Women Jobs Gap In Top Indian Cities: बड़े शहरों में अच्छी नौकरी पाने का सपना बहुत से लोग देखते हैं. लोगों को लगता है कि वहां अच्छी सैलरी, मॉडर्न ऑफिस और बेहतर करियर मिलेगा. लेकिन नई रिपोर्ट बताती है कि हर किसी का अनुभव एक जैसा नहीं होता. खासकर महिलाओं के लिए नौकरी के मौके अब भी कई मामलों में सीमित हैं.
बड़े शहरों में महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर अब भी सीमित और शहर-विशेष सेक्टरों तक सिमटे हैं. जैसे कि सूरत और लुधियाना में टेक्सटाइल फैक्ट्रियां तो बेंगलुरु-पुणे में आईटी सेक्टर महिलाओं को अच्छे मौके दे रहा है. हालांकि, प्रयागराज और पटना जैसे शहरों में पढ़ी-लिखी महिलाओं के लिए टीचिंग ही मुख्य विकल्प है. कंस्ट्रक्शन और ट्रांसपोर्ट जैसे सेक्टर्स में तो महिलाओं की भागीदारी न के बराबर है. भले ही 65% कामकाजी महिलाएं फॉर्मल सेक्टर में हैं, लेकिन नौकरी छूटने पर उनके पास विकल्प नहीं बचते हैं.
सरकार की रिपोर्ट लेबर मार्केट डायनेमिक्स इन मिलियन प्लस सिटीज में देश के 46 ऐसे शहरों की स्टडी की गई है जिनकी (नगर निगम की) आबादी 10 लाख से ज्यादा है. रिपोर्ट में लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन, बेरोजगारी, नौकरी के प्रकार और अलग-अलग सेक्टर में महिलाओं और पुरुषों की हिस्सेदारी को देखा गया है. रिपोर्ट के मुताबिक, जिन सेक्टर में पुरुषों के लिए कई मौके हैं, वहां महिलाओं के लिए वही अवसर कई बार कम, अस्थायी या बिल्कुल नहीं हैं.

मैन्युफैक्चरिंग और आईटी सेक्टर में मिले ज्यादा मौके
देश के बड़े शहरों में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में 22% पुरुष और 20% महिलाएं काम करती हैं. पहली नजर में यह अंतर कम लगता है, लेकिन शहरों के हिसाब से तस्वीर पूरी तरह बदल जाती है. लुधियाना में 48% कामकाजी महिलाएं फैक्ट्री में काम करती हैं. वहीं 56% पुरुष भी मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में हैं. सूरत में 55% महिलाएं मैन्युफैक्चरिंग से जुड़ी हैं, जो पुरुषों से भी थोड़ा ज्यादा है. इंदौर, राजकोट और फरीदाबाद में भी इस सेक्टर में महिलाओं की अच्छी भागीदारी है.
दूसरी तरफ रांची, पटना, प्रयागराज और कोटा जैसे शहरों में फैक्ट्री में काम करने वाली महिलाओं की संख्या बहुत कम है. रिपोर्ट कहती है कि टेक्सटाइल और गारमेंट इंडस्ट्री ने महिलाओं के लिए मौके बनाए हैं, लेकिन इंजीनियरिंग और मेटल इंडस्ट्री में ऐसा नहीं हो पाया है. आईटी, फाइनेंशियल सर्विस, रियल एस्टेट और प्रोफेशनल सर्विस वाले सेक्टर सबसे ज्यादा संतुलित हैं. इन क्षेत्रों में 20% पुरुष और 19% महिलाएं काम करती हैं. बेंगलुरु में अकेले आईटी सेक्टर में 23% महिलाएं और 20% पुरुष काम करते हैं. पुणे, चेन्नई और हैदराबाद में भी महिलाओं के लिए प्रोफेशनल जॉब के अच्छे मौके हैं.

