- मध्य प्रदेश के उमरिया के ग्राम मढ़ी में स्थित सीतामढ़ी के प्राचीन शिव मंदिर आठवीं और नौवीं शताब्दी के हैं.
- यह मंदिर समूह लाल बलुआ पत्थर से निर्मित है, जिसमें उत्कृष्ट नक्काशी और स्थापत्य कला की झलक मिलती है.
- मंदिरों में तीन शिवलिंग स्थापित हैं, जो स्थानीय और दूर-दराज के श्रद्धालुओं के लिए धार्मिक महत्व रखते हैं.
मध्य प्रदेश के उमरिया जिले की शांत वादियों के बीच एक ऐसा स्थान मौजूद है, जहां इतिहास और आस्था सदियों से साथ-साथ सांस ले रहे हैं. पाली विकासखंड के ग्राम मढ़ी में स्थित सीतामढ़ी के प्राचीन शिव मंदिर सिर्फ पूजा-अर्चना का केंद्र नहीं हैं, बल्कि वे उस दौर की कहानी भी सुनाते हैं, जब पत्थरों पर की गई नक्काशी ही कला और स्थापत्य की सबसे बड़ी पहचान हुआ करती थी. 8वीं और 9वीं शताब्दी में बने ये मंदिर आज भी अपने मूल स्वरूप में खड़े हैं और आने वाले हर व्यक्ति को अतीत की एक अनमोल झलक दिखाते हैं. सावन के महीने में यहां श्रद्धा उमड़ती है, तो इतिहास प्रेमियों को इन मंदिरों की बनावट और निर्माण शैली अपनी ओर आकर्षित करती है.
सदियों पुराना इतिहास समेटे हुए है सीतामढ़ी
उमरिया जिले के पाली विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत बरदढ़ार के ग्राम मढ़ी में स्थित सीतामढ़ी का मंदिर समूह करीब 8वीं और 9वीं शताब्दी का इतिहास अपने भीतर समेटे हुए है. समय के साथ आसपास की दुनिया में कई बदलाव आए, लेकिन इन मंदिरों की पहचान और महत्व आज भी बरकरार है. यह स्थान क्षेत्र की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है.
तीन शिव मंदिरों का अनोखा समूह
सीतामढ़ी में प्राचीन मंदिरों का एक समूह मौजूद है, जिसमें तीन शिव मंदिर शामिल हैं. इन मंदिरों में शिवलिंग स्थापित हैं और यहां आने वाले श्रद्धालु भगवान शिव की पूजा-अर्चना कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं. धार्मिक दृष्टि से यह स्थान स्थानीय लोगों के साथ-साथ दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए भी विशेष महत्व रखता है.

मंदिर के बाहर लगा है एक शिलालेख, जिसपर इसका इतिहास अंकित है.
लाल बलुआ पत्थर (अवसादी चट्टान) की अद्भुत कारीगरी
इन मंदिरों का निर्माण लाल बलुआ पत्थर यानी अवसादी चट्टानों से नक्काशी कर किया गया है. मंदिरों की दीवारों और संरचना में उस समय के शिल्पकारों की कला साफ दिखाई देती है. पत्थरों पर उकेरे गए स्वरूप और निर्माण शैली यह बताते हैं कि उस दौर में स्थापत्य कला कितनी विकसित और समृद्ध थी. यही वजह है कि ये मंदिर पुरातात्विक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माने जाते हैं.
हर पत्थर सुनाता है इतिहास की कहानी
सीतामढ़ी के मंदिरों को देखकर ऐसा महसूस होता है मानो इतिहास आज भी यहां जीवित हो. सदियों पुरानी यह संरचना उस समय की याद दिलाती है, जब मंदिर निर्माण केवल धार्मिक कार्य नहीं बल्कि कला और संस्कृति की अभिव्यक्ति भी हुआ करता था. यहां मौजूद स्थापत्य शैली उस युग की जीवनशैली और धार्मिक मान्यताओं की झलक प्रस्तुत करती है.

ये मंदिर दिखने में जितने खूबसूरत है, इनका इतिहास उतना ही रोचक है.
सावन में बढ़ जाती है श्रद्धालुओं की आस्था
सावन के महीने में सीतामढ़ी का महत्व और अधिक बढ़ जाता है. भगवान शिव के भक्त बड़ी संख्या में यहां पहुंचते हैं और विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं. मंदिर परिसर में पूरे महीने श्रद्धा और भक्ति का माहौल बना रहता है. कई श्रद्धालु इसे अपनी आस्था का प्रमुख केंद्र मानते हैं और हर वर्ष यहां दर्शन के लिए आते हैं.
इतिहास प्रेमियों के लिए भी खास आकर्षण
सीतामढ़ी केवल धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि इतिहास और पुरातत्व में रुचि रखने वाले लोगों के लिए भी आकर्षण का केंद्र है. मंदिरों की प्राचीन बनावट, उनकी संरचना और उनमें दिखाई देने वाली शिल्प कला शोधकर्ताओं और पर्यटकों का ध्यान अपनी ओर खींचती है. यहां पहुंचने वाले लोग एक साथ इतिहास, कला और आध्यात्मिकता का अनुभव कर सकते हैं.
विरासत की अमूल्य धरोहर
पीढ़ियां बदलती रहीं, समय आगे बढ़ता रहा, लेकिन सीतामढ़ी के ये प्राचीन शिव मंदिर आज भी अपनी जगह अडिग खड़े हैं. ये मंदिर केवल पत्थरों से बनी संरचनाएं नहीं, बल्कि उमरिया जिले की सांस्कृतिक पहचान और गौरवशाली विरासत के जीवंत प्रतीक हैं. सदियों बाद भी यह धरोहर इतिहास, आस्था और भारतीय स्थापत्य कला की कहानी आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचा रही है.
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