
पेरिस पैरालंपिक में उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जनपद की बेटी प्रीति पाल ने रविवार को 30.01 सेकंड के व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ समय के साथ महिलाओं की 200 मीटर टी35 श्रेणी में कांस्य पदक जीता जो पेरिस पैरालंपिक का उनका दूसरा पदक है. प्रीति (23 वर्ष) का कांस्य पेरिस में भारत का दूसरा पैरा एथलेटिक्स पदक भी है. टी35 में वो खिलाड़ी हिस्सा लेते हैं जिनमें हाइपरटोनिया, अटैक्सिया और एथेटोसिस जैसी समन्वय संबंधी विकार होते हैं. शुक्रवार को उन्होंने पैरालंपिक ट्रैक स्पर्धा में भारत का पहला एथलेटिक्स पदक जीता था. उन्होंने महिलाओं की टी35 100 मीटर प्रतियोगिता में 14.21 सेकंड के व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ समय के साथ कांस्य पदक जीता था. प्रीति पाल के मेडल जीतने के बाद उसके गांव हशमपुर में खुशी का माहौल है. प्रीति कि कामयाबी के बाद उसके घर जहां बधाई देने वालों का ताता लगा हुआ है, तो वहीं परिवार में एक दूसरे को मिठाई खिलाकर खुशियां मनाई जा रही है. बता दें, प्रीति पाल पैरालंपिक में एथलेटिक्स में भारत के लिए दो मेडल जीतने वाली पहली एथलीट हैं.
प्रीति पाल ने पदक जीतकर रचा इतिहास
मुजफ्फरनगर जनपद के हशमपुर गांव निवासी अनिल पाल की बेटी प्रीति पाल ने पेरिस पैरालंपिक में महिलाओं की 100 मीटर T35 स्पर्धा में 14.21 सेकंड में अपना पर्सनल बेस्ट दिखाते हुए कांस्य पदक जीता है. इसके बाद उन्होंने रविवार को 200 मीटर T35 स्पर्धा में अपना बेस्ट देते हुए 30.01 सेकंड का समय निकाला और कांस्य अपने नाम किया. प्रीति पाल बचपन में ही सेरेब्रल पाल्सी नाम की बीमारी से पीड़ित रहीं. जिसके लिए उसके परिवार के द्वारा उसका उपचार भी कराया गया था. प्रीति पाल ने कक्षा 5 तक हशमपुर अपने गांव में ही शिक्षा ग्रहण की है उसके बाद वह अपने दादा-दादी के पास मेरठ में चली गई थी. जहां पर प्रीति ने अपनी आगे की पढ़ाई के साथ-साथ कड़ी मेहनत कर यह मुकाम हासिल किया है.
पिता ने बेटी के लिए कही ये बात
प्रीति पाल के पिता अनिल कुमार पाल ने अपनी बेटी को लेकर बताया,"जब वह पैदा हुई तो उसको पैरों में कमी तो थी और विकलांग थी एवं जब वह पैदा हुई तो उसके थोड़े दिनों बाद हमने उसके पैरों की मालिश की उसके बाद प्लास्टर कराया और प्लास्टर करने के बाद पैरों के जूते बनवाएं इसके बाद उसके पैर थोड़ा-थोड़ा सही हुए, हमने डॉक्टर को भी दिखाया और दवाई कराई और दवाई करने के बाद ठीक हुई थी."
अनिल कुमार पाल ने आगे कहा,"उसको चलने में बहुत दिक्कत होती थी चला नहीं जाता था बहुत दिक्कत रहती थी. यह यहां बहसूमा में स्कूल में 6 क्लास में पढ़ती थी, उसके बाद जीपीएस स्कूल में सिक्स क्लास में मेरठ इसका एडमिशन कराया." प्रीति पाल के पिता ने आगे कहा,"हमने बहुत मेहनत मजदूरी करके उसकी फीस जमा कराई एवं बड़ी दिक्कत का सामना करना पड़ा, यह चार बहन भाई हैं जिसमें दो बेटी और दो बेटे हैं, हमें बहुत अच्छा लग रहा है कि हमारी मेहनत को कामयाबी मिली है और सारे परिवार सहित पूरे गांव और क्षेत्र में सबको खुशी है."
अनिल कुमार पाल ने आगे कहा,"लोग कहते थे कि विकलांग है बड़ी दिक्कत हो जाएगी और लड़की है शादी-ब्याह में भी दिक्कत आएगी और आज कहते हैं की लड़की ने बहुत अच्छा किया है." अनिल कुमार ने कहा,"हम सब मोबाइल और टीवी पर देख रहे थे. हमें खुशी है बहुत ज्यादा के पूरे विश्व व देश में नाम रोशन किया है."
वहीं हशमपुर गांव प्रधान रवि ने बताया कि प्रीति पाल के पिताजी दूधिया का काम करते हैं. जिनकी डेयरी है, ज्यादा गरीब परिवार से है और यह सिक्स क्लास तक यही गांव में पढ़ी थी उसके बाद दादा-दादी के साथ मेरठ चली गई थी और वहीं पर पढ़ी और कोचिंग किया और रेसिंग की तैयारी की." गांव प्रधाव रवि ने आगे बताया,"पैर में दिक्कत है उसके बावजूद भी इन्होने हर नहीं मानी और इनको 30 तारीख में पेरिस में रजत पदक से इनको सामान सम्मान मिला है."
गांव प्रधान रवि ने आगे कहा,"उनके पिताजी बता रहे थे कि प्रीति ने कभी भी अपनी पढ़ाई पर जोर नहीं दिया और कहा कि मैं गेम में ही जाऊंगी लेकिन पढ़ाई के चलते-चलते भी आज लड़की ने एमबीए में एडमिशन लिया है और पढ़ाई भी कर रही है और रेसिंग गेम में भी है, यह दो भाई और दो बहन है एवं यह दूसरे नंबर की लड़की है और पहले उनकी बड़ी बहन है जो एमबीए करके जॉब कर रही है और इन्होंने भी एमबीए की है और रेसिंग में भी है."
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