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मां से बिछड़कर 18 माह की बाघिन हुई कमजोर, वनकर्मी पर 'अटैक' के बाद शुरू की तलाश, फिर...

मध्य प्रदेश के रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व में वनकर्मी पर हमला करने वाली 18 माह की बाघिन को रेस्क्यू कर जबलपुर भेजा गया. जांच में सामने आया कि वह कई दिनों से भूखी और कमजोर थी.

मां से बिछड़कर 18 माह की बाघिन हुई कमजोर, वनकर्मी पर 'अटैक' के बाद शुरू की तलाश, फिर...
टाइगर का रेस्क्यू कर ले जाते वनकर्मी.
  • रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व में 18 माह की बाघिन ने वनकर्मी पर हमले के बाद चिकित्सकीय जांच कराई गई.
  • प्राथमिक जांच में बाघिन की कमजोरी और पैरों में सूजन पाई गई, जो लंबे समय से भोजन न मिलने का परिणाम है.
  • विशेषज्ञों के अनुसार बाघिन मां से अलग होकर शिकार सीखने के कठिन दौर से गुजर रही थी, जिससे उसकी हालत खराब हुई.

जंगल की दुनिया में हर दिन एक नई चुनौती होती है. खासकर तब, जब कोई युवा बाघ या बाघिन अपनी मां से अलग होकर पहली बार अकेले जीवन की शुरुआत करता है. शिकार करना सीखना, अपनी अलग पहचान बनाना और जंगल में अपनी जगह तय करना आसान नहीं होता. रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व की 18 माह की एक बाघिन भी ऐसे ही संघर्ष के दौर से गुजर रही थी. भूख, कमजोरी और असुरक्षा के बीच उसने एक ऐसी प्रतिक्रिया दी, जिसने उसे सुर्खियों में ला दिया. अब उसके स्वास्थ्य की जांच के बाद जो तथ्य सामने आए हैं, उन्होंने इस पूरी घटना को एक नए नजरिये से देखने का मौका दिया है.

वनकर्मी पर हमले के बाद शुरू हुई तलाश

कुछ दिन पहले रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व में रात्रि गश्त के दौरान एक बाघ ने वन अमले पर हमला कर दिया था. इस घटना में एक वन रक्षक घायल हो गया था. घटना के बाद वन विभाग ने पूरे क्षेत्र में सघन तलाश अभियान शुरू किया. कई टीमें लगातार जंगल में निगरानी कर रही थीं. आखिरकार हाथी दल की सहायता से जंगल में एक बाघ दिखाई दिया, जिसके बाद उसकी पहचान की प्रक्रिया शुरू हुई.

पंजों के निशान से हुई पुष्टि

वन विभाग ने घटनास्थल पर मिले पंजों के निशानों का मिलान किया. जांच में सामने आया कि यही वह बाघ था, जिसने वन रक्षक पर हमला किया था. इसके बाद अधिकारियों ने उसे चिकित्सकीय परीक्षण के लिए रेस्क्यू करने का फैसला लिया. जबलपुर से विशेषज्ञ पशु चिकित्सकों की टीम बुलाई गई और पूरी सावधानी के साथ बाघिन को पकड़कर जांच के लिए भेजा.

जांच में सामने आई बाघिन की हालत

प्राथमिक मेडिकल जांच में पता चला कि यह करीब 18 माह की बाघिन है. डॉक्टरों ने पाया कि वह लंबे समय से पर्याप्त भोजन नहीं मिलने के कारण काफी कमजोर हो चुकी थी. उसके पेट में भोजन नहीं था और पैरों में सूजन भी पाई गई. उसकी शारीरिक स्थिति को देखते हुए विशेषज्ञों ने विस्तृत उपचार और निगरानी की सलाह दी. इसके बाद बाघिन को बेहतर इलाज के लिए जबलपुर भेजा.

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बीमार बाघिन का इलाज करते वनकर्मी. 

मां से अलग होने के बाद शुरू हुआ संघर्ष

वन्यजीव विशेषज्ञ विपिन श्रीवास्तव बताते हैं कि बाघों के जीवन में 15 से 18 माह की उम्र बेहद महत्वपूर्ण होती है. इसी समय बाघिन अपने शावकों को स्वतंत्र जीवन के लिए छोड़ देती है. इसके बाद युवा बाघों को अपनी अलग टेरिटरी बनानी होती है और खुद शिकार करना सीखना पड़ता है. यह समय उनके जीवन का सबसे कठिन दौर माना जाता है.

शिकार नहीं मिला तो बढ़ी मुश्किल

विशेषज्ञों के अनुसार रेस्क्यू की गई बाघिन भी ऐसे ही संक्रमण काल से गुजर रही थी. मां से अलग होने के बाद वह जंगल में अपने दम पर शिकार करने की कोशिश कर रही थी, लेकिन इसमें सफल नहीं हो पा रही थी. लगातार पर्याप्त भोजन नहीं मिलने के कारण उसका शरीर कमजोर होता चला गया. यही वजह है कि उसकी हालत सामान्य बाघिनों की तुलना में काफी खराब दिखाई दी.

वनकर्मी पर क्यों किया हमला?

वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि वनकर्मी पर हुआ हमला शिकार करने की नीयत से नहीं बल्कि आत्मरक्षा की प्रतिक्रिया हो सकता है. घटना के दौरान गश्ती दल का वाहन बाघिन के काफी करीब पहुंच गया. अचानक खतरा महसूस होने पर उसने हमला कर दिया. वन्यजीव विज्ञान में इसे "मॉक अटैक" कहा जाता है, जिसमें जानवर खुद को सुरक्षित रखने के लिए आक्रामक व्यवहार करते हैं.

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मां से बिछड़कर जंगल में उदास बैठी बाघिन. 

घायल वन रक्षक की हालत में सुधार

रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व के डीएफओ रजनीश कुमार सिंह के अनुसार हमले में घायल हुए वन रक्षक का इलाज जारी है और उसकी हालत में लगातार सुधार हो रहा है. वहीं बाघिन का विस्तृत चिकित्सकीय परीक्षण कराया है. मेडिकल रिपोर्ट आने के बाद उसके उपचार और पुनर्वास को लेकर आगे का फैसला किया जाएगा.

स्वस्थ होने पर फिर जंगल में लौटेगी बाघिन

वन विभाग का कहना है कि यदि बाघिन पूरी तरह स्वस्थ पाई जाती है और स्वतंत्र रूप से शिकार करने में सक्षम हो जाती है, तो उसे दोबारा जंगल में छोड़ दिया जाएगा. विभाग का उद्देश्य उसे हमेशा के लिए कैद में रखना नहीं, बल्कि उसके प्राकृतिक जीवन में वापस भेजना है, ताकि वह अपने प्राकृतिक व्यवहार के साथ जंगल में रह सके.

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