- MP के नौरादेही से गंभीर हालत में जबलपुर लायी गई बाघिन कैनाइन डिस्टेंपर जैसी वायरल बीमारी से जूझ रही थी.
- बाघिन के उपचार में गिलोय का सहायक उपयोग रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए विशेषज्ञों द्वारा किया गया था.
- कैनाइन डिस्टेंपर मांसाहारी जीवों के लिए खतरनाक बीमारी है जो श्वसन, पाचन और तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करती है.
इंसानों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में उपयोग होने वाली गिलोय अब एक बाघिन के इलाज में भी उम्मीद की किरण बनकर सामने आई है. मध्य प्रदेश के रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व, नौरादेही से गंभीर हालत में रेस्क्यू कर जबलपुर लायी गई युवा बाघिन कैनाइन डिस्टेंपर जैसी खतरनाक वायरल बीमारी से जूझ रही है.
करीब डेढ़ महीने से विशेषज्ञ डॉक्टरों की निगरानी में चल रहे उपचार के दौरान गिलोय का इस्तेमाल सहायक उपचार के रूप में किया. वन विभाग और चिकित्सकों का कहना है कि बाघिन की हालत में जो सुधार दिखाई दे रहा है, उसमें गिलोय ने भी सकारात्मक भूमिका निभाई है. हालांकि विशेषज्ञ साफ कर रहे हैं कि यह बीमारी का इलाज नहीं, बल्कि मुख्य उपचार के साथ रोग प्रतिरोधक क्षमता को सहारा देने का एक अतिरिक्त प्रयास है.
बीमारी से लड़ाई में अपनाया गया प्राकृतिक सहारा
मध्य प्रदेश की प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) डॉ. समीता राजौरा ने बताया कि बाघिन का उपचार नियमित दवाओं से किया जा रहा था, लेकिन कुछ दवाओं के कारण उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने की आशंका बनी हुई थी. ऐसे में चिकित्सकों ने प्राकृतिक तरीके से उसकी इम्युनिटी को मजबूत करने का निर्णय लिया. इसी सोच के तहत गिलोय को उपचार प्रक्रिया में शामिल किया. अधिकारियों के अनुसार, इसके अच्छे और उत्साहजनक परिणाम देखने को मिले हैं.
गिलोय इलाज का विकल्प नहीं
वन विभाग ने स्पष्ट किया है कि गिलोय को कैनाइन डिस्टेंपर का इलाज नहीं माना जा रहा है. बाघिन का मुख्य उपचार जबलपुर स्थित स्कूल ऑफ वाइल्डलाइफ एंड फॉरेंसिक हेल्थ सेंटर में विशेषज्ञ चिकित्सकों की देखरेख में जारी है. गिलोय केवल सहायक उपचार का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य शरीर की प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता को बेहतर बनाए रखना है.
घायल और भूखी हालत में मिली थी बाघिन
इस बाघिन की कहानी जुलाई के पहले सप्ताह में शुरू हुई थी. पांच जुलाई को नौरादेही क्षेत्र में उसने कथित तौर पर एक श्रमिक पर हमला किया था. इसके बाद वन विभाग की टीम को मोहली परिक्षेत्र में यह कम उम्र की बाघिन बेहद कमजोर, घायल और भूखी हालत में दिखाई दी. उसकी स्थिति चिंताजनक थी और तत्काल इलाज की जरूरत थी. हालांकि उसे सुरक्षित पकड़ने में वन विभाग को लगभग दो दिन का समय लगा.
जबलपुर लाए जाने पर हालत थी गंभीर
10 जुलाई को बाघिन को जबलपुर स्थित वेटरनरी यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ वाइल्डलाइफ एंड फॉरेंसिक हेल्थ सेंटर लाया. उस समय उसकी शारीरिक स्थिति इतनी खराब थी कि वह ठीक से चल भी नहीं पा रही थी. कमजोरी साफ दिखाई दे रही थी और चिकित्सकों के सामने उसे बचाने की बड़ी चुनौती थी.
