- मैहर के सुलखमा में खत्म हो रही गांधीवादी स्वावलंबन की परंपरा
- रोजगार नहीं, इसलिए गांव छोड़ रहे युवा
- चंद घरों तक सीमित रह गया चरखा और कंबल उद्योग
गांधी जयंती पर जब देशभर में महात्मा गांधी के स्वावलंबन, ग्रामोद्योग और आत्मनिर्भरता के विचारों की चर्चा हो रही है, तब मध्य प्रदेश के मैहर जिले का सुलखमा गांव इन विचारों की जमीन पर जीवंत तस्वीर पेश करता है. यहां आज भी चरखा चलता है और भेड़ की ऊन से कंबल तैयार किए जाते हैं. लेकिन यह परंपरा अब संघर्ष के दौर से गुजर रही है. मेहनत के मुताबिक आमदनी नहीं मिलने, बाजार की कमी और नई पीढ़ी के पलायन ने इस गांधीवादी विरासत को विलुप्ति के मुहाने पर ला खड़ा किया है.
चरखे से जुड़ी है गांव की पहचान
मैहर जिला मुख्यालय से करीब 80 किलोमीटर दूर स्थित सुलखमा गांव लंबे समय से चरखा और ऊन आधारित कुटीर उद्योग के लिए जाना जाता है. यहां पाल समाज के परिवार पीढ़ियों से भेड़ पालन करते आ रहे हैं. भेड़ों से प्राप्त ऊन को संसाधित कर कंबल और पट्टी तैयार करना उनकी आजीविका का प्रमुख साधन रहा है. आज भी गांव की सुबह चरखे की आवाज के साथ होती है, लेकिन पहले की तुलना में यह आवाज अब काफी कम घरों तक सिमट गई है.
-
जिस शशि थरूर को सुनती है पूरी दुनिया, संसद में वह किसे सुनना पसंद करते हैं? खुद खोला राज -
रुपये की गिरती कीमत पर RBI गवर्नर का बड़ा बयान, कोई फिक्स लेवल नहीं, जानिए क्या है रिजर्व बैंक का एक्शन प्लान -
टाटा संस की शेयर बाजार में लिस्टिंग अनिवार्य? RBI गवर्नर ने NDTV समिट में बताया ये क्यों है जरूरी -
मैं कर्म में विश्वास करता हूं... NDTV वर्ल्ड समिट में तुषार ने बताया किन वजहों से जीता यूके में मेयर का चुनाव -
AI से बुलेट ट्रेन तक... अश्विनी वैष्णव ने बताया भारत का फ्यूचर प्लान -
बिकिनी सीन करने में कृति सेनन को क्यों लगे 12 साल? बोलीं- 6-7 साल पहले ऐसा नहीं कर पातीं -
NDTV World Summit 2026: वेजिटेरियन खिलाड़ियों को कौन सी दिक्कतें होती हैं? Savita, Neeru ने बताया -
NDTV World Summit 2026 के मंच पर भारत की 'गोल्डन गर्ल्स' ने बताया जीत का मंत्रा! | Asian Games 2026 -
NDTV World Summit 2026: Lovlina Borgohain ने बताया जीवन का सबसे बड़ा चैलेंज! क्यों लगने लगे ठहाके? -
NDTV World Summit 2026: हॉकी चैंपियन नेहा गोयल का बड़ा खुलासा! दर्द में भी जीत का जश्न

चरखे पर कताई करती गांव की महिला
Photo Credit: NDTV
भेड़ की ऊन से कंबल तक का कठिन सफर
सुलखमा के ग्रामीणों के लिए एक कंबल तैयार करना आसान काम नहीं है.
NDTV से बात करते हुए दुआसिया पाल ने बताया कि इसी धागे से हाथों से कंबल और पट्टी तैयार की जाती है. उनका कहना है कि एक कंबल तैयार करने में लगभग एक सप्ताह तक का समय लग जाता है. इतनी मेहनत के बावजूद बाजार में इसकी कीमत अधिकतम एक हजार रुपये तक ही मिल पाती है. उनका कहना है कि इस राशि में मेहनत और लागत निकालना भी मुश्किल हो जाता है.

