मध्यप्रदेश में पानी की कहानी अब केवल सूखे कुओं, खराब हैंडपंपों और सिर पर मटके लेकर किलोमीटरों चलती महिलाओं की कहानी नहीं है. अब गांवों में पाइप बिछे हैं, पानी की टंकियां खड़ी हैं, घरों के सामने नल भी लगे हैं और सरकारी फाइलों में जल जीवन मिशन लगातार आगे बढ़ रहा है. लेकिन बड़ा सवाल वही है कि नल तक पानी भी पहुंच रहा है?
मध्यप्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से लगातार आती तस्वीरें इस सवाल को और बड़ा करती हैं. कहीं नल है लेकिन पानी नहीं, कहीं पानी है तो नियमित नहीं और कहीं पानी पहुंच भी रहा है तो उसकी गुणवत्ता सवालों के घेरे में है. प्रदेश के 55 में से 23 जिले ऐसे हैं, जहां पीने योग्य नल जल की उपलब्धता का आकलन 70 प्रतिशत से भी कम है. यानी मध्यप्रदेश के करीब 42 प्रतिशत जिले अब भी उस सूची में हैं जहां दस में से सात परिवारों तक घरेलू नल कनेक्शन नहीं पहुंच पाया है. यह खुलासा किसी निजी सर्वे में नहीं, बल्कि केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय की ओर से राज्यसभा में दिए गए लिखित जवाब में हुआ है.
राजधानी भोपाल तक इस संकट से अछूती नहीं है. मार्च 2026 में भूजल स्तर में गिरावट के बाद प्रशासन को पूरे भोपाल जिले को जल अभावग्रस्त क्षेत्र घोषित कर नए निजी बोरवेल की खुदाई पर रोक लगानी पड़ी थी. प्रशासन ने इसकी वजह भूजल के अत्यधिक दोहन और लगातार गिरते जलस्तर को बताया.
कलेक्टर से मुख्यमंत्री तक गुहार, पानी की समस्या नहीं हुई दूर
भोपाल से करीब 40 किलोमीटर दूर सीहोर जिले के बिशनखेड़ी गांव में पानी की समस्या को लेकर अप्रैल 2025 में एक ग्रामीण बजरंगी अपने शरीर पर पुराने आवेदन बांधकर रेंगते हुए संभागायुक्त कार्यालय पहुंचा था. उसका कहना था कि कलेक्टर से लेकर मंत्री और मुख्यमंत्री तक गुहार लगाने के बावजूद पानी की समस्या दूर नहीं हुई.
23 जिलों में पीने योग्य नल जल की उपलब्धता 70 प्रतिशत से भी कम
केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय ने राज्यसभा में बताया है कि मध्यप्रदेश के 55 में से 23 जिलों में पीने योग्य नल जल की उपलब्धता 70 प्रतिशत से भी कम आंकी गई है. यानी प्रदेश के करीब 42 प्रतिशत जिले ऐसे हैं जहां दस में से सात परिवारों तक भी घरेलू नल कनेक्शन नहीं पहुंच पाया है. यह जानकारी राज्यसभा में सांसद विवेक के तन्खा के सवाल के जवाब में दी गई. उन्होंने मध्यप्रदेश में जल गुणवत्ता परीक्षण की व्यवस्था, घरेलू नल कनेक्शन की कार्यशीलता और 70 प्रतिशत से कम कवरेज वाले जिलों का ब्यौरा मांगा था.
20 लाख परिवार नल कनेक्शन के दायरे से बाहर
इन 23 जिलों के सरकारी आंकड़ों को जोड़ें तो तस्वीर कहीं ज्यादा गंभीर हो जाती है. इन जिलों में कुल 49,49,461 परिवार हैं. इनमें सिर्फ 29,55,970 परिवारों के पास घरेलू नल कनेक्शन है. यानी अकेले इन 23 जिलों में 19,93,491 परिवार, करीब 20 लाख परिवार, घरेलू नल कनेक्शन के दायरे से बाहर हैं.
- सबसे खराब स्थिति मैहर की है. यहां 1,36,204 परिवार हैं, लेकिन घरेलू नल कनेक्शन केवल 54,757 परिवारों तक पहुंचा है. 81,447 परिवार अब भी इससे बाहर हैं और कवरेज सिर्फ 40.20 प्रतिशत है. यानी करीब दस में छह परिवार नल कनेक्शन के दायरे से बाहर हैं.
- सिंगरौली में स्थिति लगभग ऐसी ही है. यहां 1,61,082 परिवारों में केवल 65,431 परिवारों के पास कनेक्शन है. कवरेज महज 40.62 प्रतिशत है और 95,651 परिवार नल कनेक्शन से बाहर हैं.
- छतरपुर में 2,47,475 परिवारों में केवल 1,05,853 को कनेक्शन मिला है. यानी 1,41,622 परिवार नल कनेक्शन से बाहर हैं और कवरेज केवल 42.77 प्रतिशत है.