दूसरी जांच में सामने आया खतरनाक संक्रमण
शुरुआती जांच में बाघिन की कैनाइन डिस्टेंपर रिपोर्ट निगेटिव आई थी, जिससे राहत मिली थी. लेकिन बाद में दोबारा हुई जांच में वह इस वायरस से संक्रमित पाई गई. इसके बाद चिकित्सकों की चिंता बढ़ गई, क्योंकि कैनाइन डिस्टेंपर जंगली मांसाहारी जीवों के लिए बेहद खतरनाक बीमारी मानी जाती है.
वन्यजीवों के लिए बड़ा खतरा है कैनाइन डिस्टेंपर
कैनाइन डिस्टेंपर वायरस श्वसन तंत्र, पाचन तंत्र और तंत्रिका तंत्र को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है. यह बीमारी कई बार जानलेवा साबित होती है. विशेषज्ञों के मुताबिक घरेलू कुत्ते इस संक्रमण के प्रमुख स्रोतों में शामिल हैं. यही कारण है कि जंगलों से सटे क्षेत्रों में यह वायरस वन्यजीव संरक्षण के लिए भी बड़ी चुनौती माना जाता है.
दोहरी मुश्किल से जूझ रही थी बाघिन
बाघिन के सामने सबसे बड़ी समस्या यह थी कि उसका शरीर पहले से ही चोट और लंबे समय तक भूखे रहने के कारण कमजोर हो चुका था. ऐसे में कैनाइन डिस्टेंपर जैसे गंभीर संक्रमण से लड़ने के लिए मजबूत रोग प्रतिरोधक क्षमता की जरूरत थी. इसी वजह से उपचार के साथ उसकी इम्युनिटी को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया.
अब चलने लगी, खाने लगी और दिख रहा सुधार
स्कूल ऑफ वाइल्डलाइफ एंड फॉरेंसिक हेल्थ सेंटर के निदेशक डॉ. आरके शर्मा के अनुसार, डेढ़ महीने के उपचार के बाद बाघिन की स्थिति पहले की तुलना में काफी बेहतर हुई है. जब उसे सेंटर लाया था, तब वह मुश्किल से चल पाती थी, लेकिन अब उसने चलना शुरू कर दिया है और नियमित रूप से भोजन भी कर रही है. चिकित्सकों ने पहले उसे चिकन और मटन दिया, जिसके बाद अब वह रोजाना भैंस का मांस खा रही है. डॉक्टर इसे स्वस्थ होने की दिशा में सकारात्मक संकेत मान रहे हैं.
खुराक पर रखी जा रही लगातार नजर
बाघिन की भूख को उसकी सेहत से जोड़कर देखा जा रहा है. कुछ समय पहले तक वह रोजाना चार से पांच किलो मांस खा रही थी. हालांकि बीच में उसकी खुराक कम हुई, जिससे वह फिर थोड़ी कमजोर नजर आने लगी. फिलहाल डॉक्टर उसकी भोजन की मात्रा, शारीरिक गतिविधियों और व्यवहार पर लगातार निगरानी रख रहे हैं ताकि स्वास्थ्य में आने वाले हर बदलाव को समय रहते समझा जा सके.
अभी तय नहीं हुई जंगल वापसी की तारीख
डॉक्टरों का कहना है कि फिलहाल बाघिन को वापस जंगल में छोड़ने की जल्दबाजी नहीं की जाएगी. उसे तभी प्राकृतिक आवास में छोड़ा जाएगा, जब वह पूरी तरह स्वस्थ हो जाएगी, सामान्य रूप से चलने लगेगी और उसकी शारीरिक क्षमता पूरी तरह लौट आएगी. अंतिम फैसला विस्तृत स्वास्थ्य परीक्षण और फिटनेस प्रमाणपत्र मिलने के बाद ही लिया जाएगा.
विशेषज्ञों की निगरानी में जारी है इलाज
डॉ. आरके शर्मा के मुताबिक अभी यह कहना मुश्किल है कि बाघिन को पूरी तरह स्वस्थ होने में कितना समय लगेगा. चिकित्सकों की टीम लगातार उसकी स्थिति पर नजर बनाए हुए है. स्वास्थ्य में सुधार जरूर दिख रहा है, लेकिन जंगल में स्वतंत्र जीवन जीने लायक फिट होने तक उसका उपचार और निगरानी जारी रहेगी.
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