मध्य प्रदेश में राज्यसभा चुनाव के बीच अचानक सियासी भूचाल आ गया है. कांग्रेस की उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होने के बाद राजनीति गरमा गई है और बीजेपी-कांग्रेस आमने-सामने आ गई हैं. एक तरफ बीजेपी इसे नियमों के पालन का मामला बता रही है, तो वहीं कांग्रेस इसे लोकतंत्र पर सीधा हमला बता रही है. आखिर ऐसा क्या हुआ कि मामला नामांकन रद्द होने तक पहुंच गया, आइए समझते हैं...
कब शुरू हुआ पूरा मामला?
इस विवाद की जड़ मई 2025 में दर्ज एक शिकायत से जुड़ी हुई है. शिकायतकर्ता ए. श्रीलता ने 11 मई 2025 को एक मामले की शुरुआत की, जिसे आगे बढ़ाते हुए 20 अगस्त 2025 को उन्होंने हैदराबाद की अदालत में मीनाक्षी नटराजन समेत अन्य लोगों के खिलाफ याचिका दायर की. इस याचिका में नटराजन पर भारतीय न्याय संहिता (BNS Act) की कई धाराओं के तहत आरोप लगाए गए.
अदालत से नोटिस और सुनवाई
17 सितंबर 2025 को अदालत ने मामले को गंभीर मानते हुए मीनाक्षी नटराजन को नोटिस जारी किया और उन्हें व्यक्तिगत रूप से पेश होकर जवाब देने को कहा. इसके बाद 24 अक्टूबर 2025 को नटराजन की ओर से उनके वकील ने जवाब दाखिल किया, जिसमें उन्होंने खुद को निर्दोष बताते हुए पूरे मामले को राजनीतिक प्रेरित बताया.
हालांकि 17 नवंबर 2025 को अदालत ने इस मामले को खारिज नहीं किया, बल्कि सुनवाई जारी रखने का फैसला लिया. यानी मामला अभी भी विचाराधीन है.
नामांकन रद्द होने की वजह क्या बनी?
रिटर्निंग ऑफिसर ने इसी लंबित मामले को आधार बनाते हुए नटराजन का नामांकन खारिज कर दिया. आरोप यह है कि उन्होंने अपने नामांकन फॉर्म में इस मामले की जानकारी नहीं दी. चुनावी नियमों के अनुसार, उम्मीदवार को अपने खिलाफ चल रहे मामलों की पूरी जानकारी हलफनामे में देना अनिवार्य होता है. इसी कथित चूक को बड़ी वजह माना गया.
बीजेपी का पक्ष- “जानकारी छुपाना बड़ा कारण”
बीजेपी प्रवक्ता हितेश वाजपेयी का कहना है कि रिटर्निंग ऑफिसर ने सभी जरूरी दस्तावेज देखने के बाद ही यह फैसला लिया है. उनके मुताबिक, यह साफ हो गया था कि तेलंगाना में चल रहे केस की जानकारी नटराजन ने नहीं दी, जो नियमों का उल्लंघन है. बीजेपी इस फैसले को पूरी तरह नियमसम्मत बता रही है.
कांग्रेस का पलटवार- केवल नोटिस, केस नहीं
कांग्रेस इस कार्रवाई को गलत और एकतरफा बता रही है. नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार का कहना है कि नटराजन के खिलाफ कोई आपराधिक केस दर्ज नहीं है, बल्कि उन्हें सिर्फ एक नोटिस मिला था. उनका तर्क है कि सुप्रीम कोर्ट के नियमों के मुताबिक केवल दर्ज मामलों की जानकारी देना जरूरी होता है, नोटिस की नहीं. ऐसे में नामांकन रद्द करना गलत है.
अब कानूनी लड़ाई तय
इस पूरे विवाद के बाद कांग्रेस ने साफ कर दिया है कि वह अदालत का दरवाजा खटखटाएगी. पार्टी इसे सिर्फ चुनावी नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकारों का मुद्दा मान रही है. आने वाले दिनों में यह मामला अदालत में पहुंचेगा, जहां इस पर अंतिम फैसला हो सकता है.
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