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MP में बाघ की मौत का जिम्मेदार 'अमेरिका-ईरान युद्ध' ? 23 दिन गायब रहा सिग्नल, फिर दफन मिली लाश

Satpura Reserve Tiger Killed: मध्य प्रदेश के सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में एक रेडियो-कॉलर लगे बाघ की मौत ने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं. वन विभाग ने 23 दिनों तक सिग्नल गायब रहने के पीछे 'खाड़ी युद्ध' और 'सैटेलाइट ग्लिच' का अजीबोगरीब तर्क दिया है, जबकि बाघ का शव गड्ढे में दफन मिला. विशेषज्ञों ने विभाग की इस थ्योरी को खारिज करते हुए इसे निगरानी प्रोटोकॉल की बड़ी लापरवाही बताया है.

MP में बाघ की मौत का जिम्मेदार 'अमेरिका-ईरान युद्ध' ? 23 दिन गायब रहा सिग्नल, फिर दफन मिली लाश
  • सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में लगे सैटेलाइट कॉलर वाले बाघ की मौत 23 दिनों तक अनदेखी की गई, शव डॉग स्क्वॉड ने खोजा
  • वन विभाग ने बाघ के सिग्नल गायब होने को खाड़ी युद्ध से जोड़कर संभावित सैटेलाइट ग्लिच बताया
  • बाघ की मौत के कारणों में विभाग के दावे लगातार बदलते रहे, जिसमें जहर, यूरिया और बिजली का करंट शामिल थे
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MP Tiger Death News: क्या हजारों किलोमीटर दूर चल रहा अमेरिका-ईरान युद्ध भारत में बाघों की निगरानी को प्रभावित कर सकता है? यह चौंकाने वाला सवाल NDTV को मिले 28 मार्च के एक गोपनीय मेमो से खड़ा हो गया है. दरअसल सतपुड़ा टाइगर रिजर्व की फील्ड डायरेक्टर राखी नंदा ने राज्य वन मुख्यालय को एक मेमो भेजा था, जिसमें एक रेडियो-कॉलर लगे बाघ के सिग्नल गायब होने की वजह “गल्फ वॉर से जुड़े संभावित सैटेलाइट ग्लिच” को बताया गया है. हालांकि, गौर करने वाली बात ये है कि यह हैरान करने वाला दावा ऐसे समय में सामने आया है जब जमीनी हकीकत इससे कहीं ज्यादा भयावह कहानी बयां कर रही है. दरअसल, चार साल का एक बाघ, जिसकी गर्दन में करीब 6 लाख रुपये का सैटेलाइट कॉलर लगा था, 3 मार्च को अचानक गायब हो गया और पूरे 23 दिनों तक उसकी कोई जमीनी जांच नहीं की गई. जब टीम मौके पर पहुंची तो पता चला कि बाघ का शिकार कर उसे दफना दिया गया था. अब यह पूरा मामला वन विभाग की कार्यप्रणाली, लेटलतीफी और अंतरराष्ट्रीय युद्ध के अजीबोगरीब बहानों को लेकर सवालों के घेरे में आ गया है.

सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में 23 दिनों के बाद डॉग स्क्वॉड की मदद से बाघ का शव बरामद हुआ

सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में 23 दिनों के बाद डॉग स्क्वॉड की मदद से बाघ का शव बरामद हुआ