- सतना में 2,37,866 परिवारों में से सिर्फ 1,03,097 के पास कनेक्शन है. यहां 1,34,769 परिवार बाहर हैं और कवरेज 43.34 प्रतिशत है.
- संख्या के लिहाज से सबसे बड़ा अंतर शिवपुरी में दिखाई देता है. यहां कुल 3,20,873 परिवारों में केवल 1,68,469 के पास घरेलू नल कनेक्शन है. यानी 1,52,404 परिवार अब भी इसके दायरे से बाहर हैं. कवरेज 52.50 प्रतिशत है.
मप्र के जिलों में कैसे हैं हालात?
70 प्रतिशत से नीचे वाले जिलों की सूची लंबी है. जबलपुर में 69.67 प्रतिशत, बड़वानी में 69.62 प्रतिशत, डिंडोरी में 69.48 प्रतिशत, टीकमगढ़ में 69.13 प्रतिशत, रतलाम में 67.47 प्रतिशत, विदिशा में 66.67 प्रतिशत, आगर मालवा में 65.38 प्रतिशत, मंदसौर में 62.79 प्रतिशत, शाजापुर में 59.40 प्रतिशत, गुना में 58.56 प्रतिशत, नीमच में 57.93 प्रतिशत, सीहोर में 56.95 प्रतिशत, रीवा में 53.65 प्रतिशत, शिवपुरी में 52.50 प्रतिशत, सीधी में 52.36 प्रतिशत, मझगवां में 49.86 प्रतिशत, अशोकनगर में 46.53 प्रतिशत, पन्ना में 45.26 प्रतिशत, सतना में 43.34 प्रतिशत, अलीराजपुर में 42.78 प्रतिशत, छतरपुर में 42.77 प्रतिशत, सिंगरौली में 40.62 प्रतिशत और मैहर में सिर्फ 40.20 प्रतिशत कवरेज दर्ज किया गया है.
23 जिलों में तीन अलग-अलग बातें
दिलचस्प यह है कि राज्य का औसत इन 23 जिलों की तस्वीर से काफी बेहतर दिखाई देता है. सरकार के मुताबिक जल जीवन मिशन के तहत पारिवारिक नल जल कनेक्शनों के नवीनतम कार्यशीलता आकलन में 77.21 प्रतिशत परिवारों में नल जल कनेक्शन कार्य करते पाए गए. लेकिन उसी आकलन में पानी की पर्याप्त मात्रा, आपूर्ति की नियमितता और पेयजल की गुणवत्ता के मामले में सेवा में सुधार की जरूरत भी दर्ज की गई है. यही अंतर शायद मध्यप्रदेश की नल जल कहानी को सबसे बेहतर तरीके से समझाता है. कागज पर कनेक्शन होना, घर के बाहर नल लगा होना और उस नल से हर दिन पर्याप्त तथा सुरक्षित पानी मिलना तीन अलग अलग बातें हैं.
नल से जो पानी आया वो कितना सुरक्षित
पानी की गुणवत्ता की जांच की व्यवस्था भी सवाल खड़े करती है. राज्यसभा में सरकार ने बताया कि मध्यप्रदेश में 155 जल गुणवत्ता परीक्षण प्रयोगशालाएं हैं. इनमें 103 उप मंडल स्तर पर, 51 जिला स्तर पर और एक राज्य स्तर पर है. बीओडी की जांच राज्य स्तरीय प्रयोगशाला में हो सकती है, लेकिन सरकारी जवाब में साफ कहा गया है कि रासायनिक विषाक्तता की जांच की सुविधा उपलब्ध नहीं है. इसलिए मध्यप्रदेश में अब सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि कितने घरों में नल लगा. सवाल यह भी है कि कितने नलों में पानी आया, कितनी नियमितता से आया और जो पानी आया वह कितना सुरक्षित था.
संकट सिर्फ पानी का नहीं है, उसके पीने लायक होने का भी
संकट सिर्फ पानी पहुंचने का नहीं है, पानी पीने लायक होने का भी है. जनवरी 2026 में एनडीटीवी ने जल जीवन मिशन की कार्यशीलता आकलन रिपोर्ट के आधार पर बताया था कि मध्यप्रदेश के ग्रामीण इलाकों से लिए गए पानी के नमूनों में केवल 63.3 प्रतिशत नमूने गुणवत्ता जांच में पास हुए थे, जबकि राष्ट्रीय औसत 76 प्रतिशत था. रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश के 99.1 प्रतिशत गांवों में पाइप जलापूर्ति व्यवस्था होने के बावजूद केवल 76.6 प्रतिशत परिवारों के नल कार्यशील पाए गए थे. यानी मध्यप्रदेश में नल जल की कहानी के कम से कम तीन चेहरे हैं. पहला, घर तक नल पहुंचा या नहीं. दूसरा, नल लगा है तो उसमें नियमित पानी आता है या नहीं. तीसरा, पानी आता है तो क्या वह पीने योग्य भी है.
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