- मध्य प्रदेश में जुलाई का पहला पखवाड़ा बीता, फिर भी हजारों छात्रों को किताबों का इंतजार.
- एनसीईआरटी की कई किताबें स्कूल और बुक स्टॉल पर उपलब्ध नहीं.
- शिक्षक पीडीएफ, स्मार्ट क्लास, ऑनलाइन नोट्स और प्रिंटआउट से पढ़ा रहे.
मध्य प्रदेश में नया शैक्षणिक सत्र शुरू हुए दो सप्ताह से ज्यादा का समय बीत चुका है, लेकिन हजारों स्कूलों के लाखों छात्र अब भी किताबों का इंतजार कर रहे हैं. नौवीं से बारहवीं तक की कक्षाओं के विद्यार्थियों के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि पढ़ाई शुरू हो चुकी है, शिक्षक पाठ पढ़ा रहे हैं, लेकिन बच्चों के हाथों में पाठ्यपुस्तकें नहीं हैं.
ऐसे में पढ़ाई का पूरा भार मोबाइल, पीडीएफ और इंटरनेट पर आ गया है. हालात यह हैं कि स्कूलों में शिक्षक डिजिटल सामग्री के सहारे पढ़ा रहे हैं, जबकि घर पहुंचने के बाद छात्र बिना किताबों के रिवीजन और तैयारी करने को मजबूर हैं. यह स्थिति न सिर्फ शिक्षा व्यवस्था की तैयारियों पर सवाल खड़े कर रही है, बल्कि बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों की चिंता भी बढ़ा रही है.
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आधा महीना बीता, किताबें अब भी गायब
जुलाई का पहला पखवाड़ा बीत चुका है, लेकिन नौवीं, दसवीं, ग्यारहवीं और बारहवीं कक्षा की कई एनसीईआरटी किताबें अब भी छात्रों तक नहीं पहुंच पाई हैं. स्कूलों और बुक स्टॉल्स पर विद्यार्थियों और अभिभावकों को खाली हाथ लौटना पड़ रहा है. नई कक्षाओं की पढ़ाई शुरू हो चुकी है, लेकिन पाठ्यपुस्तकों की अनुपलब्धता ने पूरे शैक्षणिक सत्र की शुरुआत को प्रभावित कर दिया है.

मोबाइल और पीडीएफ के सहारे चल रही पढ़ाई
किताबों की कमी के कारण स्कूलों में पढ़ाई का तरीका बदल गया है. शिक्षक इंटरनेट से सामग्री डाउनलोड कर बच्चों को पढ़ा रहे हैं. स्मार्ट क्लास, पीडीएफ और ऑनलाइन नोट्स के सहारे किसी तरह पाठ्यक्रम पूरा करने की कोशिश की जा रही है. हालांकि यह व्यवस्था अस्थायी राहत तो दे रही है, लेकिन किताबों का विकल्प नहीं बन पा रही है.
छात्रों की सबसे बड़ी परेशानी
विद्यार्थियों का कहना है कि स्कूल में शिक्षक किसी तरह अध्याय समझा देते हैं, लेकिन घर पहुंचने के बाद कठिनाई शुरू हो जाती है. किताबें नहीं होने से वे न तो ठीक से रिवीजन कर पा रहे हैं और न ही नोट्स तैयार कर पा रहे हैं. कई छात्रों का कहना है कि लंबे समय तक मोबाइल या लैपटॉप की स्क्रीन देखने से आंखों में दर्द और सिरदर्द जैसी समस्याएं भी सामने आ रही हैं.

अभिभावक भी महसूस कर रहे हैं लाचारी
बच्चों की पढ़ाई को लेकर अभिभावकों की चिंता लगातार बढ़ रही है. अभिभावक अपर्णा गुप्ता का कहना है कि पाठ्यपुस्तकें नहीं होने के कारण वे यह भी नहीं समझ पा रहे कि इस साल का पाठ्यक्रम क्या है और उसमें क्या बदलाव हुए हैं. जब बच्चे घर पर पढ़ाई के दौरान सवाल पूछते हैं तो माता-पिता के पास संदर्भ के लिए कोई किताब नहीं होती. इससे बच्चों की पढ़ाई में मदद करना उनके लिए मुश्किल हो गया है.
शिक्षक वैकल्पिक व्यवस्था से संभाल रहे स्थिति
शिक्षक रोनित जैन का कहना है कि वे बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो इसके लिए अतिरिक्त प्रयास कर रहे हैं. कई स्कूलों में अध्यायों के प्रिंटआउट बांटे जा रहे हैं, जबकि कुछ जगहों पर डिजिटल नोट्स उपलब्ध कराए जा रहे हैं. बावजूद इसके, शिक्षक भी मानते हैं कि नियमित पढ़ाई के लिए पाठ्यपुस्तकों का होना बेहद जरूरी है.
वरिष्ठ कक्षाओं में सबसे ज्यादा असर
जानकारों के अनुसार, नौवीं और दसवीं की तुलना में ग्यारहवीं और बारहवीं कक्षाओं में किताबों की कमी ज्यादा गंभीर है. विज्ञान, वाणिज्य और कला संकाय के अलग-अलग विषयों की पुस्तकें समय पर उपलब्ध नहीं हो सकी हैं. भौतिकी, रसायन विज्ञान, गणित, जीव विज्ञान, अर्थशास्त्र और इतिहास जैसे विषयों की किताबों की मांग सबसे अधिक है.
सप्लाई में देरी की क्या है वजह?
शिक्षा क्षेत्र से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, पाठ्यक्रम में हुए कुछ बदलावों और अंतिम मंजूरी की प्रक्रियाओं के कारण प्रिंटिंग कार्य समय पर शुरू नहीं हो सका. इसके अलावा बड़े पैमाने पर किताबों की छपाई, कागज की उपलब्धता और वितरण व्यवस्था में आई चुनौतियों ने भी सप्लाई को प्रभावित किया. मानसून के कारण दूर-दराज इलाकों तक किताबें पहुंचाने में भी देरी बताई जा रही है.
बोर्ड परीक्षार्थियों की बढ़ी चिंता
दसवीं और बारहवीं के लिए सत्र का शुरुआती समय सबसे अहम माना जाता है. इसी दौरान छात्र अपनी पढ़ाई की नींव मजबूत करते हैं. लेकिन किताबें नहीं मिलने से उनकी तैयारी प्रभावित हो रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द किताबें उपलब्ध नहीं कराई गईं तो इसका असर विद्यार्थियों के शैक्षणिक प्रदर्शन पर भी पड़ सकता है.
बड़ा सवाल: डिजिटल विकल्प कब तक?
शिक्षा विभाग भले ही डिजिटल माध्यमों से पढ़ाई जारी रखने की बात कह रहा हो, लेकिन प्रदेश के हर छात्र के पास समान डिजिटल सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं. ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट, स्मार्टफोन और अन्य संसाधनों की कमी आज भी बड़ी चुनौती बनी हुई है. ऐसे में सवाल यही है कि जब तक किताबें नहीं पहुंचतीं, तब तक लाखों विद्यार्थियों की पढ़ाई का नुकसान कौन पूरा करेगा? नई शिक्षा व्यवस्था और डिजिटल शिक्षा के दावों के बीच जमीनी हकीकत यही है कि छात्र आज भी अपनी किताबों का इंतजार कर रहे हैं.
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