अब DU में प्रोटेस्ट! CJP आंदोलन से जुड़े यूनिवर्सिटी के सर्कुलर के खिलाफ छात्रों का धरना, क्या हैं डिमांड्स?
सीजेपी प्रोटेस्ट में छात्रों के शामिल होने से जुड़ा आदेश सिर्फ दिल्ली विश्वविद्यालय ने नहीं जारी किया था. जेएनयू, जामिया मिल्लिया इस्लामिया के अलावा और भी कई संस्थानों ने छात्रों को जंतर-मंतर न जाने की नसीहत दी थी.
दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) में फैकल्टी ऑफ आर्ट्स के गेट बाहर NSUI का प्रोटेस्ट चल रहा है. यह विरोध प्रदर्शन सोमवार, 27 जुलाई को शुरू हुआ, जो दिल्ली यूनिवर्सिटी की उस एडवाइजरी के खिलाफ हो रहा है, जिसमें छात्रों को पिछले दिनों जंतर-मंतर पर होने वाले सीजेपी प्रदर्शन में शामिल होने से आगाह किया गया था. प्रोटेस्ट करने वाले छात्रों में से पांच लोगों ने बुधवार को अनिश्चितकालीन भूख-हड़ताल का ऐलान कर दिया. डिपार्टमेंट ऑफ सोशल वर्क में मास्टर करने वाले सिद्धांत तिवारी, कैंपस लॉ सेंटर से एलएलबी करने वाले कुलदीप गुज्जर, कैंपस लॉ सेंटर में पढ़ाई कर रहे सागर चौधरी, किरोणीमल कॉलेज में सेकंड इयर के छात्र पार्थ राव और 2015 में दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ का चुनाव लड़ने वाले दीपक चौधरी तीन दिनों से भूख हड़ताल पर बैठै हैं. यूनिवर्सिटी के छात्रों ने सत्याग्रह के तीसरे दिन उपवास शुरू किया.
प्रदर्शनकारी छात्रों की क्या मांगें हैं?
कैंपस में प्रोटेस्ट कर रहे छात्रों की मांग है कि जंतर-मंतर विरोध प्रदर्शन के बारे में सोशल मीडिया पर यूनिवर्सिटी के हैंडल से की गई पोस्ट को हटाया जाए और दिल्ली यूनिवर्सिटी के वाइस-चांसलर प्रोफेसर योगेश सिंह सार्वजनिक रूप से माफी मांगें. छात्रों का कहना है कि जब तक हमारी मांगें पूरी नहीं हो जातीं, तब तक भूख हड़ताल और सत्याग्रह जारी रहेगा.
दिल्ली यूनिवर्सिटी ने क्या कहा था?
पिछले दिनों जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के बैनर तले चल रहे विरोध प्रदर्शन को लेकर दिल्ली यूनिवर्सिटी के एक्स हैंडल से किए गए पोस्ट में स्टूटेंड्ट और टीचर्स को आगाह किया गया था. विश्वविद्यालय की तरफ से कहा गया था, "प्रिय छात्रों और शिक्षकों, आपकी सुरक्षा हमारे लिए अहम है. जंतर-मंतर पर किसी भी गैरकानूनी सभा या प्रदर्शन से कानूनी कार्रवाई की जा सकती है. जंतर-मंतर पर ऐसा प्रदर्शन भारत के सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार सख्ती से रेगुलेट किया जाता है."
सर्कुलर में आगे कहा गया कि ऐसी गतिविधियां छात्रों की व्यक्तिगत सुरक्षा के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकती हैं और उनकी शैक्षणिक प्रगति और पेशेवर मौकों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकती हैं. ऐसे में, सभी छात्रों से जंतर-मंतर से दूर रहने और अपनी सुरक्षा और कानून के अनुपालन को प्राथमिकता देने की गुजारिश की जाती है. आपको सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है क्योंकि स्थिति को बढ़ावा देने के लिए बड़ी मात्रा में भ्रामक कंटेंट बनाए और प्रसारित किए जा रहे हैं.

