- नवादा जिले के रौशन कुमार ने मां के कैंसर इलाज के लिए खेत गिरवी रखकर डेयरी व्यवसाय की शुरुआत की थी
- 36 हजार रुपये में एक गाय खरीद कर रौशन ने दूध की बिक्री से धीरे-धीरे अपनी आमदनी बढ़ाई
- आज उनके फार्म में 75 गायें हैं और वे दही, पनीर जैसे उत्पाद अमृत ब्रांड के तहत बेचते हैं
Success Story: उस दिन घर में किसी की आंखों में नींद नहीं थी. डॉक्टर ने कह दिया था कि मां को कैंसर है. इलाज लंबा चलेगा और खर्च भी बहुत होगा. परिवार के सामने सबसे बड़ा सवाल था-पैसे कहां से आएंगे? कुछ ही दिनों में खेत गिरवी रखने पड़े. मैट्रिक के बाद की पढ़ाई छूट गई. घर की आर्थिक हालत इतनी बिगड़ गई कि गांव के लोग सलाह देने लगे, "पंजाब या हरियाणा चले जाओ, वहीं कुछ काम मिल जाएगा." लेकिन 22-23 साल का वह लड़का अपनी बीमार मां को उस हालत में छोड़कर परदेस नहीं जाना चाहता था. उसी बेबसी में उसने एक फैसला लिया. ऐसा फैसला, जिसने उसकी जिंदगी की दिशा ही बदल दी.
जिस घर में कभी इलाज के लिए जमीन गिरवी रखनी पड़ी थी, आज वहीं 75 गाय और बछड़ों का डेयरी फार्म है. अच्छी-खासी आमदनी होती है और वह अनेक लोगों को सालभर रोजगार भी दे रहे हैं. यह कहानी है बिहार के नवादा जिले के अकबरपुर प्रखंड के कझिया गांव के रौशन कुमार की, जिन्होंने अपने एक निर्णय से न सिर्फ मां की जान बचाई, बल्कि खुद भी आत्मनिर्भर हो गए. आज वह दूसरों के लिए प्रेरणास्रोत बन चुके हैं.

बिहार के रौशन कुमार ने गांव को ही बनाया रोजगार का केंद्र, 36 हजार रुपये से ऐसे खड़ा किया करोड़ों का डेयरी बिजनेस
36 हजार रुपये की गाय... और शुरू हुई नई कहानी
एनडीटीवी से खास बातचीत में रौशन बताते हैं कि उनके पास कोई बड़ी पूंजी नहीं थी. उन्होंने रिश्तेदारों और शुभचिंतकों से मदद ली और 36 हजार रुपये में एक गाय खरीदी. बस, वहीं से उनकी दूसरी जिंदगी शुरू हुई. सुबह-सुबह दूध निकालना, खुद बाजार जाकर दुकानदारों को देना, फिर शाम को दोबारा वही काम. कई बार पूरा दूध नहीं बिकता था और कई लोग उधार ले जाते थे, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं छोड़ी. रौशन कहते हैं, "उस समय मेरे पास खोने के लिए कुछ बचा ही नहीं था. इसलिए हर दिन की मेहनत ही मेरा सबसे बड़ा सहारा थी."

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धीरे-धीरे बदलने लगी किस्मत
एक गाय से दो हुईं... फिर पांच... फिर दस... दूध की गुणवत्ता और समय पर आपूर्ति ने ग्राहकों का भरोसा जीत लिया. आमदनी बढ़ने लगी, तो 2014 में उन्होंने 10 गायें गव्य विकास विभाग से अनुदान पर लीं. इसके बाद डेयरी को बड़ा आकार दिया. आज उनके फार्म में 75 गायें और बछड़े हैं. हर दिन करीब 150 लीटर दूध बाजार पहुंचता है. रौशन केवल दूध बेचने तक सीमित नहीं रहे; उन्होंने दही, पनीर और मिल्क शेक जैसे उत्पाद भी बनाना शुरू किया, जिन्हें वह "अमृत" ब्रांड नाम से स्थानीय बाजार में बेचते हैं.

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देसी गायों के पालन पर बल
साल 2014 में कृषि विज्ञान केंद्र, सेखोदेवरा में प्रशिक्षण के दौरान रौशन को देसी नस्ल की गायों के महत्व के बारे में जानकारी मिली. उसके बाद उन्होंने धीरे-धीरे देसी गायों की संख्या बढ़ानी शुरू की. आज उनके फार्म में 26 देसी नस्ल की गायें हैं. उनका मानना है कि देसी गायों की देखभाल आसान होती है, वे बीमार कम पड़ती हैं और उनका दूध अधिक पौष्टिक होता है.
डेयरी ने खेती भी बदल दी
गायों से मिलने वाला गोबर अब खेतों के लिए जैविक खाद बनता है. इससे खेती की लागत कम हुई और उत्पादन बढ़ा. रौशन कहते हैं, "खेती और पशुपालन साथ-साथ हों, तो किसान की आय कई गुना बढ़ सकती है."

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दूसरे युवाओं के लिए संदेश
नवादा के जिला गव्य विकास पदाधिकारी राकेश कुमार निराला कहते हैं कि रौशन कुमार इस बात का उदाहरण हैं कि अगर वैज्ञानिक तरीके से पशुपालन किया जाए, तो गांव में भी सम्मानजनक आय अर्जित की जा सकती है. सरकार डेयरी इकाई स्थापित करने के लिए सामान्य वर्ग को 50 प्रतिशत तथा एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग को 75 प्रतिशत तक अनुदान भी उपलब्ध करा रही है.
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