23 दिन बाद गड्ढे में दफन मिला बाघ का शव

जमीनी स्तर पर लापरवाही की कहानी बेहद खौफनाक है. स्थापित प्रोटोकॉल के अनुसार, अगर रेडियो कॉलर से 8 घंटे तक सिग्नल नहीं मिलता है तो तुरंत फील्ड टीम को मौके पर भेजा जाना चाहिए, लेकिन इस मामले में ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ. पूरे 23 दिनों की खामोशी के बाद जब 27-28 मार्च को वन विभाग की टीम छिंदवाड़ा के संगाखेड़ा रेंज के छतियाम गांव पहुंची, तो वहां रोंगटे खड़े कर देने वाली सच्चाई सामने आई. शिकारियों ने पहले एक बैल को मारकर उसे चारे के रूप में इस्तेमाल किया था और उसकी पहचान छिपाने के लिए उसके दोनों कान काट दिए थे. बाघ ने जब उस मांस को खाया, तो उसे मार दिया गया. इसके बाद शिकारियों ने बाघ के गले में लगे कॉलर को जलाकर सबूत मिटाने की कोशिश की और शव को 200 मीटर दूर एक गड्ढे में दफना दिया. करीब 24 दिन पुराना यह शव डॉग स्क्वॉड की मदद से बरामद हुआ और पूछताछ के बाद जमीन के मालिक उदेसिंह सहित पांच आरोपियों को अब तक गिरफ्तार किया जा चुका है.

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वन विभाग की 'नॉर्मल' दलीलें और हकीकत

इतनी बड़ी देरी के बावजूद वन विभाग का यही कहना है कि निगरानी “मानक प्रक्रिया” के तहत ही की जा रही थी. फील्ड डायरेक्टर राखी नंदा के मुताबिक, अधिकारी डब्ल्यूडब्ल्यूएफ (WWF) के साथ लगातार संपर्क में थे, क्योंकि यह कॉलर उन्हीं के द्वारा लगाया गया था. उन्होंने ही मप्र वन विभाग के अधिकारियों को बताया था कि युद्ध की वजह से सिग्नल में दिक्कत हो सकती है. इसके अलावा उन्होंने यह भी तर्क दिया कि सिग्नल का गिरना कोई नई बात नहीं है और जब बाघ घने जंगल में आराम कर रहा होता है तो अक्सर सिग्नल ड्रॉप हो जाते हैं. ऐसे मामलों में टीम वीएचएफ रिसीवर की मदद से फील्ड मॉनिटरिंग करती है. जब उनसे 23 दिन तक कोई सक्रिय जमीनी जांच न करने पर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि बाघ ने अपना क्षेत्र स्थापित कर लिया था और उसे सामान्य प्रोटोकॉल के तहत ही मॉनिटर किया जा रहा था.
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एक्सपर्ट्स ने खाड़ी युद्ध के दावे को नकारा

जहां वन विभाग सिग्नल गायब होने के पीछे “गल्फ वॉर” का हवाला दे रहा है, वहीं वन्यजीव विशेषज्ञ इस दलील को सिरे से खारिज कर रहे हैं.

पूर्व आईएफएस अधिकारी और “टाइगर मैन” के नाम से प्रसिद्ध आर. श्रीनिवास मूर्ति ने विभाग के इस दावे को “पूरी तरह गलत और लगभग असंभव” करार दिया है. उनका कहना है कि सैटेलाइट कॉलर की बैटरी आमतौर पर छह महीने में खत्म हो जाती है, इसलिए इतने लंबे समय तक इसका सक्रिय रहना ही अपने आप में बड़ा सवाल है.

इसके अलावा अन्य टेलीमेट्री विशेषज्ञों का भी मानना है कि सिग्नल गायब होने के पीछे जंगल का कठिन भू-भाग, बैटरी का फेल होना या फिर उपकरण की खराबी जैसी ठोस वजहें ज्यादा मुमकिन हैं, न कि कोई अंतरराष्ट्रीय युद्ध.

बदलते बयानों ने बढ़ाई विभाग की उलझन

इस मामले को सबसे ज्यादा संदेहास्पद मौत के कारणों को लेकर वन विभाग के बदलते बयानों ने बना दिया है. सबसे पहले यह कहा गया कि बाघ की मौत जहर देने से हुई है. इसके कुछ समय बाद दावा किया गया कि बाघ ने यूरिया खा लिया था, जिससे उसकी जान गई. अब ताजा थ्योरी यह सामने आ रही है कि बाघ की मौत बिजली के तार से करंट लगने के कारण हुई है. वन्यजीव विशेषज्ञ इन विरोधाभासी दावों पर तीखे सवाल उठा रहे हैं. उनका कहना है कि यूरिया खाने से तुरंत मौत नहीं होती बल्कि उल्टी होती है, इसलिए बिना वैज्ञानिक रिपोर्ट के ऐसे दावे करना गलत है. वहीं अगर मौत बिजली के करंट से हुई, तो यह सवाल उठता है कि एक बेहद संवेदनशील टाइगर रिजर्व के अंदर खुले बिजली के तार क्या कर रहे थे.

