भारत आदिवासी पार्टी के सांसद राजकुमार रोत ने संयुक्त राष्ट्र में एक महत्वपूर्ण भाषण दिया है. जिनेवा में आयोजित संयुक्त राष्ट्र के आदिवासी अधिकार सम्मेलन में उन्होंने साफ कहा कि भारत में विशिष्ट आदिवासी लोग मौजूद हैं, और उन्हें मान्यता दी जानी चाहिए. सांसद रोत ने भारत सरकार के उस दावे को खारिज किया, जो लंबे समय से यह कह रही है कि भारत में अलग आदिवासी समुदाय नहीं हैं.
रोत बोले- भारत में करीब 14 करोड़ आदिवासी
राजस्थान से बांसवाड़ा-डूंगरपुर सांसद राजकुमार रोत ने यूनाइटेड नेशन में बताया कि भारत में करीब 14 करोड़ आदिवासी लोग रहते हैं. भारतीय संविधान के तहत इन्हें अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया गया है, और उन्हें 705 अलग-अलग जनजातियों में विभाजित किया गया है. ये समुदाय प्रोटो-ऑस्ट्रेलॉयड, नेग्रिटो, द्रविड़ और मंगोलॉयड मूल के हैं. सांसद रोत ने कहा कि यह स्पष्ट है कि भारत की अनुसूचित जनजातियां ही देश की आदिवासी जनता हैं.
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संयुक्त राष्ट्र के मंच पर भारत के आदिवासी (Indigenous Peoples) समुदाय की ओर से अपनी बात रखने का अवसर मिला।
— Rajkumar Roat (@roat_mla) July 15, 2026
संयुक्त राष्ट्र (United Nations) में भारत सरकार द्वारा लंबे समय से किये जा रहे उस दावे का तथ्यात्मक खंडन किया कि भारत में कोई विशेष आदिवासी (Indigenous) समुदाय नहीं हैं।… pic.twitter.com/CHc15RT7x3
पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू का हवाला दिया
अपने तर्क को मजबूत करने के लिए सांसद राजकुमार रोत ने भारत के सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू का हवाला दिया. साल 2011 में एक महत्वपूर्ण निर्णय (कैलाश बनाम महाराष्ट्र राज्य) में न्यायाधीश काटजू ने कहा था कि अनुसूचित जनजातियां, जो भारत की लगभग 8 प्रतिशत आबादी हैं, भारत के मूल निवासियों की वंशज हैं. इस तरह सांसद राजकुमार रोत ने भारत के सर्वोच्च अदालत की कानूनी मान्यता को भी आगे रखा.
अपने संबोधन के अंत में, राजकुमार रोत ने गर्व के साथ कहा कि वह खुद भील आदिवासी समुदाय से आते हैं. उन्होंने अपने समुदाय का प्रतिनिधित्व करने को एक विशेष सम्मान बताया. भील समुदाय राजस्थान के अनुसूचित क्षेत्र का सबसे बड़ा आदिवासी समूह है.
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