- मध्य प्रदेश के सीहोर जिले में पातालेश्वर महादेव मंदिर में 11,000 लीटर दूध नर्मदा नदी में
- यह अनुष्ठान 21 दिनों तक चला और इसमें भक्तों ने धार्मिक आस्था के तहत दूध का विशाल अभिषेक किया।
- राज्य में लाखों बच्चे कुपोषण का शिकार हैं, जिससे बड़ी मात्रा में दूध बहाने को लेकर सामाजिक विवाद उत्पन्न हुआ।
Narmada Milk Waste: मध्य प्रदेश की जीवनदायिनी मानी जाने वाली नर्मदा नदी के आंचल में आस्था और संसाधनों के उपयोग को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है. सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो ने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है, जिसमें हजारों लीटर दूध सीधे नदी की लहरों में बहाते हुए दिखाया गया है. यह दृश्य जहां एक ओर श्रद्धालुओं के लिए अटूट श्रद्धा और एक भव्य अनुष्ठान का हिस्सा है, वहीं दूसरी ओर इसने पर्यावरणविदों और समाज के प्रति जागरूक वर्ग को चिंता में डाल दिया है. सवाल सिर्फ आस्था का नहीं है, बल्कि उस राज्य की जमीनी हकीकत का भी है जहां आज भी लाखों बच्चे कुपोषण की मार झेल रहे हैं. यह पूरा मामला अब धर्म, जनकल्याण और पारिस्थितिकी तंत्र के बीच एक बड़े विवाद का रूप ले चुका है, जिसने प्रशासन से लेकर आम जनता तक को दो धड़ों में बांट दिया है.
बेक़सूर, नन्हे देवों का शाप विश्व पर पड़ा हिमालय!
— Anurag Dwary (@Anurag_Dwary) April 9, 2026
हिला चाहता मूल सृष्टि का, देख रहा क्या खड़ा हिमालय?
'दूध-दूध!' फिर सदा कब्र की, आज दूध लाना ही होगा,
जहाँ दूध के घड़े मिलें, उस मंजिल पर जाना ही होगा! pic.twitter.com/YWBz1z9x3a
सीहोर के पातालेश्वर महादेव मंदिर में हुआ भव्य आयोजन
NDTV की पड़ताल में यह साफ हुआ है कि वायरल वीडियो सीहोर जिले के सतदेव गांव का है, जहां श्री दादाजी दरबार पातालेश्वर महादेव मंदिर में चैत्र नवरात्रि के दौरान एक विशाल धार्मिक अनुष्ठान किया गया. यह आयोजन 18 मार्च से 7 अप्रैल तक पूरे 21 दिनों तक चला. इस दौरान महायज्ञ, शिव महापुराण कथा और दुर्गा पाठ जैसे कई कार्यक्रम हुए. आयोजकों ने बताया कि इस भव्य आयोजन के लिए 5 एकड़ में विशाल पंडाल बनाया गया था और करीब 41 टन पूजन सामग्री, जड़ी-बूटियों और सोने-चांदी तक का उपयोग किया गया. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह सप्तऋषियों की प्राचीन तपोभूमि है, जहां भगवान शिव प्रकट हुए थे, इसलिए यहां की महिमा भक्तों के लिए सर्वोपरि है.
हटो व्योम के मेघ! पंथ से, स्वर्ग लूटने हम आते हैं,
— Anurag Dwary (@Anurag_Dwary) April 9, 2026
'दूध, दूध! ...' ओ वत्स! तुम्हारा दूध खोजने हम जाते हैं!
राज्य में 10 लाख से अधिक बच्चे कुपोषित हैं, जिनमें से 1.36 लाख गंभीर कुपोषण की श्रेणी में आते हैं। वहीं 57% महिलाएं एनीमिया से पीड़ित हैं pic.twitter.com/HL79tpgEYn
11,000 लीटर दूध का 'विशाल अभिषेक' और श्रद्धालुओं का पक्ष
हालांकि विवाद की मुख्य वजह वह अनुष्ठान बना जिसमें 11,000 लीटर दूध नर्मदा में अर्पित किया गया. श्री शिवानंद महाराज के भक्त पवन पवार का कहना है कि बाबा का नर्मदा जी के प्रति लगाव अनन्य है. वे खुद नंगे पैर परिक्रमा करते हैं और जनकल्याण के लिए काम करते हैं. उनके अनुसार, रोजाना 151 लीटर और एक विशेष दिन 1100 लीटर दूध से अभिषेक होता था, लेकिन बुधवार को यह आंकड़ा 11,000 लीटर तक पहुंच गया. भक्तों का मानना है कि नर्मदा उनके लिए मां हैं और यह उनकी निजी आस्था का विषय है, जिसे वे अपने संसाधनों से पूरा कर रहे हैं. उनके लिए यह एक दुर्लभ आध्यात्मिक संगम है जिसे तर्क की कसौटी पर नहीं कसा जाना चाहिए.
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कुपोषण की मार और संसाधनों की बर्बादी पर उठते सवाल
जैसे ही यह वीडियो वायरल हुआ, सोशल मीडिया पर विरोध के स्वर भी तेज हो गए. लोगों का कहना है कि मध्य प्रदेश जैसे राज्य में जहां कुपोषण एक गंभीर समस्या है, वहां इतने बड़े पैमाने पर दूध बहाना समझ से परे है. आंकड़ों की बात करें तो हाईकोर्ट में दाखिल एक याचिका के अनुसार राज्य में 10 लाख से अधिक बच्चे कुपोषित हैं और 1.36 लाख से ज्यादा बच्चे तो बेहद गंभीर श्रेणी में आते हैं. वहीं 57 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया की शिकार हैं. आलोचकों का तर्क है कि यही दूध अगर गरीब और जरूरतमंद बच्चों तक पहुंचता, तो यह सेवा किसी भी अनुष्ठान से बड़ी होती. हाल ही में कुछ बच्चों की मौत और पोषण आहार में हुए करोड़ों के कथित घोटाले की खबरों ने इस बहस की आग में घी डालने का काम किया है.
पर्यावरण और जलीय जीवों पर संभावित खतरा
सिर्फ सामाजिक ही नहीं, बल्कि इस मामले के पर्यावरणीय पहलू भी बेहद गंभीर हैं. विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि नदी में भारी मात्रा में दूध डालने से पानी की गुणवत्ता खराब होती है. इससे पानी में बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (BOD) बढ़ जाती है और ऑक्सीजन का स्तर गिरने लगता है. जब दूध पानी में सड़ता है, तो बैक्टीरिया तेजी से पनपते हैं, जो मछलियों और अन्य जलीय जीवों के लिए जानलेवा साबित हो सकते हैं. नदी का पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) इससे बुरी तरह प्रभावित होता है. इस विवाद ने एक बार फिर यह चर्चा छेड़ दी है कि क्या हमारी धार्मिक परंपराओं को आधुनिक सामाजिक और पर्यावरणीय जरूरतों के साथ तालमेल बिठाने की आवश्यकता है.
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