यूनिवर्सिटी के इसी सर्कुलर को लेकर छात्रों का कहना है कि पोस्ट डिलीट किया जाए और कुलपति माफी मांगें. इसके अलावा, प्रोटेस्ट करने वाले छात्रों की और भी कई मांगें हैं, जिसकी लिस्ट उन्होंने धरना स्थल पर लगा रखी है.
गौर करने वाली बात है कि सीजेपी प्रोटेस्ट से जुड़ा इस तरह का आदेश सिर्फ दिल्ली विश्वविद्यालय ने नहीं जारी किया था. जेएनयू, जामिया मिल्लिया इस्लामिया के अलावा और भी कई संस्थानों ने छात्रों को इस तरह की नसीहत दी थी.

प्रोटेस्ट कर रहे छात्रों की कई मांगें हैं.
Photo Credit: Sakib Mazeed/NDTV
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संवैधानिक अधिकार का सवाल...
दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्रसंघ (DUSU) के वाइस प्रेसिडेंट और नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) के छात्र नेता राहुल यादव झांसला NDTV के साथ बातचीत में कहते हैं, "यूनिवर्सिटी के सोशल मीडिया हैंडल को बीजेपी के प्रोमोशन के लिए यूज किया जा रहा है. ऐसे में हमारी मांग है कि यूनिवर्सिटी के वीसी उसी एक्स हैंडल से छात्रों से माफी मांगें. हमें संवैधानिक अधिकार से कैसे वंचित रखा जा सकता है?"
'प्रोटेस्ट अवैध कैसे हो सकता है?'
'डिपार्टमेंट ऑफ सोशल वर्क' के छात्र सिद्धांत तिवारी कहते हैं, "सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए छात्रों को धमकी दी गई. प्रोटेस्ट अवैध कैसे हो सकता है? विरोध करना हमारा संवैधानिक अधिकार है. अगर किसी छात्र को लगता है कि यह छात्रों का मुद्दा है, तो उसे क्यों नहीं जाना चाहिए? छात्रों ने जंतर-मंतर जैसे प्लेटफॉर्म को अपने मुद्दों को उठाने के लिए यूज किया. इन्होंने तानाशाही रवैया अपनाया, जो अच्छा नहीं है."
सिद्धांत तिवारी आगे कहते हैं कि आज हमारे विश्वविद्यालय की रैंकिंग गिरती जा रही है क्योंकि प्रोटेस्ट के अधिकारों को छीना जा रहा है.

छात्रों ने प्रदर्शन स्थल उन जूतों-चप्पलों को इकट्ठा कर रखा है, जो जंतर-मंतर प्रोटेस्ट के वक्त पुलिस एक्शन के दौरान छूट गए थे.
Photo Credit: Sakib Mazeed/NDTV
'प्रोटेस्ट गलत तो इस्तीफा क्यों हुआ?'
प्रोटेस्ट में शामिल, हिंदू कॉलेज से पास आउट एमए के छात्र सागर चौधरी कहते हैं, "एडमिनिस्ट्रेशन से हमारा एक ही सवाल है कि जब संविधान में सभी को बोलने का अधिकार दिया गया है, तो कैसे रोका जा सकता है? अगर जंतर-मंतर जाना गलत था, तो धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा क्यों दिलवाया गया. जैसे इस्तीफा दिलवाया गया है, उसी तरह पोस्ट भी डिलीट कर दिया जाए."
वे आगे बताते हैं, "हमारे प्रोटेस्ट पर बैठने के बाद एक कमेटी बनाई गई है, मेंबर्स हमारे पास आते हैं और बीच का रास्ता निकालने को कहते हैं. हमें यही लग रहा है कि जब तक हमारे बीच से कोई मरेगा नहीं, तब तक हमारी चीजें नहीं सुनी जाएंगी."
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'यह दुर्भाग्यपूर्ण है...'
दिल्ली यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग में प्रोफेसर अपूर्वानंद कहते हैं, "हिंदुस्तान के इतिहास में ऐसा कभी नहीं देखा गया कि आधिकारिक तौर पर कोई विश्वविद्यालय छात्रों को किसी प्रदर्शन में जाने से मना करे और सर्कुलर जारी करे. मेरे खयाल में यह पहली मर्तबा है. यह असाधारण है. उसमें एक छिपी हुई धमकी भी दिखाई देती है कि अगर छात्रों ने बात नहीं मानी, तो नतीजे बुरे हो सकते हैं."
वे आगे कहते हैं कि विश्वविद्यालय एक स्वायत्त यानी ऑटोनोमस जगह है, गवर्नमेंट बॉडी नहीं है. यह एक ऐसी जगह है, जहां पर कई तरह के पॉलिटिकल ओपिनियन के लिए स्पेस बनाया जाता है. यह अथॉरिटीज की जिम्मेदारी होती है कि वे हर तरह के विचार के लिए स्पेस बनाएं. यूनिवर्सिटी की ड्यूटी होती है कि वे सभी की सुरक्षा सुनिश्चित करें.

