1975 की सुपरहिट फिल्म शोले में जेलर का किरदार निभाने वाले अभिनेता असरानी का दमदार डायलॉग है. 'हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर हैं, आजकल के जेलरों की तरह नहीं, जो कैदियों को सुधारने की फिक्र में लगे रहते हैं. हां... हम अच्छी तरह जानते हैं तुम लोग कभी नहीं सुधर सकते हो. अरे, जब हम नहीं सुधर सके, तो तुम क्या सुधरोगे?' लेकिन, फिल्मी दुनिया से इतर, मप्र के खंडवा जिले में मौजूद अंग्रेजों के जमाने की जेल में कैदियों को सुधारने की ही नहीं, उन्हें नई दिशा देने की दिलचस्प खबर सामने आई है.

खंडवा जेल में बंदियों को संगीत का प्रशिक्षण दिया जा रहा है.
अपनी पसंद का हुनर सीख रहे बंदी
बंदी अपनी पसंद के हिसाब से संगीत सीख रहे हैं, कोई वाद्य यंत्र बजाना सीख रहा है तो कोई अपनी आवाज में गुनगुना रहा है. इस प्रयोग का मकसद बंदियों को सिर्फ संगीत सिखाना नहीं, बल्कि उनके भीतर सकारात्मक बदलाव लाना भी है.

कोरे कागज पर रंग भी भर रहे कैदी.
संगीत बंदियों के लिए दूसरा मौका
जेल में संगीत की शिक्षा दे रहे प्रशिक्षक दुष्यंत सोनी NDTV से बात करते हुए कहते हैं- यहां कोई तबला तो कोई हारमोनियम, ढोलक और झांझ बजाना सीख रहा है तो कोई गुनगुना. यह सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं है. संगीत बंदियों के लिए दूसरा मौका बन सकता है. जो भी कारण रहे हों, अगर किसी ने गलत रास्ता चुना तो इसका मतलब यह नहीं कि उसके लिए सारे रास्ते बंद हो गए. संगीत के जरिए उन्हें यही समझाने का प्रयास किया जा रहा है कि जो हुआ सो हुआ, भविष्य को बेहतर बनाया जा सकता है.
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जेल अधीक्षक डीके सारस ने बताया मकसद
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