World Tigers Day: भारत कैसे करता है अपने बाघों की 'जनगणना'?
भारत के जंगलों में दुनिया भर के 70 प्रतिशत बाघ रहते हैं. इसे गिनने के लिए भारत को गिनीज बुक वर्ल्ड रिकॉर्ड भी मिल चुका है.
निर्वनो वध्यते व्याघ्रो निर्व्याघ्रं छिद्यते वनम्।
तस्माद्व्याघ्रो वनं रक्षेद्वनं व्याघ्रं च पालयेत्॥
इस श्लोक को महाभारत के उद्योग पर्व में लिखा गया है. इसका मतलब है कि बिना जंगल के बाघ मारे जाते हैं और बिना बाघ के जंगल काट दिए जाते हैं. इसलिए दोनों एक दूसरे के लिए जरूरी हैं. जब हम घने जंगलों में घूमने जाते हैं, तो मन में एक ही उम्मीद होती है कि काश, एक बार बाघ दिख जाए. पीली-काली धारियों वाला यह जानवर दुनिया में धीरे-धीरे कम होता जा रहा है. आज 'वर्ल्ड टाइगर डे' (International Tiger Day) है.
भारत के जंगलों में दुनिया भर के 70 प्रतिशत बाघ रहते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इतने खतरनाक जंगलों में रहने वाले इन बाघों को गिना कैसे जाता है?
आंकड़ों की बात करें तो आज दुनिया के कुल जंगली बाघों में से 75% से ज्यादा बाघ अकेले भारत के जंगलों में रहते हैं. लेकिन भारत को यह मुकाम इतनी आसानी से नहीं मिला. एक समय था जब देश में बाघों का नामोनिशान मिटने की नौबत आ गई थी. फिर ऐसा क्या हुआ कि भारत ने बाजी पलट दी? और सबसे बड़ा सवाल कि इन शर्मीले और खतरनाक जानवरों की गिनती आखिर होती कैसे है?
पैरों के निशान से AI तकनीक तक... बाघों की गिनती होती कैसे है?
अगर आपसे कोई कहे कि 50,000 वर्ग किलोमीटर में फैले जंगल में घूम रहे सारे बाघों को गिनकर बताओ, तो शायद आप सोचेंगे कि यह नामुमकिन है. बाघ इंसानों से दूर रहना पसंद करते हैं. वे घने नालों, ऊंची झाड़ियों और बीहड़ों में छिपे रहते हैं. फिर वन विभाग इन्हें गिनता कैसे है?
भारत में बाघों की जनगणना को तकनीकी भाषा में 'ऑल इंडिया टाइगर एस्टीमेशन' (AITE) कहा जाता है. यह गिनती हर 4 साल में एक बार होती है, और इसे पूरा करने में इंसानी मेहनत और टेक्नोलॉजी का सहारा लिया जाता है.
सबसे पहले फेस में, वन विभाग के हजारों बीट गार्ड और कर्मचारी अपनी जान जोखिम में डालकर जंगलों के कोने-कोने में पैदल गश्त लगाते हैं. वे बाघों के सीधे नहीं ढूंढते, बल्कि उनके छोड़े हुए सुराग ढूंढते हैं.
- पगमार्क यानी बाघ के पैरों के निशान. हर बाघ के पैर की बनावट और आकार थोड़ा अलग होता है.
- पेड़ों पर खरोंचें - बाघ अपने इलाके का दावा करने के लिए पेड़ों की छाल पर पंजों से खरोंच बनाते हैं.
- मल और पेशाब की गंध- इससे बाघ की मौजूदगी का पक्का सबूत मिल जाता है.
इन सभी सुरागों को अब कागज पर लिखने के बजाय एक खास मोबाइल ऐप 'M-STrIPES' पर दर्ज किया जाता है. कर्मचारी जैसे ही फोटो खींचते हैं, ऐप अपने आप उसकी GPS लोकेशन सेव कर लेता है.
'कैमरा ट्रैप' में आते हैं बाघ
सुराग मिलने के बाद शुरू होता है असली काम. वनकर्मी उन रास्तों पर कैमरे लगाते हैं जहां से बाघों के गुजरने की सबसे ज्यादा उम्मीद होती है.
इन्हें 'मोशन-सेंसिटिव कैमरा ट्रैप' कहा जाता है. इन कैमरों की खासियत यह होती है कि ये दिन-रात जंगल में लगे रहते हैं. जैसे ही कोई जानवर इनके सामने से गुजरता है, बॉडी की गर्मी या हलचल महसूस होते ही कैमरा अपने आप 2-3 फोटो खींच लेता है. पूरे देश के जंगलों में ऐसे 30,000 से भी ज्यादा कैमरे लगाए जाते हैं!
धारियों का मैच करके एआई से पैटर्न मैच किया जाता है
लेकिन कैमरे में आई लाखों तस्वीरों में से एक-एक बाघ को अलग-अलग कैसे पहचाना जाए? दरअसल जैसे इंसानों का फिंगरप्रिंट एक जैसा नहीं हो सकता है, वैसे ही बाघों की धारियां भी एक सी नहीं होती है. यानी सभी के पैटर्न अलग होते हैं.
वैज्ञानिक इन तस्वीरों को खास सॉफ्टवेयर (जैसे ExtractCompare और CaTRAT) में डालते हैं. यह सॉफ्टवेयर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से धारियों का पैटर्न मैच करता है. अगर किसी बाघ की फोटो पहले से डेटाबेस में है, तो ऐप बता देता है कि 'यह बाघ नंबर-12 है.' और अगर नई धारियां मिलती हैं, तो उसे एक नया बाघ मान लिया जाता है.
