International Women's Day special: अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर हम आपको सागर की एक ऐसी महिला से रूबरू करा रहे हैं, जिन्हें लोग प्यार से “छोटी मां” कहकर पुकारते हैं. यह नाम है सागर की प्रतिमा अरजरिया (Pratima Arjaria) का, जिन्होंने अपने जीवन को अनाथ और बेसहारा बच्चों की सेवा के लिए समर्पित कर दिया है. प्रतिमा अरजरिया अब तक 18 बेटियों को गोद लेकर उनका पालन-पोषण कर चुकी हैं और पूरे रीति-रिवाज के साथ उनकी शादी भी करवा चुकी हैं. आज उनकी कई बेटियां अपने परिवार में खुशहाल जीवन जी रही हैं और प्रतिमा अरजरिया कई बच्चों की नानी भी बन चुकी हैं.
लावारिस बच्चों को दिया मां का प्यार
इन बेटियों में वे बच्चियां भी शामिल हैं जिनके माता-पिता नहीं थे या जिन्हें किसी ने सड़कों पर लावारिस छोड़ दिया था. प्रतिमा ने इन बच्चियों को न केवल आश्रय दिया, बल्कि मां का स्नेह और सुरक्षित भविष्य भी दिया. आज वे सभी बच्चियां प्रतिमा को मां की तरह सम्मान देती हैं और उन्हें स्नेह से “छोटी मां” कहकर बुलाती हैं.

अनाथ बच्चों के लिए आश्रम की रखी नींव
सागर के रजाखेड़ी क्षेत्र में स्थित संजीवनी बाल आश्रम की शुरुआत लगभग 36 साल पहले हुई थी. वर्ष 1990 में प्रतिमा अरजरिया की सास सत्यभामा अरजरिया ने चार अनाथ बच्चों के साथ एक किराए के कमरे में इस आश्रम की नींव रखी थी. उनका उद्देश्य था कि जिन बच्चों के पास परिवार का सहारा नहीं है, उन्हें एक घर और अपनापन मिल सके. समय के साथ आश्रम का दायरा बढ़ता गया और आज यहां 55 बच्चे रहकर पढ़ाई-लिखाई कर रहे हैं.
प्रभाकर नगर मकरोनिया निवासी प्रतिमा अरजरिया बताती हैं कि उनकी सास सत्यभामा अरजरिया हमेशा से अनाथ बच्चों के लिए कुछ करना चाहती थीं. उन्होंने अपने बेटे-बेटियों की शादी के बाद इस मिशन की शुरुआत की. प्रतिमा अरजरिया जब शादी के बाद इस परिवार में आईं तो धीरे-धीरे वे भी इस सेवा कार्य से जुड़ती चली गईं. बच्चों के साथ समय बिताते-बिताते उनका लगाव इतना गहरा हो गया कि उन्होंने इसे अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया.

“छोटी मां” कहकर पुकारते हैं लोग
प्रतिमा अरजरिया बताती हैं कि बिना माता-पिता के बच्चों की स्थिति देखकर उनका मन द्रवित हो जाता था. ऐसे बच्चों को परिवार जैसा माहौल देने की कोशिश की गई, ताकि वे खुद को अकेला महसूस न करें. वर्ष 2007 में उनकी सास सत्यभामा अरजरिया का निधन हो गया, जिसके बाद प्रतिमा अरजरिया ने पूरी तरह से आश्रम की जिम्मेदारी संभाल ली और तब से लगातार इस सेवा कार्य को आगे बढ़ा रही हैं.

आज आश्रम की 18 बेटियों की शादी पूरे रीति-रिवाज और सम्मान के साथ करवाई जा चुकी है. खास बात यह है कि सभी बेटियों का विवाह सागर जिले के गांवों में हुआ है और वे अपने परिवारों में खुशहाल जीवन जी रही हैं. त्योहारों के अवसर पर ये सभी बेटियां अपनी छोटी मां से मिलने आश्रम जरूर आती हैं और कुछ दिन वहीं रुकती भी हैं. जब वे वापस अपने ससुराल जाती हैं तो प्रतिमा अरजरिया उन्हें बिल्कुल अपनी बेटी की तरह विदा करती हैं.
इतना ही नहीं, बेटियों के पतियों को भी वे दामाद की तरह सम्मान देती हैं. यही कारण है कि आश्रम का माहौल एक बड़े परिवार की तरह हो गया है, जहां हर बच्चा खुद को सुरक्षित और अपनापन महसूस करता है.
निस्वार्थ सेवा और ममता की इस मिसाल ने प्रतिमा अरजरिया को सागर में एक अलग पहचान दिलाई है. अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर उनकी यह प्रेरणादायक कहानी समाज को यह संदेश देती है कि अगर मन में सेवा और करुणा का भाव हो तो एक व्यक्ति भी कई जिंदगियों में खुशियां ला सकता है.
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