पंजाब की राजनीति में शिरोमणि अकाली दल (SAD) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बीच संभावित गठबंधन को लेकर एक बार फिर चर्चा शुरू हो गई है. इसकी वजह बनीं अकाली दल की वरिष्ठ नेता और बठिंडा सांसद हरसिमरत कौर बादल, जिन्होंने एक सार्वजनिक रैली में ऐसा बयान दिया जिसे राजनीतिक हलकों में बड़े संकेत के तौर पर देखा जा रहा है.
संत हरचंद सिंह लोंगोवाल की 41वीं पुण्यतिथि पर आयोजित एक बड़ी रैली को संबोधित करते हुए हरसिमरत कौर बादल ने कहा, "मेरी जिम्मेदारी बोलने की नहीं है, इसलिए मैं अपनी जुबान रोक रही हूं. आपको खुद ही पता चल जाएगा." उनके इस बयान के बाद सियासी गलियारों में कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गईं.
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'दिल्ली से समझौते' वाले बयान पर बढ़ी अटकलें
अपने संबोधन में हरसिमरत ने केंद्र के साथ बेहतर राजनीतिक समझ और समन्वय की जरूरत पर भी जोर दिया. उन्होंने कहा कि पंजाब को पहले भी ऐसे समझौतों के जरिए विकास और प्रगति का लाभ मिला है.
उन्होंने कहा, "गुरु साहिब कृपा करें और लोगों का हमें साथ मिले. ऐसे समझौते हों जिनसे दिल्ली से विकास और प्रगति के काम हों, जैसे पहले हुआ करते थे. पंजाब में फिर से विकास की नींव रखी जाए ताकि लोगों और प्रदेश को इसका फायदा मिले." हालांकि उन्होंने भाजपा का नाम नहीं लिया, लेकिन उनके बयान को संभावित राजनीतिक समीकरणों से जोड़कर देखा जा रहा है.
2020 में टूटा था दशकों पुराना साथ
अकाली दल और भाजपा कई दशकों तक पंजाब में सहयोगी दल रहे. दोनों पार्टियों ने साथ मिलकर चुनाव लड़े और सरकारें भी चलाईं. लेकिन वर्ष 2020 में कृषि कानूनों के मुद्दे पर दोनों दलों के रिश्तों में दरार आ गई.
कृषि कानूनों के विरोध के बाद शिरोमणि अकाली दल ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) से खुद को अलग कर लिया था. इसके बाद भाजपा ने पंजाब में स्वतंत्र रूप से अपना संगठन मजबूत करने की रणनीति अपनाई. तब से दोनों दल अलग-अलग चुनाव लड़ते रहे हैं.
बदले राजनीतिक समीकरण
पंजाब की राजनीति में पिछले कुछ वर्षों में कई बदलाव आए हैं. अकाली दल अपने पारंपरिक ग्रामीण और सिख वोट बैंक को फिर से मजबूत करने की कोशिश कर रहा है. वहीं भाजपा भी अपने शहरी समर्थन आधार से आगे बढ़कर ग्रामीण इलाकों में राजनीतिक विस्तार चाहती है. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि दोनों दल फिर से साथ आते हैं तो अकाली दल को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत साझेदार मिल सकता है, जबकि भाजपा को पंजाब के ग्रामीण इलाकों में अपनी पहुंच बढ़ाने में मदद मिल सकती है.
आसान नहीं होगा नया गठबंधन
हालांकि संभावित गठबंधन की राह आसान नहीं मानी जा रही. कृषि कानूनों का मुद्दा अब भी दोनों दलों के संबंधों में संवेदनशील विषय बना हुआ है. इसके अलावा भाजपा पंजाब में अपने संगठन का विस्तार कर चुकी है, इसलिए पुराने सीट बंटवारे के फार्मूले पर लौटना आसान नहीं होगा. अकाली दल के सामने भी चुनौती होगी कि वह अपने पारंपरिक समर्थकों को यह विश्वास दिलाए कि किसी भी राजनीतिक समझौते से पंजाब के हित प्रभावित नहीं होंगे.
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