जिन इलाकों में कैमरे लगाना मुमकिन नहीं होता (जैसे पूर्वोत्तर के बेहद घने और दलदली जंगल), वहां बाघ के मल (Scat) से DNA निकालकर लैब में टेस्टिंग की जाती है.

Photo Credit: NDTV
भारत के नाम दर्ज है 'गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड'
जब भारत सरकार ने साल 2018-19 की बाघ जनगणना के नतीजे जारी किए, तो एक और बहुत बड़ी खबर आई. भारत की इस बाघ गिनती को दुनिया के सबसे बड़े कैमरा-ट्रैप वाइल्डलाइफ सर्वे के रूप में 'गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड' में शामिल किया गया!
ये सर्वे इतना बड़ा था कि इसमें जंगलों का 5,00,000 वर्ग किलोमीटर से ज्यादा का इलाका स्कैन किया गया. 32,588 अलग-अलग जगहों पर मोशन-कैमरे लगाए गए.
कैमरों ने कुल मिलाकर 3 करोड़ 50 लाख से ज्यादा तस्वीरें खींचीं थीं. इन तस्वीरों में से वन्यजीव वैज्ञानिकों ने 2,461 से ज्यादा अलग-अलग वयस्क बाघों की पहचान की.
पूरी दुनिया के वैज्ञानिक हैरान रह गए कि भारत ने इतने सटीक तरीके से अपने टाइगर की गिनती कर ली.
जब खाली हो गए थे जंगल, कैसे पड़ी थी प्रोजेक्ट टाइगर की नींव?
आज जब हम 3,500 से ज्यादा बाघों का जश्न मना रहे हैं, तो हमें उस खौफनाक दौर को नहीं भूलना चाहिए जब भारत में लगभग बाघ विलुप्त होने की कगार पर थे.
1960 और 70 के दशक में भारत में बाघों का अंधाधुंध शिकार हुआ. राजा-महाराजाओं के शौक, ब्रिटिश अफसरों की बंदूकों और फिर अंतरराष्ट्रीय अवैध शिकार के धंधे ने जंगलों को वीरान कर दिया था. हालात इतने बिगड़े कि 1973 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 'प्रोजेक्ट टाइगर' की शुरुआत की. उस समय देश में सिर्फ 9 टाइगर रिजर्व बनाए गए थे.
लेकिन असली झटका लगा साल 2005-06 में, जब राजस्थान के मशहूर 'सरिस्का टाइगर रिजर्व' से सारे बाघ गायब हो गए. शिकारियों ने एक-एक करके सारे बाघों को मार डाला था. 2006 की राष्ट्रीय गिनती में पता चला कि पूरे देश में महज 1,411 बाघ ही बचे हैं. यह देश के लिए एक बहुत बड़ा अलर्ट था.
इसके बाद स्पेशल टाइगर प्रोटेक्शन फोर्स (STPF को जंगलों में आधुनिक हथियारों के साथ तैनात किया गया, ताकि शिकारियों को रोका जा सके. टाइगर रिजर्व के बीच में बसे गांवों को सही मुआवजा देकर जंगल से बाहर बसाया गया ताकि इंसानों और बाघों का टकराव कम हो. इसके अलावा एक जंगल से दूसरे जंगल जाने वाले बाघों के रास्तों को सुरक्षित किया गया.

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बाघों को कैसा मौसम और माहौल पसंद आता है?
गौरतलब है कि बाघ बहुत ही मजबूत और किसी भी माहौल में ढलने वाला जानवर है. वह रूस की बर्फानी ठंड से लेकर राजस्थान की 45 डिग्री वाली गर्मी में भी जिंदा रह सकता है. लेकिन टाइगर को घना जंगल और छिपने की जगह चाहिए होती है. बाघ शेर की तरह खुले मैदान में शिकार नहीं करता. वह घात लगाकर हमला करता है. इसलिए उसे ऐसी झाड़ियां, ऊंची घास और घने पेड़ चाहिए जहां वह खुद को छिपा सके.
इसके अलावा भरपूर पानी भी चाहिए होता है. शेरों या तेंदुओं के मुकाबले बाघ को पानी से बहुत प्यार होता है. वे बेहतरीन तैराक होते हैं. गर्मियों के दिनों में बाघ घंटों तक पानी की बावड़ियों, ताल-तलैयों या छोटी नदियों में बैठे रहते हैं ताकि शरीर को ठंडा रख सकें.
बाघ को अच्छा शिकार चाहिए होते हैं. एक स्वस्थ बाघ को साल में कम से कम 40-50 बड़े शिकार (जैसे चीतल, सांभर, जंगली सूअर या गौर) की जरूरत होती है. जिस जंगल में चीतल और सांभर ज्यादा होंगे, बाघ वहीं अपना डेरा जमाएगा.
मौसम के हिसाब से देखें तो मध्य भारत के पर्णपाती जंगल, जैसे कि कान्हा, बांधवगढ़, पेंच और तराई के नमी वाले घास के मैदान (जैसे जिम कॉर्बेट और दुधवा) बाघों की सबसे पसंदीदा जगहें हैं. यहां ना बहुत ज्यादा जमा देने वाली ठंड होती है और गर्मियों में पानी के प्राकृतिक स्रोत भी मिल जाते हैं.
आज भारत में 58 से ज्यादा टाइगर रिजर्व हैं जो देश के लगभग 2.3% भूभाग को कवर करते हैं. पैरों के निशान से शुरू हुआ यह सफर आज AI और सैटेलाइट ट्रैकिंग तक पहुंच चुका है.
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