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खूंखार कमांडर हिड़मा के गांव में बदलाव की कहानी: दीवारों पर दिखे डोरेमॉन और छोटा भीम

Madvi Hidma Village puvarti: नक्सल कमांडर माड़वी हिड़मा के खूंखार गढ़ पूवर्ती में अब बंदूक की जगह बच्चों के लिए डोरेमॉन और छोटा भीम मुस्कुरा रहे हैं. जानिए बस्तर के इस सबसे बंद और अभेद्य किले के बदलने की पूरी ग्राउंड रिपोर्ट और ग्रामीणों की जुबानी खौफ के खत्म होने की दास्तान.

खूंखार कमांडर हिड़मा के गांव में बदलाव की कहानी: दीवारों पर दिखे डोरेमॉन और छोटा भीम
  • नक्सल कमांडर माड़वी हिड़मा के गांव पूवर्ती में अब सशस्त्र बलों का मजबूत कैंप स्थापित हो चुका है
  • पूवर्ती गांव में पहले नक्सलियों की मौजूदगी के कारण शासन और संविधान की कोई उपस्थिति नहीं थी
  • गांव में बिजली, पानी, आंगनबाड़ी केन्द्र और शिक्षा जैसे विकास कार्य अब सक्रिय रूप से हो रहे हैं
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Puvarti Village Bastar Ground Report: नक्सल कमांडर माड़वी हिड़मा का गांव पूवर्ती. सुकमा से करीब 120 किलोमीटर अंदर जगरगुंडा के उस इलाके में, जहां जंगल घना होता जाता है और सन्नाटा बोलने लगता है. यह एक ऐसा गांव था, जहां बिना नक्सलियों की इजाज़त के कोई पहुंच नहीं सकता था. लेकिन आज एनडीटीवी की टीम जब इस अभेद्य किले के अंदर पहुंची, तो वहां का नजारा हैरान के साथ-साथ सुकून देने वाला भी था. जिस हिड़मा के नाम से कभी पूरा इलाका कांपता था, आज उसके अपने ही गांव की दीवारों पर बच्चों के पसंदीदा कार्टून किरदार डोरेमॉन और छोटा भीम मुस्कुरा रहे हैं.

बिजली, पानी और विकास की दस्तक

यह वही गांव है, जहां से हिड़मा जैसे सेंट्रल कमेटी सदस्य और देवा बारसे जैसे बड़े नक्सली नेता निकले. जहां कभी देश के संविधान या शासन की कोई मौजूदगी तक नहीं थी. पूवर्ती से कुछ किलोमीटर पहले टेकलगुड़म आता है, जहां 2021 में हिड़मा की अगुवाई में नक्सलियों ने हमला किया था और हमारे 23 जवान शहीद हुए थे. लेकिन आज पूवर्ती की तस्वीर बदल रही है. सीआरपीएफ, डीआरजी, एसटीएफ और कोबरा का कैंप अब यहां पूरी मजबूती के साथ स्थापित हो चुका है और करीब दो साल पहले यहां पहली बार देश का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फहराया गया था.

Madvi Hidma Village puvarti: खूंखार नक्सली रहे हिड़मा के गांव में अब आंगनबाड़ी केन्द्र चल रहा है जहां बच्चे पढ़ाई भी कर रहे हैं.

Madvi Hidma Village puvarti: खूंखार नक्सली रहे हिड़मा के गांव में अब आंगनबाड़ी केन्द्र चल रहा है जहां बच्चे पढ़ाई भी कर रहे हैं.

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माड़वी देवा की आपबीती: खौफ का वो दौर

जब एनडीटीवी की टीम गांव में पहुंची, तो कई युवा हमें देखकर भागने लगे. मतलब साफ है कि यहां का खौफ अभी मरा नहीं है, बस उसने अपना रूप बदल लिया है. इसी हिचकिचाहट के बीच हमारी मुलाकात गांव के एक ग्रामीण माड़वी देवा से हुई. वह टूटी-फूटी हिंदी में बताते हैं कि पहले हम लोग दोनों तरफ से डर के साए में जीने को मजबूर थे. हमें नक्सलियों का भी खौफ था और पुलिस का भी. जब पुलिस आती थी तो हम भाग जाते थे और अगर बच्चों को स्कूल भेजते तो नक्सली धमकी देते थे. यह सिर्फ शारीरिक हिंसा नहीं थी, बल्कि शक और अविश्वास के बीच फंसा एक पूरा जीवन था.

Madvi Hidma Village puvarti: हिड़मा के गांव में अब बिजली भी पहुंच गई है. जिससे ग्रामीणों का जीवन आसान हुआ है.

Madvi Hidma Village puvarti: हिड़मा के गांव में अब बिजली भी पहुंच गई है. जिससे ग्रामीणों का जीवन आसान हुआ है.

हिड़मा के भतीजे सीनू की आंखों में नए सपने

गांव के एक कोने में माड़वी नंदकी चुपचाप महुआ और इमली सुखा रही थीं. वहीं हमारी मुलाकात नन्हे सीनू से भी हुई, जो अभी पहली क्लास में पढ़ता है और दुर्दांत नक्सली कमांडर हिड़मा का सगा भतीजा है. सीनू ज्यादा बात नहीं करता, वह बहुत शर्मीला है. लेकिन जब वह कहता है कि गांव में बिजली आ गई है, पानी की टंकी बन गई है और आंगनवाड़ी खुल गई है, तो ऐसा लगता है कि बस्तर का भविष्य अब सुरक्षित हाथों में जा रहा है. इसी गांव में कभी हिड़मा के परिवार का एक बड़ा नक्सली स्मारक भी हुआ करता था, जिसे सुरक्षा बलों का कैंप बनने के बाद हमेशा के लिए हटा दिया गया.
 

Madvi Hidma Village puvarti: खूंखार नक्सली रहे हिड़मा के गांव में अब विकास हर जगह दिखाई देता है. गांव में पीने के पानी के हैंडपंप है. सोलर बिजली का इंतजाम है. आंगनबाड़ी केन्द्र भी है.

Madvi Hidma Village puvarti: खूंखार नक्सली रहे हिड़मा के गांव में अब विकास हर जगह दिखाई देता है. गांव में पीने के पानी के हैंडपंप है. सोलर बिजली का इंतजाम है. आंगनबाड़ी केन्द्र भी है.

अतीत से समझौता करता नया पूवर्ती

बस्तर को सालों से कवर करने वाले हमारे वरिष्ठ पत्रकार साथी विकास बताते हैं कि वह अपने पूरे करियर में कभी भी पूवर्ती गांव के अंदर तक नहीं पहुंच पाए थे. टेकलगुड़म से आगे जाने की किसी को इजाजत ही नहीं थी. नक्सलियों की बंदूकों ने कभी किसी बाहरी व्यक्ति को इस अभेद्य गांव में घुसने नहीं दिया. और आज वही पूवर्ती देश के सामने एक बिल्कुल अलग और हैरान कर देने वाली बदलती तस्वीर पेश कर रहा है. जहां कभी सिर्फ बंदूक का डर यह तय करता था कि लोग अपनी जिंदगी कैसे जिएंगे, अब वहां के बच्चों के सामने बेहतर जिंदगी के विकल्प साफ दिखाई देने लगे हैं.
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