई अनऑथराइज्ड ड्रोन किसी प्रतिबंधित एयरस्पेस में घुसता है, तो पहली चुनौती उसे मार गिराना नहीं होती. बल्कि ये पता लगाना होता है कि वह असल में है क्या. काउंटर-ड्रोन टेक्नोलॉजी कंपनी Armory के फाउंडर और CEO अमरदीप सिंह कहते हैं, "प्रतिबंधित एयरस्पेस में किसी अनऑथराइज्ड ड्रोन का घुसना अपने आप में सीधे कोई सुरक्षा खतरा नहीं होता है. लेकिन ये एक ऐसी घटना है जिसे जल्दी और सटीकता से समझना जरूरी होता है. डिटेक्शन सिर्फ पहला कदम है. अधिकारियों को ये जानना होता है कि ड्रोन कहां है, कहां से आया है, कैसे आगे बढ़ रहा है और जहां तक संभव हो, उसे कौन ऑपरेट कर रहा है."

आधुनिक ड्रोन इस काम को आसान नहीं बनाते हैं. वे उड़ान के बीच में अपनी ऊंचाई बदल सकते हैं, रास्ता मोड़ सकते हैं और कुछ मामलों में सिग्नल में रुकावट महसूस होने पर अपने कम्यूनिकेशन का तरीका तक बदल लेते हैं. इस वजह से अधिकारी कई तरह के टूल्स का सहारा लेते हैं. वे ड्रोन के सिग्नल्स पकड़ने के लिए रेडियो फ्रीक्वेंसी सेंसिंग और ड्रोन को उसके ऑपरेटर तक ट्रेस करने के लिए Drone ID सिस्टम का इस्तेमाल करते हैं. हालांकि, Drone ID अभी हर जगह अनिवार्य या पूरी तरह लागू नहीं है. जिसका मतलब है कि हमेशा एक साफ डिजिटल ट्रेल की गारंटी नहीं दी जा सकती है.

हालांकि, इससे भी मुश्किल सवाल ये नहीं है कि ड्रोन कहां है. बल्कि ये है कि वह वहां क्यों है. अमरदीप सिंह ने NDTV को बताया, "सबसे मुश्किल सवाल मंशा का होता है. कोई मनोरंजन के लिए उड़ाया गया ड्रोन जो गलती से प्रतिबंधित इलाके में चला गया, वह जानबूझकर संवेदनशील ठिकाने की ओर बढ़ रहे ड्रोन से बिल्कुल अलग होता है. AI और मशीन लर्निंग ऑपरेटर्स को सिग्नल्स और फ्लाइट बिहेवियर का तेजी से विश्लेषण करने में मदद कर सकते हैं, लेकिन सिर्फ तकनीक ही हर स्थिति में ड्रोन की असली मंशा तय नहीं कर सकती है."

यही वजह है कि भारत के काउंटर-ड्रोन सिस्टम्स को कई लेयर्स में तैयार किया गया है. इनमें डिटेक्ट करना, ट्रैक करना, पहचानना और आकलन करना शामिल हैं. इसके बाद ही कोई फैसला लिया जाता है कि आगे क्या करना है. भीड़भाड़ वाले इलाकों में किसी ड्रोन को सीधे आसमान से मार गिराना उसे छोड़ देने से ज्यादा खतरनाक हो सकता है. वे आगे बताते हैं कि आखिरी फैसला मशीनों पर नहीं, बल्कि ट्रेंड इंसानी ऑपरेटर्स पर ही निर्भर करता है.

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भारत अब इंपोर्टेड सिस्टम्स पर निर्भर रहने के बजाय अपनी खुद की काउंटर-UAS टेक्नोलॉजी तैयार करने पर जोर दे रहा है, जिसमें खतरे के क्लासिफिकेशन और बिहेवियर एनालिसिस पर खास ध्यान दिया जा रहा है. ये एक बड़ी चुनौती है, लेकिन भारत इसे अपने हिसाब से अपने एयरस्पेस और अपनी सुरक्षा जरूरतों के अनुसार हल करने की कोशिश कर रहा है.

