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This Article is From Jan 02, 2026

गैर मराठी मेयर थोपने की कोशिश हुई तो... BMC चुनावों को लेकर सामना में बड़ी चेतावनी

BMC Election Shiv Sena: बीजेपी नेता कृपाशंकर के उस बयान पर सामना संपादकीय में टिप्पणी की गई है, जिसमें उन्होंने कहा था कि मुंबई का मेयर उत्तर भारतीय होगा. सामना में चेतावनी दी गई है कि मुंबई का मेयर गैर मराठी नहीं होना चाहिए.

गैर मराठी मेयर थोपने की कोशिश हुई तो...  BMC चुनावों को लेकर सामना में बड़ी चेतावनी
सामना के संपादकीय में बीएमसी चुनाव का जिक्र

BMC Election Shiv Sena: शिवसेना के मुखपत्र सामना के संपादकीय में बीएमसी चुनावों को लेकर बड़ी चेतावनी दी गई है. इसमें लिखा गया है कि अगर किसी गैरमराठी मेयर को थोपने की कोशिश की गई तो संयुक्त महाराष्ट्र संघर्ष की तरह भयंकर विद्रोह भड़क उठेगा. इसके साथ ही बीजेपी और एकनाथ शिंदे वाली शिवसेना पर निशाना साधा गया है और कई तरह के आरोप भी लगाए गए हैं. बीजेपी नेता कृपाशंकर सिंह के बयान को लेकर ये पूरा लेख है, जिसमें साफ कहा गया है कि मेयर मुंबई का ही होना चाहिए. 

बलिदान की परंपरा जारी रहेगी

सामना के संपादकीय में लिखा गया है, अगर भाजपा के `कृपाशंकर' छाप नेता यह नहीं समझते कि मुंबई पर सिर्फ पैसे से कब्जा नहीं किया जा सकता, तो उन्हें फोर्ट स्थित हुतात्मा स्मारक का इतिहास समझना चाहिए. उस समय मुंबई समेत संयुक्त महाराष्ट्र के लिए 106  लोगों ने अपना बलिदान दिया. उस बलिदान की परंपरा आगे भी जारी रहेगी.

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कृपाशंकर के बयान पर टिप्पणी

सामना में कृपाशंकर के बयान पर लिखा गया है, कृपाशंकर का यह बयान `मुंबई का मेयर उत्तर भारतीय होगा.' यह भाजपा की अधिकृत भूमिका है, लेकिन इस मामले में नकली शिवसेना लाचार होकर लीपा-पोती कर रही है. ये बेबस लोग कह रहे हैं, `मुंबई के मेयर के बारे में कृपाशंकर का बयान उनकी निजी राय है.' (संक्षेप में, हमने इसमें एक `पूंछ' डाल दी है, जिसे हटाया नहीं जा सकता.) अरे, थू है तुम्हारी जिनगानी पर!

कायर शिंदे इस साजिश पर चुप्पी साधे हुए हैं. शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे के नाम पर सत्ता का उपभोग करने वाली अमित शाह की चरण चाटने वाली सेना तो कृपाशंकर के इस मराठीद्वेषी वक्तव्य पर मुंह में दही जमाए बैठी है. कृपाशंकर तो छोड़िए भाजपा और मिंधे के सौ-सौ बाप भी यहां पर आ जाएं, तब भी वे मुंबई से मराठी मानुष के रिश्ते को तोड़ने में नाकाम रहेंगे.

बीजेपी की मंशा पर उठाए सवाल

सामना में आगे लिखा है- भारतीय जनता पार्टी ने आखिर कृपाशंकर के मुख से अपनी कड़ुवाहट उगल ही दी है. कृपाशंकर ने कहा कि महानगरपालिका के चुनावों में इतने अधिक नगरसेवक चुने जाएंगे कि मुंबई का महापौर उत्तर भारतीय समुदाय से ही बनेगा. कृपाशंकर के इस बयान से मुंबई को लेकर भाजपा की मंशा उजागर हो गई है.

कृपाशंकर ने उत्तर प्रदेश के जौनपुर लोकसभा क्षेत्र से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा था, लेकिन उत्तर भारतीयों ने ही उन्हें हरा दिया. यानी जो उत्तर भारत में हारे हैं, वही मुंबई में उत्तर भारतीय मेयर बनाने जा रहे हैं. कृपाशंकर ने भाजपा की टांगे भाजपा के ही गले में बांध दी हैं. असल में इस चुनाव में भाजपा के पैरों तले की जमीन खिसक गई है. इसलिए वे मुंबई में मराठी-गैरमराठी विवाद को हवा देकर चुनाव लड़ना चाहते हैं.

रिश्ता बर्बाद करने की कोशिश 

सामना में लिखा गया है, मुंबई और आस-पास के शहरों में हिंदी भाषी मराठी लोगों के साथ घुल-मिलकर रहते हैं. इनमें से अधिकतर लोग चार-पांच पीढ़ियों से यहीं रह रहे हैं. इसलिए उनकी जन्मभूमि और कर्मभूमि यही है. ऐसे में ये लोग दूध में नमक डालकर इस रिश्ते को बर्बाद करने की कोशिश क्यों कर रहे हैं? मुंबई और महाराष्ट्र के हिंदी भाषी लोगों ने `कोरोना' काल में यह अनुभव किया है कि उत्तर भारत के शासक हिंदी भाषी लोगों के संकट के समय अपने दरवाजे बंद कर देते हैं. उद्धव ठाकरे के मुख्यमंत्री कार्यकाल में जाति, प्रांत या भाषा की परवाह किए बिना सभी को इलाज और अनाज उपलब्ध कराया गया. इसके उलट, उत्तर प्रदेश और बिहार में अपने गांवों में लौटने वाले हिंदी भाषी लोगों को राज्य के द्वार पर ही रोक दिया गया था.

भाजपा सरकार ने उनके लिए उनके अपने राज्यों, जिलों और गांवों के दरवाजे बंद कर दिए थे. इन सभी हिंदी भाषी लोगों को अपने राज्य में जाने से रोक दिया गया. दो-चार दिनों तक ये लोग अपने बाल-बच्चों के साथ बिना भोजन-पानी के तड़पते रहे थे, तब न तो कृपाशंकर उनकी मदद के लिए आगे आए और न ही भाजपा. अब ये महान लोग उन्हीं उत्तर भारतीयों की जिंदगी पर अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने आए हैं! उत्तर भारतीयों को ऐसे स्वार्थी नेताओं को उनकी जगह दिखानी चाहिए.

अब भाजपा आदित्यनाथ महाराज, केशव मौर्य, ब्रजेश पाठक, सम्राट चौधरी, मैथिली ठाकुर, मध्य प्रदेश और राजस्थान के भाजपाई मुख्यमंत्री और मंत्रियों की फौज मुंबई में उतारने वाली है, वो भी सिर्फ इसलिए कि महाराष्ट्र की राजधानी में मराठी महापौर न बन पाए.

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