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मिसकैरेज की छुट्टी को मैटरनिटी लीव में नहीं जोड़ सकते, महिला कर्मचारी के लिए हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने महिला कर्मचारियों के अधिकारों पर बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि मिसकैरेज की छुट्टी को बाद में मिलने वाली मैटरनिटी लीव में नहीं जोड़ा जा सकता. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लीव बैलेंस कम होने के आधार पर मातृत्व लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता.

मिसकैरेज की छुट्टी को मैटरनिटी लीव में नहीं जोड़ सकते, महिला कर्मचारी के लिए हाई कोर्ट का बड़ा फैसला
  • हाईकोर्ट ने मिसकैरेज और मातृत्व अवकाश को अलग-अलग अधिकार मानते हुए उन्हें समायोजित न करने का फैसला सुनाया.
  • कोर्ट ने कहा कि लीव बैलेंस कम होने का हवाला देकर महिला कर्मचारी को मातृत्व लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता.
  • FCI की अपील खारिज कर किरण गौतम शर्मा को मिसकैरेज और मातृत्व अवकाश से जुड़े लाभ देने के निर्देश दिए.

महिला कर्मचारियों के मातृत्व अधिकारों को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि मिसकैरेज के दौरान लिया गया अवकाश और बाद की गर्भावस्था के लिए मिलने वाला मातृत्व अवकाश दो अलग-अलग अधिकार हैं, जिन्हें एक-दूसरे में समायोजित नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल लीव बैलेंस कम होने का हवाला देकर किसी महिला कर्मचारी को मातृत्व लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता. इस फैसले को कामकाजी महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा के लिहाज से अहम माना जा रहा है.

FCI की अपील को हाईकोर्ट ने किया खारिज

यह मामला फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (FCI) की महिला कर्मचारी किरण गौतम शर्मा से जुड़ा है. मामले की सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने FCI की अपील खारिज कर दी. अदालत ने सिंगल बेंच के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें महिला कर्मचारी को मिसकैरेज और मातृत्व अवकाश से जुड़े लाभ देने के निर्देश दिए थे.

जुड़वा गर्भावस्था के दौरान आई थी जटिलता

किरण गौतम शर्मा वर्ष 2019 में जुड़वा बच्चों की गर्भवती थीं. गर्भावस्था के दौरान 25 अप्रैल 2019 को स्वास्थ्य संबंधी जटिलता के कारण एक भ्रूण का मिसकैरेज हो गया. वहीं दूसरे भ्रूण की स्थिति को डॉक्टरों ने हाई रिस्क बताया और उन्हें लंबे समय तक बेड रेस्ट की सलाह दी. बाद में 3 सितंबर 2019 को उन्होंने एक बच्ची को जन्म दिया.

अवकाश और इलाज खर्च का किया था दावा

मिसकैरेज और बाद की गर्भावस्था के दौरान कर्मचारी ने नियमानुसार अवकाश का लाभ मांगा था. इसके साथ ही निजी अस्पताल में हुए इलाज के खर्च की प्रतिपूर्ति की मांग भी की थी. उनका कहना था कि चिकित्सकीय परिस्थितियों के कारण उन्हें लंबे समय तक आराम और उपचार की आवश्यकता पड़ी.

FCI ने 68 दिन की छुट्टी को माना एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी लीव

FCI ने महिला कर्मचारी के 68 दिनों के अवकाश को एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी लीव मान लिया. इसके चलते उस अवधि का वेतन नहीं दिया और उनके वेतन से 80,254 रुपये की कटौती भी कर ली. इसी फैसले को चुनौती देते हुए कर्मचारी ने अदालत का दरवाजा खटखटाया.

मामला हाईकोर्ट पहुंचने पर सिंगल बेंच ने 13 मई 2026 को महिला कर्मचारी के पक्ष में फैसला सुनाया. अदालत ने कहा कि उन्हें मिसकैरेज और मातृत्व अवकाश का लाभ मिलना चाहिए. कोर्ट ने कुल 90 दिन के अवकाश का लाभ देने और वेतन से काटी गई राशि को वापस करने के निर्देश दिए. साथ ही मेडिकल खर्च की प्रतिपूर्ति के मामले पर नियमों के अनुसार दोबारा निर्णय लेने को कहा.

डिवीजन बेंच ने भी माना सिंगल बेंच का फैसला सही

सिंगल बेंच के आदेश से असहमत FCI ने डिवीजन बेंच में अपील दायर की. निगम ने लीव बैलेंस और अवकाश नियमों का हवाला देकर अपने फैसले को सही ठहराने की कोशिश की. हालांकि डिवीजन बेंच ने इन तर्कों को स्वीकार नहीं किया और माना कि सिंगल बेंच के आदेश में किसी तरह के हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है.

मातृत्व लाभ पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि मातृत्व लाभ का उद्देश्य महिला कर्मचारी के स्वास्थ्य, सम्मान और कल्याण की रक्षा करना है. ऐसे अधिकारों को केवल तकनीकी आधारों या प्रशासनिक प्रक्रियाओं के कारण सीमित नहीं किया जा सकता. अदालत ने कहा कि मातृत्व से जुड़े वैधानिक लाभ महिलाओं को सम्मानजनक और सुरक्षित कार्य वातावरण देने के लिए बनाए गए हैं.

लीव बैलेंस कम होने का तर्क नहीं चलेगा

कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि कर्मचारी के खाते में पर्याप्त अवकाश नहीं होने का आधार बनाकर मातृत्व लाभ से इनकार नहीं किया जा सकता. पीठ ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसले का भी उल्लेख किया और कहा कि महिलाओं के वैधानिक अधिकारों की व्याख्या व्यापक और संवेदनशील दृष्टिकोण से की जानी चाहिए.

वेतन कटौती भी नहीं रहेगी प्रभावी

अदालत ने माना कि जब महिला कर्मचारी संबंधित अवकाश की कानूनी रूप से हकदार है, तो केवल अवकाश की उपलब्धता कम होने के आधार पर वेतन से की गई 80,254 रुपये की कटौती भी सही नहीं ठहराई जा सकती. इसलिए कर्मचारी को इस मामले में भी राहत दी गई.

मेडिकल बिलों पर प्राधिकरण करेगा फैसला

हालांकि मेडिकल खर्च की प्रतिपूर्ति को लेकर हाईकोर्ट ने सीधे भुगतान का आदेश नहीं दिया. अदालत ने संबंधित प्राधिकरण को निर्देश दिए हैं कि कर्मचारी द्वारा प्रस्तुत मेडिकल बिलों और दस्तावेजों की जांच कर नियमों के अनुसार नए सिरे से फैसला लिया जाए. 

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