सफलता की कहानी: गांव केवल खेती करने की जगह नहीं, ये बड़े व्यवसाय और बड़े बदलाव की शुरुआत बन सकते हैं. बस इसके लिए जरूरत है एंटरप्रेन्योरशिप कल्चर की, जिसकी शुरुआत करनी होगी. खुशबू पाटिल की इस जिद ने उनसे बेंगलुरु की कॉर्पोरेट दुनिया को अलविदा कहलवा दिया. चमचाते ऑफिस और 18 डिग्री के एसी के ठंडे तापमान को छोड़कर खुशबू सीधे खेत पगडंडियों पर आ गईं. किसान उत्पादन करता है, मौसम का जोखिम उठाता है, कर्ज लेता है, मेहनत करता है, फिर भी उसे यह नहीं पता होता कि उसकी फसल का क्या भाव मिलेगा? इस नीति को बदलने के प्रयास और अपने जिले बुरहानपुर के केला किसानों की मदद के लिए उन्होंने Banana Chips manufacturing बिजनेस की शुरुआत की. खुशबू अपने खुद के खेत में लगे केले के बाग के चिप्स बनाती हैं. उनका यह कारोबार बुरहानपुर से निकलकर धीरे-धीरे देश के अन्य राज्यों और शहरों तक फैल रहा है. अब तक उन्हें मध्य प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, गुजरात और पुणे, इंदौर समेत कई अन्य शहरों से ऑर्डर मिल चुके हैं. आइए, अब विस्तार से जानते हैं बिजनेस वुमन खुशबू पाटिल की सफलता की कहानी, कैसे उन्होंने अपने बिजनेस की शुरुआत की, कितनी लागत आई, यहां तक कैसे पहुंचीं और उनके सामने किस तरह की चुनौतियां थीं.
बुरहानपुर जिले की खुशबू पाटिल ने अपने गांव बोरसर में Banana Chips manufacturing बिजनेस की शुरुआत की. खुशबू कहती हैं गांव केवल खेती करने की जगह नहीं, ये बड़े व्यवसाय और बड़े बदलाव की शुरुआत बन सकते हैं.#SuccessStory #KhushbooPatilSuccessStory pic.twitter.com/VlSyTFBaTp
— NDTV MP Chhattisgarh (@NDTVMPCG) June 14, 2026
Chess के खेल ने बहुत कुछ सिखाया
मध्यप्रदेश के बुरहानपुर जिले के छोटे से गांव बोरसर में 5 फरवरी 2000 को जन्मी खुशबू पाटिल का किसान परिवार से आती हैं. उनके पिता युवराज पाटिल पेशे से किसान हैं, बचपन से ही खुशबू ने खेती और किसानों के जीवन को बहुत करीब से देखा है. खेत, मौसम, फसल, मंडी, कर्ज और संघर्ष हमेशा से ही उनके जीवन का हिस्सा रहे. बुरहानपुर के सेंट टेरेसा हायर सेकेंडरी स्कूल से पढ़ीं खुशबू अन्य एक्टिविटी में भी आगे थीं. करीब पांच साल तक शतरंज (Chess) खेलने के दौरान वे जिला एवं संभाग स्तर पर लगातार टॉप-3 में पायदान पर रहीं. बाद में फिर स्टेट लेवल तक भी चेस खेला.

बचपन से ही शतरंज (Chess) खेलती आ रहीं खुशबू पाटिल.

