विश्व प्रसिद्ध केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान, जिसे घना के नाम से भी जाना जाता है, इस समय गहरे जल संकट से जूझ रहा है. पांचना बांध से समय पर पानी नहीं मिलने के कारण पार्क के जल स्रोत सूखने लगे हैं, जिससे 375 से अधिक पक्षी प्रजातियों, वन्यजीवों और पर्यटन पर संकट गहरा गया है. नेचर गाइड, रिक्शा चालकों और स्थानीय लोगों ने सरकार से जल्द पानी की आपूर्ति और स्थायी जल प्रबंधन की मांग की है. फिलहाल चंबल नदी से पानी लाने की व्यवस्था की गई है लेकिन यह पानी पर्याप्त नहीं है.
जुलाई में कम पानी से जलस्रोत सूखे
घना प्रशासन का कहना है कि उन्होंने उच्च अधिकारियों को अवगत कराया है और उन्हें 550 एमसीएफटी पानी की आवश्यकता होती है. उद्यान के डीएफओ चेतन कुमार बीवी ने बताया कि केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान को प्रतिवर्ष 550 एमसीएफटी पानी की आवश्यकता होती है जो जुलाई माह तक आ जाता है. लेकिन इस बार पानी नहीं आया है जिससे जल स्रोत सूखने लगे हैं. पानी सूखने से छोटी छोटी मछलियां मर रही है जिन्हें दूसरे ब्लॉक में शिफ्ट कराया गया है.

उद्यान में पानी की कमी से जलाशय नहीं भर रहे
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पानी की कमी को देखते हुए वैकल्पिक रूप से चंबल से करीब `3 एमसीएफटी` पानी की आपूर्ति की जा रही है. लेकिन यह मात्रा जरूरत के मुकाबले ऊंट के मुंह में जीरा साबित हो रही है. साथ ही, जिस पानी में पक्षियों के लिए भोजन की मात्रा अधिक होती है वह पांचना का पानी है. जल स्तर गिरने से उद्यान में मछलियां और एक्वा वेजिटेशन पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल पा रहे. इसका सीधा असर करीब `375 से अधिक पक्षी प्रजातियों`पर पड़ रहा है जो यहां आश्रय लेती हैं.
इंसानों के लिए भी संकट
जल संकट की वजह से सिर्फ पर्यावरण ही नहीं, हजारों लोगों की आजीविका भी संकट में है. नेचर गाइड, रिक्शा चालक और आसपास के ग्रामीण पूरी तरह इस पार्क पर निर्भर हैं. पानी न होने से पर्यटक भी कम आ रहे हैं, जिससे उनका रोजगार प्रभावित हो रहा है.

पानी की कमी से पर्यटकों की संख्या भी घट गई है
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जल संकट को लेकर नेचर गाइड, रिक्शा चालक, प्रकृति प्रेमी और विभिन्न संगठनों के लोग घना गेट पर इकट्ठा हुए. उन्होंने सरकार से मांग की कि पांचना बांध से तुरंत पानी की आपूर्ति सुनिश्चित की जाए.
केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान सिर्फ पर्यावरण के लिए ही जरूरी नहीं है, बल्कि यह देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों का केंद्र और हजारों परिवारों की रोजी-रोटी भी है.
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