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क्षिप्रा नदी अब शिप्रा कहलाएगी, सिंहस्थ 2028 से पहले नाम को लेकर संशय खत्म, जानिए क्यों लिया गया ये फैसला

उज्जैन में होने वाले सिंहस्थ से पहले शिप्रा नदी के नाम को लेकर लंबे समय से चला संशय खत्म हो गया. मप्र सीएम मोहन यादव के निर्देश के बाद साफ हो गया है कि अब मोक्षदायिनी नदी को शिप्रा के नाम से ही जाना जाएगा.

क्षिप्रा नदी अब शिप्रा कहलाएगी, सिंहस्थ 2028 से पहले नाम को लेकर संशय खत्म, जानिए क्यों लिया गया ये फैसला
सिंहस्थ 2028 से पहले से उज्जैन की मोक्षदायिनी शिप्रा नदी के नाम पर बना संश्य खत्म हो गया है.

सिंहस्थ 2028 से पहले उज्जैन स्थित मोक्षदायिनी शिप्रा नदी अपने नाम को लेकर चर्चा में आ गई. इसका कारण हाल ही में भोपाल में हुई एक बैठक है, जिसमें अधिकारी द्वारा फाइल में नदी का नाम 'क्षिप्रा' शब्द लिखने पर सीएम डॉ. मोहन यादव ने आपत्ति जताई. विचार-विमर्श और जानकारी जुटाने के बाद तय हुआ कि सरकारी फाइलों में अब नदी का नाम शिप्रा ही लिखा जाएगा. 

दरअसल, शिप्रा नदी को कुछ लोग 'क्षिप्रा' तो कुछ लोग 'शिप्रा' कहते हैं. सरकारी फाइलों में भी इसके अलग-अलग नाम दर्ज हैं. यही वजह है कि भोपाल की बैठक में जब सीएम यादव ने फाइल में 'क्षिप्रा' शब्द देखा तो उन्होंने शास्त्रों का हवाला देते हुए इसे शिप्रा करने को कहा. बता दें कि शिप्रा के विभिन्न घाटों पर प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु स्नान और दान करने के लिए पहुंचते हैं. खास मौके पर यहां भक्तों की भारी भीड़ होती है. साथ ही, हर 12 वर्ष में सिंहस्थ महाकुंभ का आयोजन भी होता है. 

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शिप्रा नदी के बारे में सब कुछ जानिए ?

  • मोक्षदायिनी शिप्रा नदी का उद्गम इंदौर जिले की महू छावनी के पास ककड़ीबर्डी पहाड़ी से होता है.  
  • शिप्रा नदी की कुल लंबाई लगभग 195 किलोमीटर है.
  • नदी प्रदेश के देवास, उज्जैन, रतलाम और मंदसौर शहर के होकर गुजरती है. 
  • शिप्रा नदी एमपी और राजस्थान की सीमा के पास स्थित मंदसौर जिले में चंबल नदी में जाकर मिल जाती है. 
  • शिप्रा नदी मोक्षदायिनी माना जाता है, नदी के तट पर स्थित उज्जैन में हर 12 वर्ष में यहां सिंहस्थ का आयोजन होता है.  
 मोक्षदायिनी शिप्रा नदी के नाम को लेकर संशय खत्म.

मोक्षदायिनी शिप्रा नदी के नाम को लेकर संशय खत्म.

क्या कहते हैं पद्मश्री डॉ. भगवती लाल राजपुरोहित ?

पद्मश्री से सम्मानित साहित्यकार डॉ. भगवती लाल राजपुरोहित ने बताया कि नदी का मूल नाम “शिप्रा” माना जाता है, जबकि वर्तमान समय में “क्षिप्रा” ज्यादा प्रचलित है. उन्होंने बताया कि मालवा क्षेत्र की बोलचाल में ‘श' का उच्चारण कई बार ‘स' की तरह होता है. इसी कारण स्थानीय भाषा में इसे पहले “सपरा” और फिर “सिप्रा” कहा जाने लगा. उन्होंने कहा कि इतिहास और साहित्य में भी इन नामों के प्रमाण मिलते हैं. महाकवि कालिदास ने अपने ग्रंथ 'मेघदूतम्' में “शिप्रा” शब्द का उल्लेख किया है. जबकि मालवी बोली में इसका “सिप्रा” रूप भी देखने को मिलता है. 

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शास्त्रों में क्या है नाम पंडित अक्षत व्यास ने बताया ?

वैदिक विद्वान पंडित अक्षत व्यास का कहना है कि इस नाम को लेकर भ्रम की कोई स्थिति नहीं है. स्कंद महापुराण के अवंती खंड में उज्जैन के महत्व के साथ “शिप्रा” और “क्षिप्रा” दोनों शब्दों का उल्लेख मिलता है. दोनों ही नाम एक ही पवित्र धारा के लिए प्रयुक्त हुए हैं. परंपरागत तीर्थ पुरोहितों की पीढ़ियों से चली आ रही हस्तलिखित पोथियों, मंत्रों और तर्पण विधियों में “क्षिप्रा” नाम प्रमुख रूप से दर्ज है. इसके अलावा “क्षिप्रा” शब्द का अर्थ 'तेज प्रवाह' भी माना जाता है, जो बरसात में नदी के उग्र रूप को दर्शाता है.

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