भेड़ के ऊन से तैयार कंबल
Photo Credit: NDTV
बाजार नहीं, इसलिए गांव-गांव बेचते हैं कंबल
सरपंच शीला बाई बताती हैं कि कोल सुलखमा की सबसे बड़ी समस्या बाजार का अभाव है. गांव में तैयार होने वाले कंबलों के लिए कोई स्थायी विपणन व्यवस्था नहीं है. व्यापारी भी नियमित रूप से खरीदारी करने नहीं आते. ऐसे में ग्रामीणों को अपने तैयार उत्पाद लेकर अलग-अलग गांवों और कस्बों में घूमना पड़ता है. कई बार पूरी मेहनत के बाद भी उचित कीमत नहीं मिलती. चरखा ही अधिकांश परिवारों की आय का मुख्य स्रोत है, इसलिए बिक्री प्रभावित होने का सीधा असर उनके जीवन पर पड़ता है.
गांधी जयंती पर याद आता है गांव
ग्रामीणों का कहना है कि गांधी जयंती के आसपास अक्सर जनप्रतिनिधि और अधिकारी गांव पहुंचते हैं. वे गांव की इस अनूठी परंपरा की सराहना करते हैं और विभिन्न योजनाओं का भरोसा भी देते हैं. लेकिन वर्षों बाद भी कोई स्थायी समाधान नहीं निकल सका है. न तो बाजार उपलब्ध हो पाया और न ही उत्पादों की बिक्री के लिए कोई संगठित व्यवस्था बन सकी. ग्रामीणों के अनुसार उन्हें बार-बार आश्वासन तो मिलते हैं, लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति में बदलाव नहीं आता.

युवा करने लगे हैं पलायन
Photo Credit: NDTV
नई पीढ़ी छोड़ रही पुश्तैनी काम
एक समय था जब गांव में लगभग हर घर में चरखा चलता था. पुरुषों के साथ महिलाएं और बच्चे भी इस काम में दक्ष थे. लेकिन अब स्थिति तेजी से बदल रही है. कम आय और सीमित अवसरों के कारण नई पीढ़ी इस पेशे से दूरी बना रही है. गांव के कई युवा रोजगार की तलाश में दिल्ली, मुंबई, गुजरात और दूसरे शहरों का रुख कर चुके हैं. ग्रामीणों को डर है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले वर्षों में चरखा और उससे जुड़ी यह परंपरा पूरी तरह समाप्त हो सकती है.
गांधी की विरासत बचाने की चुनौती
सुलखमा गांव एक बड़ा सवाल खड़ा करता है. जिस चरखे को महात्मा गांधी ने आत्मनिर्भरता और स्वदेशी का प्रतीक बनाया था, उसी चरखे को चलाने वाले परिवार आज अपनी आजीविका के लिए संघर्ष कर रहे हैं. गांधी जयंती पर स्वावलंबन की बातें तो होती हैं, लेकिन सुलखमा जैसे गांवों में रहने वाले परिवार आज भी अपनी मेहनत का उचित मूल्य पाने के लिए जूझ रहे हैं. स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि सरकार बाजार, प्रशिक्षण, विपणन और आर्थिक सहयोग की ठोस व्यवस्था करे तो यह परंपरा न केवल बच सकती है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूत कर सकती है.
चरखे की आवाज कहीं इतिहास न बन जाए
सुलखमा में अब भी कुछ घरों में चरखा चलता है और भेड़ की ऊन से कंबल तैयार होते हैं. लेकिन हर गुजरते साल के साथ यह संख्या कम होती जा रही है. गांव के बुजुर्गों को चिंता है कि जिस परंपरा ने पीढ़ियों को जीवन दिया, वह कहीं सिर्फ इतिहास के पन्नों में न सिमट जाए. गांधी जयंती पर सुलखमा की कहानी सिर्फ एक गांव की नहीं, बल्कि उन तमाम ग्रामीण कुटीर उद्योगों की कहानी है जो मेहनत, हुनर और परंपरा के बावजूद बाजार और समर्थन के इंतजार में धीरे-धीरे दम तोड़ रहे हैं.
यह भी पढ़ें : अब एक्सप्रेस और डीलक्स बसों में भी महिलाओं को मुफ्त सफर; गांधी जयंती पर CM विजय का बड़ा तोहफा
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं