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देवजी और उसके नक्सल साथियों के सरेंडर का वीडियो आया सामने: खौफ के चेहरे अब दिखे शांत

Maoist Politburo Member Devji Surrender: माओवादी संगठन के पोलित ब्यूरो सदस्य देवजी और मल्ला राजी रेड्डी के सरेंडर से नक्सलवाद की कमर टूट गई है.इन दोनों शीर्ष नेताओं पर 1-1 करोड़ रुपये का इनाम घोषित था और ये ताड़मेटला जैसे बड़े हमलों के रणनीतिकार रहे हैं. तेलंगाना पुलिस द्वारा जारी वीडियो में कभी दहशत का पर्याय रहे ये चेहरे अब बेहद शांत और मुख्यधारा में लौटते नजर आ रहे हैं.

Naxali Devji Surrender Video: माओवादी संगठन के सबसे बड़े चेहरों में से एक और पोलित ब्यूरो सदस्य थीपरी तिरुपति उर्फ देवजी ने अपने तीन अन्य टॉप के साथियों के साथ तेलंगाना के डीजीपी शिवधर रेड्डी के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है. दो दिन पहले आई सरेंडर की इन खबरों पर आज तब आधिकारिक मुहर लग गई जब पुलिस ने इसका वीडियो जारी किया.पुलिस ने बाकायदा सभी सरेंडर नक्सलियों को पत्रकारों के सामने पेश किया. यह नक्सल इतिहास में पहली बार है जब केंद्रीय स्तर के दो बड़े नेताओं ने एक साथ हथियार डाले हैं. आत्मसमर्पण करने वालों में देवजी के साथ केंद्रीय समिति सदस्य मल्ला राजी रेड्डी उर्फ संग्राम, स्टेट कमेटी सदस्य बड़े चोक्का राव उर्फ दामोदर और नुने नरसिम्हा रेड्डी उर्फ गंगन्ना भी शामिल हैं.

करोड़ों का इनाम और आतंक का लंबा इतिहास

सरेंडर करने वाले इन माओवादियों की हैसियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इनमें से अकेले देवजी पर ही लगभग 1 करोड़ रुपये और मल्ला राजी रेड्डी पर भी करीब 1 करोड़ रुपये का इनाम घोषित था. देवजी केवल एक लड़ाका नहीं, बल्कि संगठन का वह 'दिमाग' था जो पोलित ब्यूरो में बैठकर बड़े हमलों और भर्ती की नीतियां तय करता था.

देवजी मुख्य रूप से संगठन के 'सेंट्रल टेक्निकल कमेटी' और मिलिट्री रणनीतियों का मास्टरमाइंड था. बस्तर में सुरक्षा बलों पर हुए कई बड़े एंबुश और आईडी (IED) ब्लास्ट की प्लानिंग में इसकी सीधी भूमिका मानी जाती है.वहीं मल्ला राजी रेड्डी को विस्फोटक और तकनीकी रणनीतियों का उस्ताद माना जाता था.

राजी रेड्डी पर देश भर में 50 से अधिक हत्या, आगजनी और बम धमाकों के मामले दर्ज हैं. अकेले इन दोनों के नाम ताड़मेटला (2010) और झीरम घाटी (2013) जैसी बड़ी नक्सली घटनाओं की साजिश रचने वाले 'थिंक टैंक' के तौर पर भी चर्चा में रहे हैं. बस्तर से लेकर तेलंगाना की सीमाओं तक दशकों से इनकी एक आवाज पर खून-खराबा मचता था.

Naxalite Devji Surrender: तेलंगाना पुलिस ने बकायदा सभी सरेंडर नक्सलियों के नाम के साथ उनकी तस्वीर जारी की है. संभवत: ये पहली बार है कि कुख्यात देवजी और माला राजी रेड्डी की इतनी साफ तस्वीर दुनिया के सामने आई है.

Naxalite Devji Surrender: तेलंगाना पुलिस ने बकायदा सभी सरेंडर नक्सलियों के नाम के साथ उनकी तस्वीर जारी की है. संभवत: ये पहली बार है कि कुख्यात देवजी और माला राजी रेड्डी की इतनी साफ तस्वीर दुनिया के सामने आई है.

वीडियो में दिखा बदला हुआ मंजर: खौफ के चेहरे अब शांत

आज जारी हुए वीडियो में एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है. जो नक्सली नेता कभी जंगलों में सुरक्षा बलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बने हुए थे, वे अब बेहद शांत और सहज मुद्रा में कुर्सियों पर बैठे नजर आ रहे हैं. देवजी, मल्ला राजी, चोक्का राव और नुने नरसिम्हा रेड्डी के चेहरे पर अब वह पुरानी आक्रामकता नहीं, बल्कि एक थकावट और शांति दिख रही है. वीडियो को ध्यान से देखें तो साफ पता चलता है कि ढलती उम्र और संगठन के भीतर के बिखराव ने इन कुख्यात नामों को मुख्यधारा में लौटने पर मजबूर कर दिया है. 

संगठन की रीढ़ टूटी: पहली बार टॉप लीडरशिप बाहर

नक्सलवाद के जानकारों के मुताबिक, यह माओवादी संगठन को अब तक का सबसे बड़ा झटका है. देवजी पोलित ब्यूरो का हिस्सा था, जो संगठन की सर्वोच्च नीति-निर्धारक इकाई होती है. वहीं मल्ला राजी रेड्डी केंद्रीय समिति का सदस्य था. इन दोनों का एक साथ बाहर आना यह बताता है कि माओवाद का 'ब्रेन' अब खत्म होने की कगार पर है. इनके साथ स्टेट कमेटी के दो बड़े नेताओं का सरेंडर करना यह साफ करता है कि संगठन की कमान अब पूरी तरह चरमरा गई है. इन चारों नेताओं पर करोड़ों रुपये का इनाम घोषित था.

इस ऐतिहासिक सरेंडर के मायने और प्रभाव

इस सरेंडर के मायने केवल चार लोगों के हथियार डालने तक सीमित नहीं हैं. देवजी जैसे नेताओं के पास माओवादियों के देशव्यापी नेटवर्क, उनके ठिकानों, फंडिंग के स्रोतों और भविष्य की साजिशों की पूरी जानकारी होती है. इनका मुख्यधारा में आना माओवादी संगठन के लिए एक 'खुफिया खजाने' के लूट जाने जैसा है. जानकारों का मानना है कि इन शीर्ष नेताओं के हटने से जमीनी स्तर पर काम कर रहे लड़ाकों का मनोबल पूरी तरह टूट जाएगा. यह सरेंडर यह भी संदेश देता है कि अब जंगलों में रहकर 'क्रांति' का दावा करने वाले बड़े नेता भी शांतिपूर्ण जीवन की तलाश में हैं.

संगठन की वैचारिक हार का प्रतीक

वीडियो में दिख रही शांति और सरेंडर की यह प्रक्रिया माओवादी विचारधारा की वैचारिक मौत का भी संकेत है. जिस संगठन ने दशकों तक 'बंदूक की नली से निकलने वाली सत्ता' का प्रचार किया, आज उसके सबसे बड़े सेनापति लोकतंत्र और कानून के सामने बैठे हैं. बीजापुर से लेकर तेलंगाना के सीमावर्ती इलाकों तक, जहां कभी इनकी एक आवाज पर दहशत फैल जाती थी, वहां अब इनके इस शांत वीडियो ने सरकार और पुलिस के 'विश्वास और विकास' के अभियान को एक नई मजबूती दी है.
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