फैक्टरी में काम करती खुशबू पाटिल.
70 लाख का नुकसान, मौसम ने दिया बड़ा झटका
अब खुशबू पाटिल की कहानी उन्हीं की जुबानी... साल 2017-18 में मैंने 12वीं की परीक्षा पास की, लेकिन उसी समय तेज तूफान में उनके केले के बाग पूरी तरह खराब हो गए. परिवार को करीब 70 लाख रुपये का नुकसान हुआ. परिवार पर पहले से कर्ज था, इस झटके से और हालात खराब हो गए. मुझे पढ़ना किसी बड़े कॉलेज में था, लेकिन अब यह संभव नहीं था. हालात को देखते हुए बुरहानपुर के ही एक कॉलेज में दाखिला लेना पड़ा. पढ़ाई के साथ-साथ नौकरी भी की. खराब हालात के बीच पापा का मानिसक तनाव बढ़ा, जिसमें वे घिरते चले गए. मां अनीता पाटिल ने पूरे परिवार को संभाला और टूटने नहीं दिया. इस सब के बीच मेरे मन में बार-बार एक सवाल आता था- “सबसे ज्यादा मेहनत किसान करता है और सबसे ज्यादा नुकसान भी उसी को होता है?”
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पिता युवराज पाटिल और मां अनीता के साथ खुशबू.
नौकरी पर रहते कैसे बढ़ाया बिजनेस स्किल?
इस सब के बीच साल 2018 में मैं इंदौर गईं. ट्रैवल मैनेजमेंट का कोर्स किया, छह महीने तक नौकरी की. साथ-साथ बुरहानपुर के सेवा सदन कॉलेज से ग्रेजुएशन पूरा किया. शुरू से झुकाव कुछ क्रिएटिव या बिजनेस करने की ओर था तो “Khush Parlour Designing” नाम से एक छोटा काम किया जो अच्छा चला. इसके बाद मैंने यूनिवर्सल बिजनेस स्कूल, कर्जत से MBA किया.
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जॉब छोड़कर गांव लौटने का फैसला क्यों किया?
एनडीटीवी से बात करते हुए खुशबू कहती हैं, मैंने जॉब कर रही थी, बहुत कुछ सीख रही थी और पैसे भी काम रही थी. लेकिन, फिर भी गांव हमेशा याद रहता था. किसानों की समस्याओं की ओर बार-बार ध्यान जाता था. बस यहीं से बिजनेस के सपने की शुरुआत हुई. वे कहती है, मुझे समझ आया कि देश में उत्पादन की कमी नहीं है, बल्कि किसानों के स्तर पर वैल्यू एडिशन (Value Addition) और ब्रांडिंग (Branding) की कमी है. इसके बाद मैं निकल पड़ी एक ऐसा मॉडल बनाने, जिससे किसान अपने खेत के उत्पादन से ही अतिरिक्त आय बना सकें, मंडी, मौसम और बिचौलियों पर उनकी निर्भरता कम हो. जनवरी 2026 में मैंने नौकरी छोड़ दी और गांव लौटने का फैसला लिया.

बेंगलुरु में जॉब करती थीं खुशूब पाटिल.
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नौकरी छोड़कर 8 लाख में शुरू किया स्टार्टअप?

शुरू करने के बाद कैसे बढ़ाया बिजनेस?
खशुबू पाटिल कहती हैं, सोशल मीडिया इसके लिए सबसे अच्छा प्लेटफार्म है, मैंने उसी को अपनी ताकत बनाया, अपनी कहानी और प्रोडक्ट्स को इंस्टाग्राम के जरिए पहुंचाना शुरू किया. धीरे-धीरे लोगों का रिस्पांस मिलने लगा. अब तक हमें मध्य प्रदेश ही नहीं झारखंड, कर्नाटक, गुजरात समेत कुछ अन्य जगह से ऑर्डर मिल चुके हैं. मैं चाहती हूं कि गांवों में ऐसे छोटे-छोटे बिजनेस बढ़ें, जिससे स्थानीय स्तर पर रोजगार भी मिल सकेगा. मेरा सपना एक ऐसा मॉडल बनाने का है, जिससे किसान खुद के खेत के उत्पादन को ही उत्पाद (value-added products) बनाकर सीधे लोगों तक पहुंचा सके. उन्होंने कहा कि मेरे बिजनेस से 10 लोगों को रोजगार मिला है. मुझे भी फायदा हो रहा है. जैसे-जैसे काम बढ़ेगा इसे और बढ़ा बनाना है, जिससे गांव ही नहीं जिले के किसानों को भी फायदा हो सके.
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