प्रोफेसर अपूर्वानंद

डीयू कला संकाय के गेट बाहर छात्र धरने पर बैठे हैं.
Photo Credit: Sakib Mazeed/NDTV
'पोस्ट हटाया जाना चाहिए...'
नाम न छापने की शर्त पर दिल्ली यूनिवर्सिटी में पीएचडी की एक छात्रा कहती हैं, "जंतर-मंतर पर स्टूडेंट्स का प्रोटेस्ट था, ऐसे में यूनिवर्सिटी के द्वारा छात्रों को वहां जाने से नहीं रोका जाना चाहिए था. क्योंकि छात्रों की मांगे सही थीं और सरकार ने इसको माना भी है. जो होना था, वो सब कुछ हो चुका है. हम उम्मीद करते हैं कि यूनिवर्सिटी के हैंडल से किया गया पोस्ट हटा दिया जाएगा."
पेपर लीक पर बात करते हुए वे कहती हैं, "जब हम एग्जाम देने जाते हैं, तो हमारे लिए सेंटर पर जरूरी सुविधाएं भी नहीं रहती हैं, पानी तक नहीं मिलता है. चेकिंग इस तरह से होती है कि दुपट्टा और घड़ी तक उतरवा दी जाती है, तो पेपर लीक कैसे हो जाता है. इसकी जिम्मेदारी तो सरकार को ही लेनी चाहिए."

'यूनिवर्सिटी हैंडल से किया गया पोस्ट सही...'
दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्र संघ के मौजूदा सेक्रेटरी और ABVP के छात्र नेता कुणाल चौधरी कहते हैं, "मैं एबीवीपी का कार्यकर्ता हूं, मेरी एक राष्ट्रवादी सोच है. मैं दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्रों का समर्थन करता हूं, जिन्होंने मुझे वोट दिया और चुनाव जिताया. मैं NSUI की किसी भी मांग का समर्थन नहीं करता. यूनिवर्सिटी के हैंडल से किए गए पोस्ट को मैं सही मानता हूं. जंतर-मंतर प्रोटेस्ट में दिल्ली विश्वविद्यालय से वही छात्र गए, जो भारत को तोड़ने के नारे लगाते हैं."
कुनाल चौधरी ने दावा किया कि एनएसयूआई के प्रोटेस्ट को सामान्य स्टूडेंट का सपोर्ट नहीं मिल रहा है, वो छात्रों का आंदोलन नहीं है. जो लोग प्रोटेस्ट कर रहे हैं, वे एक पार्टी के लोग हैं.
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'ऐसे आदेश बिल्कुल न दिए जाएं...'
प्रोफेसर अपूर्वानंद कहते हैं, "अब इस आदेश को वापस लेने का कोई अर्थ नहीं है क्योंकि जंतर-मंतर प्रोटेस्ट खत्म हो गया है लेकिन आइंदा सभी विश्वविद्यालयों के अधिकारियों को ध्यान रखना चाहिए कि वे सरकार के हित रक्षक नहीं हैं. किसी भी प्रशासन का सिद्धांत होता है कि ऐसे आदेश बिल्कुल न दिए जाएं, जिसके बारे में आपको पता हो कि इसका उल्लंघन किया जाएगा. क्योंकि ऐसा करने से आपकी ही अथॉरिटी कम हो जाती है. जंतर-मंतर प्रोटेस्ट में दिल्ली यूनिवर्सिटी के कई स्टूडेंट दिखे. इसका मतलब, उनकी निगाह में यूनिवर्सिटी की अथॉरिटी कम हो गई. इसलिए ऐसे फैसले देने से बचना चाहिए."
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