हो सकती है जेल

ड्रोन उड़ाने वाले व्यक्ति के लिए नियम तोड़ने के नतीजे बिल्कुल सीधे और गंभीर होते हैं. नियम का उल्लंघन कहां हुआ और मामला कितना गंभीर है, इसके आधार पर जुर्माना लग सकता है. इसके अलावा ड्रोन जब्त हो सकता है, भविष्य के रजिस्ट्रेशन से ब्लैकलिस्ट किया जा सकता है या फिर (गंभीर मामलों में) जेल भी हो सकती है.

अच्छी बात ये है कि नियमों का पालन करना कोई मुश्किल काम नहीं है. अगर आपका ड्रोन 250 ग्राम से ज्यादा भारी है, तो उसका रजिस्ट्रेशन कराएं. इससे ऊपर के किसी भी ड्रोन के लिए Digital Sky प्लेटफॉर्म के जरिए यूनिक आइडेंटिफिकेशन नंबर (UIN) लेना जरूरी है. सिर्फ पहली बार नहीं, बल्कि हर उड़ान से पहले जोन मैप जरूर चेक करें. चुनाव, त्योहार और वीआईपी मूवमेंट के दौरान जोन बदल जाते हैं.

ड्रोन उड़ाते वक्त रखें इन बातों का ख्याल

अगर आप नैनो कैटेगरी (250 ग्राम से कम) से ऊपर का ड्रोन उड़ा रहे हैं या कमर्शियल इस्तेमाल कर रहे हैं, तो रिमोट पायलट सर्टिफिकेट जरूर लें. कभी भी यह मानकर न चलें कि कोई "ग्रीन" इलाका हमेशा ग्रीन ही रहेगा. रातों-रात अस्थायी पाबंदियां लगाई जा सकती हैं.

काफी लोग जानना चाहते हैं कि एक ठीक-ठाक कैमरा ड्रोन की कीमत असल में कितनी होती है? शौकिया तौर पर उड़ाने वालों के लिए DJI Mini 2 SE जैसे एंट्री-लेवल ऑप्शन्स करीब 46,500 रुपये से शुरू होते हैं. ये इतना हल्का है कि इसमें रजिस्ट्रेशन के कई भारी नियमों से छूट मिल जाती है और पहली बार उड़ाने वाले भी इसे आसानी से उड़ा सकते हैं.

शादियों के वीडियोग्राफर और छोटे कारोबारी इससे एक कदम आगे बढ़ते हैं और DJI Mini 4 Pro जैसे मॉडल चुनते हैं, जिसकी कीमत करीब 99,999 रुपये है. ये शार्प 4K वीडियो शूट करता है, इसमें चारों तरफ ऑब्स्टेकल सेंसर्स लगे हैं और इसका फुटेज इसकी कीमत से कहीं ज्यादा प्रीमियम दिखता है.

जो लोग पूरी तरह प्रोफेशनल सेटअप चाहते हैं वे दो कैमरे, ज्यादा लंबी फ्लाइट टाइम और तेज हवा में बेहतर स्टेबिलिटी वाले ड्रोन को चुन सकते हैं. उनके लिए DJI Air 3 की कीमत करीब 1,35,500 रुपये तक जाती है. ये ट्रैवल क्रिएटर्स और वेडिंग वीडियोग्राफर्स के बीच काफी लोकप्रिय हो चुका है, जिन्हें रोजमर्रा की शूटिंग के लिए एक भरोसेमंद गियर चाहिए होता है. हालांकि, आपको ध्यान रखना होगा कि इन कीमतों में रजिस्ट्रेशन, ट्रेनिंग या इंश्योरेंस का खर्च शामिल नहीं है. अगर आप किसी फैमिली फंक्शन के बजाय कमर्शियल इस्तेमाल की योजना बना रहे हैं, तो ये सभी खर्चे अलग से जुड़ते हैं.

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