- कल्याण–डोंबिवली महानगरपालिका में उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने सियासी दांव खेलकर स्थानीय सत्ता समीकरण बदले हैं
- शिवसेना केवल मनसे तक सीमित नहीं, बल्कि कांग्रेस, एनसीपी और उद्धव ठाकरे गुट के पार्षदों से भी संपर्क में हैं
- कुल 122 सीटों वाली केडीएमसी में बहुमत के लिए 62 सीटें आवश्यक हैं, शिंदे गुट के पास 53 सीटें हैं
मुंबई महानगर क्षेत्र की राजनीति में एक बार फिर बड़ा उलटफेर होता दिख रहा है. भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और कद्दावर नेता रवींद्र चव्हाण के मजबूत गढ़ माने जाने वाले कल्याण–डोंबिवली महानगरपालिका (KDMC) में उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने ऐसा सियासी दांव चला है, जिसने न सिर्फ स्थानीय सत्ता समीकरण बदले हैं, बल्कि महायुति के भीतर शक्ति संतुलन को भी नई दिशा दे दी है.
शिंदे की रणनीति: गठबंधन से आगे संपर्क राजनीति
सूत्रों के अनुसार, एकनाथ शिंदे की शिवसेना केवल मनसे (MNS) के साथ गठबंधन तक सीमित नहीं है, बल्कि वह कांग्रेस, एनसीपी (शरद पवार गुट) और शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) के पार्षदों के साथ भी लगातार संपर्क में है. यह रणनीति साफ तौर पर बहुमत के आंकड़े को पार करने और भाजपा पर निर्भरता कम करने की ओर इशारा करती है.

केडीएमसी का अंकगणित
- कुल सीटें - 122
- बहुमत का आंकड़ा- 62
पार्टियों की स्थिति इस प्रकार है-
- शिवसेना (शिंदे) – 53
- भाजपा – 50
- शिवसेना (उद्धव ठाकरे) – 11
- मनसे – 5
- कांग्रेस – 2
- एनसीपी (शरद पवार) – 1
उद्धव गुट में टूट की आहट?
सबसे अहम राजनीतिक संकेत शिवसेना (उद्धव ठाकरे) खेमे से मिल रहे हैं. सूत्र बताते हैं कि उनके 11 निर्वाचित पार्षदों में से 4 पार्षद फिलहाल संपर्क में नहीं हैं और वे शिंदे गुट को समर्थन दे सकते हैं. अगर यह समीकरण पक्का होता है तो सत्ता का पूरा गणित ही बदल जाता है.
बहुमत का नया फॉर्मूला
शिवसेना (शिंदे) + मनसे + कांग्रेस + एनसीपी (शरद पवार) + शिवसेना (उद्धव) के 4 पार्षद = 65
65 का यह आंकड़ा न सिर्फ बहुमत से आगे है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि कल्याण–डोंबिवली में सत्ता की चाबी अब एकनाथ शिंदे के हाथ में है.

रवींद्र चव्हाण के गढ़ में सेंध
राजनीतिक तौर पर यह घटनाक्रम इसलिए भी अहम है क्योंकि कल्याण–डोंबिवली को लंबे समय से रवींद्र चव्हाण का अभेद्य किला माना जाता रहा है. यहां शिंदे की बढ़ती पकड़ भाजपा के लिए असहज स्थिति पैदा कर रही है.
महायुति में बढ़ी शिंदे की बारगेनिंग पावर
इस बदले हुए गणित का सीधा असर महायुति के भीतर सत्ता-साझेदारी पर पड़ रहा है. अब एकनाथ शिंदे की स्थिति ऐसी बन गई है कि मेयर पद पर समझौते से इनकार, महत्वपूर्ण समितियों की अध्यक्षता पर दावा और निर्णय प्रक्रिया में अधिक प्रभाव जैसे मुद्दों पर वे भाजपा से मजबूत स्थिति में बातचीत कर सकते हैं.

ठाकरे भाइयों पर भाजपा का हमला
कल्याण–डोंबिवली की राजनीति अब केवल स्थानीय सत्ता तक सीमित नहीं रही. यह मुकाबला भाजपा बनाम शिंदे शिवसेना और उससे भी आगे महायुति के भीतर वर्चस्व की लड़ाई का संकेत दे रहा है. आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह पावर प्ले केवल नगर निगम तक सिमटता है या महाराष्ट्र की राज्य राजनीति में भी नई लकीरें खींचता है.
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