- पुणे में डॉ. प्रदीप कुरुलकर पर पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी से संवेदनशील जानकारी साझा करने का आरोप लगा है
- कुरुलकर ने सोशल मीडिया पर एक महिला एजेंट से रक्षा परियोजनाओं की तकनीकी जानकारी साझा की
- एटीएस ने कोर्ट में कहा कि मामला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा गंभीर विषय है और जांच अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है
महाराष्ट्र के पुणे से सामने आए चर्चित जासूसी मामले में डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन के वरिष्ठ वैज्ञानिक रहे डॉक्टर प्रदीप कुरुलकर की जमानत याचिका पर सुनवाई के बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है. अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि इस मामले में आदेश बाद में सुनाया जाएगा. दरअसल, डॉ. प्रदीप कुरुलकर पर आरोप है कि उन्होंने पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी से जुड़ी एक महिला एजेंट के संपर्क में आकर देश की रक्षा से जुड़ी संवेदनशील जानकारी साझा की. यह मामला सामने आने के बाद महाराष्ट्र एंटी टेररिज्म स्क्वाड (ATS) ने उन्हें गिरफ्तार किया था.
कैसे सामने आया जासूसी का मामला
जांच एजेंसियों के मुताबिक, कुरुलकर सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म के जरिए एक महिला के संपर्क में आए थे. बताया गया कि वह महिला खुद को डिफेंस रिसर्च में रुचि रखने वाली बताती थी, लेकिन बाद में जांच में सामने आया कि वह पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी से जुड़ी हो सकती है. एटीएस के अनुसार बातचीत के दौरान कुरुलकर ने भारत के कई संवेदनशील रक्षा प्रोजेक्ट्स से जुड़ी जानकारी साझा की. इनमें मिसाइल और रक्षा प्रणालियों से संबंधित तकनीकी जानकारी होने का शक जताया गया है. जांच में यह भी सामने आया कि बातचीत में कई बार बेहद गोपनीय विषयों पर चर्चा हुई, जिसे लेकर एजेंसियों ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मामला बताया है.
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एटीएस का दावा, देश की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मामला
सुनवाई के दौरान एटीएस ने अदालत में कहा कि यह मामला बेहद गंभीर है क्योंकि इसमें देश की सुरक्षा से जुड़ी संवेदनशील जानकारी लीक होने की आशंका है. एजेंसी का कहना है कि कुरुलकर जिस पद पर थे, वहां से उन्हें कई महत्वपूर्ण रक्षा परियोजनाओं तक पहुंच थी. एटीएस ने यह भी दलील दी कि जांच अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है और कई डिजिटल सबूतों की जांच की जा रही है। ऐसे में अगर आरोपी को जमानत दी जाती है तो जांच प्रभावित हो सकती है.
बचाव पक्ष की दलील
कुरुलकर की तरफ से पेश वकीलों ने अदालत में कहा कि उनके मुवक्किल के खिलाफ लगाए गए आरोप बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए हैं. बचाव पक्ष का कहना है कि बातचीत में ऐसी कोई जानकारी साझा नहीं की गई जो आधिकारिक रूप से “गोपनीय” श्रेणी में आती हो. उन्होंने यह भी कहा कि कुरुलकर लंबे समय तक देश के रक्षा अनुसंधान से जुड़े रहे हैं और उनका पूरा करियर बेदाग रहा है, इसलिए उन्हें जमानत दी जानी चाहिए.
अदालत ने फैसला रखा सुरक्षित
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद बॉम्बे हाई कोर्ट ने फिलहाल इस मामले में आदेश सुरक्षित रख लिया है. अदालत जल्द ही यह तय करेगी कि डॉ. प्रदीप कुरुलकर को जमानत दी जाएगी या नहीं.
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