लापरवाही और प्रोटोकॉल के उल्लंघन के आरोप

वन्यजीव कार्यकर्ता अजय दुबे ने इस पूरे घटनाक्रम को “प्रोटोकॉल की पूरी तरह विफलता” बताया है. उन्होंने वन विभाग पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि सैटेलाइट कॉलर लगे बाघ की रियल-टाइम मॉनिटरिंग होनी चाहिए थी और 8 घंटे के सिग्नल गैप के बाद ही तुरंत सर्च ऑपरेशन शुरू हो जाना चाहिए था. उन्होंने कहा, "फॉरेस्ट लगातार अपने बयान बदल रहा है. अब वह कह रहा है कि बाघ को बिजली के तार से मारा गया. हमारा कहना है कि यह साफ तौर पर लापरवाही है. इतने संवेदनशील क्षेत्र में बिजली के तार और अफीम की खेती कैसे हो रही थी? मरे हुए बाघ का जबड़ा और पंजे गायब हैं. इस मामले में वन अधिकारियों, खासकर वरिष्ठ अधिकारियों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए."

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मध्य प्रदेश में लगातार बढ़ रहा बाघों का डेथ रेट

यह लापरवाही की घटना कोई इकलौती नहीं है. हाल ही में शिवपुरी के माधव नेशनल पार्क में भी एक रेडियो कॉलर चार दिन की देरी से गिरने की खबर सामने आई थी, जिससे मॉनिटरिंग सिस्टम पर सवाल और गहरे हो गए हैं. यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय में हो रहा है जब मध्य प्रदेश में बाघों की मौत का ग्राफ लगातार ऊपर जा रहा है. आंकड़ों के मुताबिक 2022 में 43, 2023 में 45, 2024 में 46 और 2025 में रिकॉर्ड 54 बाघों की मौत हुई थी. साल 2026 में भी अब तक करीब 16 बाघों की मौत हो चुकी है, जबकि देश में अखिल भारतीय बाघ गणना का काम अपने अंतिम चरण में चल रहा है.

जंगल में अफीम की खेती का बड़ा नेटवर्क

इस बाघ की मौत की जांच के दौरान ही उसी इलाके में एक बड़े अवैध नेटवर्क का भी पर्दाफाश हुआ है. जांच टीमों को तामिया के पास जंगल में 6,148 अफीम के पौधे मिले, जिनका कुल वजन 194.5 किलोग्राम था. हैरानी की बात यह है कि पुलिस को इसकी सूचना 28 मार्च को ही दे दी गई थी, लेकिन पुलिस टीम अगले दिन मौके पर पहुंची, जिससे सरकारी तंत्र की सुस्ती एक बार फिर उजागर हो गई. इस मामले में अब अलग से एनडीपीएस एक्ट के तहत केस दर्ज कर लिया गया है.

अब सबसे बड़ा और यक्ष प्रश्न यही बना हुआ है कि क्या वाकई सुदूर चल रहे खाड़ी युद्ध ने सतपुड़ा के शांत जंगलों में बाघों की सैटेलाइट निगरानी को ठप कर दिया था, या फिर यह जमीनी स्तर पर हुई एक अक्षम्य और गंभीर लापरवाही को छिपाने के लिए कूटनीतिक पर्दा डालने की कोशिश है? इस पूरे घटनाक्रम में एक कड़वी सच्चाई तो साफ नजर आती है कि सैटेलाइट से जुड़ा, आधुनिक तकनीक से लैस, और कड़े कानून से संरक्षित देश का एक राष्ट्रीय पशु 23 दिनों तक गायब रहता है, मार दिया जाता है, दफना दिया जाता है और हमारे सिस्टम को इसकी भनक तक नहीं लगती.
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