- राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू 21 और 22 जून को MP के स्थित कूनो नेशनल पार्क में रात्रि विश्राम और जंगल भ्रमण करेंगी
- कूनो नेशनल पार्क का इतिहास अकबर के हाथी शिकार और ग्वालियर के महाराजा सिंधिया के शेर प्रोजेक्ट से जुड़ा है
- महाराजा सिंधिया ने 1905 में इथियोपिया से शेर लाने के लिए ₹1 लाख खर्च किया था, जिनमें से सात शेर कूनो पहुंचे थे
Kuno National Park Histroy in Hindi: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू जून 2026 में मध्य प्रदेश के पांच दिवसीय प्रवास पर रहीं. अपने इस दौरे के दौरान वे 21 और 22 जून को श्योपुर जिले में स्थित ऐतिहासिक कूनो नेशनल पार्क गईं. राष्ट्रपति का यहां रात्रि विश्राम और जंगल भ्रमण का कार्यक्रम था. कूनो नेशनल पार्क आज भले ही चीतों की फुर्ती से आबाद हो, लेकिन इतिहास के पन्नों को पलटें तो यहां कभी शेरों की दहाड़ सुनाई दिया करती थी. यह इलाका हाथियों का भी घर हुआ करता था. करीब 121 साल पहले ग्वालियर रियासत के महाराजा सिंधिया ने यहां अफ्रीका से शेर मंगवाने के लिए ₹1 लाख की भारी-भरकम रकम खर्च कर डाली थी.

कभी कूनो में गूंजती थी 'मजनू और रामप्यारी' की दहाड़, जानिए 121 साल पहले कैसे फेल हुआ था सिंधिया का 'लाख टके' का वो प्लान!
Photo Credit: KunoNationalParkOfficia
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जब अकबर ने किया था हाथियों का शिकार
कूनो नेशनल पार्क की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, श्योपुर-शिवपुरी का यह घना जंगल कभी हाथियों और शेरों का पसंदीदा ठिकाना हुआ करता था. ग्वालियर रियासत के साल 1902 के राजपत्र में दर्ज ऐतिहासिक तथ्यों के मुताबिक, मुगल बादशाह अकबर ने साल 1564 में मालवा से लौटते समय शिवपुरी के जंगलों के पास हाथियों के एक बड़े झुंड का शिकार किया था.

कूनो पार्क का गजब इतिहास: कभी सिंधिया ने ₹1 लाख खर्च कर अफ्रीका से शेर मंगवाए, अब बना चीतों का घर; 21 जून को आएंगी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू
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लॉर्ड कर्जन ने दिया था गिर से शेर लाने का सुझाव
कूनो के इतिहास में एक और दिलचस्प मोड़ साल 1904 में तब आया जब तत्कालीन ग्वालियर नरेश महाराजा माधवराव सिंधिया (प्रथम) के आमंत्रण पर भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्जन (कार्यकाल 1899 से 1905) शिकार के लिए कूनो घाटी के जंगलों में आए थे. लॉर्ड कर्जन यहां के घने और समृद्ध जंगलों से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने महाराजा सिंधिया को गुजरात के जूनागढ़ (गिर) से शेर लाकर इस जंगल में छोड़ने का सुझाव दिया. हालांकि, जूनागढ़ के नवाब की उदासीनता और ढीले रवैये के कारण गिर के शेरों को यहाँ नहीं लाया जा सका.
इथियोपिया से कूनो पहुंचे शेर, राजा ने खुद किया स्वागत
गिर से निराशा हाथ लगने के बाद, लॉर्ड कर्जन और परियोजना प्रमुख व फारसी विशेषज्ञ डीएम ज़ाल की मदद से अफ्रीकी देश इथियोपिया से साल 1905 में 10 शेरों को भारत लाने का प्रयास किया गया. करीब 121 साल पहले महाराजा सिंधिया ने इन शेरों को भारत लाने के लिए ₹1 लाख खर्च किए थे, जो उस दौर में एक बहुत बड़ी धनराशि थी. इथियोपिया से भेजे गए 10 शेरों में से 3 की मौत बॉम्बे (मुंबई) बंदरगाह तक पहुंचने के दौरान ही हो गई. शेष बचे 7 शेर (3 नर और 4 मादा) जब कूनो पहुंचे, तो खुद महाराजा सिंधिया ने वहाँ मौजूद रहकर उनका स्वागत किया था.

कूनो पार्क का गजब इतिहास: कभी सिंधिया ने ₹1 लाख में अफ्रीका से मंगाए थे 'रामप्यारी' और 'मजनू', अब बन गया चीतों का गढ़! Photo Credit: KunoNationalParkOfficia
कूनो में गूंजी थी 'रामप्यारी' और 'मजनू' की दहाड़
इथियोपिया से लाए गए इन शेरों के स्थानीय स्तर पर बेहद दिलचस्प नाम रखे गए थे. इनमें नर शेरों के नाम बुंदे, बांके और मजनू थे, जबकि मादा शेरों के नाम रमाईली, रामप्यारी, बिजली और गैंदी रखे गए थे. हालांकि, बाद में इन शेरों को कूनो के बजाय शिवपुरी के जंगलों में छोड़ दिया गया. साल 1910 से 1912 के बीच ये शेर धीरे-धीरे मवेशी चोर और आदमखोर बन गए, जिसके कारण श्योपुर-शिवपुरी क्षेत्र में शेरों को बसाने की इस ऐतिहासिक परियोजना पर हमेशा के लिए ब्रेक लग गया.
अब चीता प्रोजेक्ट कूनो को मिली वैश्विक पहचान
ऑल इंडिया रेडियो की दिसंबर 2025 की एक रिपोर्ट के अनुसार, कूनो के इतिहास में एक नया स्वर्णिम अध्याय 17 सितंबर 2022 को जुड़ा, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नामीबिया से लाए गए 8 चीतों को कूनो राष्ट्रीय उद्यान में छोड़ा. इसी के साथ देश में महत्वाकांक्षी 'कूनो चीता प्रोजेक्ट' की शुरुआत हुई.
इसके बाद से कूनो नेशनल पार्क भारत ही नहीं बल्कि दुनिया भर में चीतों के सबसे बड़े और सफल घर के रूप में उभर कर सामने आया है. आंकड़ों की बात करें तो दिसंबर 2025 तक कूनो राष्ट्रीय उद्यान में चीतों की कुल संख्या बढ़कर 30 हो चुकी थी. इनमें 12 वयस्क, 9 किशोर और 9 शावक शामिल हैं. गर्व की बात यह है कि इनमें से 19 चीतों का जन्म भारत की धरती पर ही हुआ है, जो इस प्रोजेक्ट की सफलता को दर्शाता है.
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