कंस्ट्रक्शन और ट्रांसपोर्ट सेक्टर में महिलाएं अब भी काफी पीछे
रिपोर्ट के मुताबिक कंस्ट्रक्शन सेक्टर कई शहरों में पुरुषों के लिए बड़ा रोजगार देने वाला क्षेत्र है, लेकिन यहां महिलाओं की मौजूदगी बहुत कम है. धनबाद, जबलपुर, विशाखापट्टनम, वडोदरा और श्रीनगर जैसे शहरों में कंस्ट्रक्शन सेक्टर में पुरुष बड़ी संख्या में काम करते हैं, जबकि महिलाएं लगभग नहीं हैं. ट्रांसपोर्ट और स्टोरेज सेक्टर में भी यही स्थिति है. रिपोर्ट के अनुसार सेफ्टी की चिंता, नाइट शिफ्ट, लंबी दूरी की यात्रा, अनौपचारिक भर्ती और सामाजिक सोच महिलाओं की भागीदारी को सीमित करती है.
एजुकेशन और डोमेस्टिक वर्क बना महिलाओं का बड़ा सहारा
रिपोर्ट बताती है कि एजुकेशन सेक्टर महिलाओं के लिए सबसे मजबूत विकल्प बना हुआ है. बड़े शहरों में 12% कामकाजी महिलाएं एजुकेशन सेक्टर में हैं, जबकि पुरुषों की हिस्सेदारी करीब 2% है. प्रयागराज सबसे आगे है, जहां 45% कामकाजी महिलाएं एजुकेशन सेक्टर में काम करती हैं. पटना, लखनऊ और मेरठ जैसे शहरों में पढ़ी-लिखी महिलाओं के लिए टीचिंग कई बार एकमात्र सुरक्षित और स्वीकार्य नौकरी का विकल्प बन जाती है. हेल्थकेयर सेक्टर में भी महिलाओं की अच्छी मौजूदगी है.

डोमेस्टिक वर्क में भी महिलाओं की संख्या ज्यादा है. करीब 13% महिलाएं घरेलू काम, खाना बनाने, सफाई और देखभाल जैसे काम करती हैं. रिपोर्ट कहती है कि असली संख्या इससे भी ज्यादा हो सकती है क्योंकि इस तरह का काम ज्यादातर अनऑर्गेनाइज्ड सेक्टर में होता है. कोलकाता, पुणे और नागपुर में 25% से ज्यादा कामकाजी महिलाएं डोमेस्टिक वर्क पर निर्भर हैं.
नौकरी छूटने पर महिलाओं के सामने बचते हैं कम रास्ते
रिपोर्ट के मुताबिक काम करने वाली महिलाओं में करीब 65% रेगुलर सैलरी वाली नौकरी में हैं, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा 56% है. लेकिन महिलाओं का वर्कर पॉपुलेशन रेशियो सिर्फ 25.5% है. यानी कम महिलाएं काम करती हैं, लेकिन जो काम करती हैं उनमें बड़ी संख्या फॉर्मल सेक्टर में होती है. रिपोर्ट कहती है कि जैसे-जैसे भारत में फॉर्मल जॉब बढ़ रही हैं, महिलाओं के लिए नए मौके बन रहे हैं. लेकिन आर्थिक मंदी आने पर सबसे पहले फॉर्मल जॉब पर असर पड़ता है और महिलाओं की नौकरी जाने का खतरा ज्यादा रहता है.

पुरुष जरूरत पड़ने पर दूसरे सेक्टर या दूसरे शहर में आसानी से काम तलाश लेते हैं. सामाजिक व्यवस्था उन्हें ज्यादा आजादी देती है. लेकिन महिलाओं के लिए ऐसा करना आसान नहीं होता. अगर महिलाओं की फॉर्मल नौकरी चली जाती है, तो उनके पास अक्सर दो ही रास्ते बचते हैं. या तो वे अस्थायी और कम सुरक्षित अनऑर्गेनाइज्ड काम करें, या फिर पूरी तरह लेबर फोर्स से बाहर हो जाएं.
रिपोर्ट के आखिर में कहा गया है कि महिलाओं के लिए सिर्फ नई इंडस्ट्री लाना काफी नहीं है. सेफ्टी, तय काम के घंटे, बेसिक सुरक्षा, साफ कॉन्ट्रैक्ट और बेहतर काम का माहौल जैसी छोटी लेकिन जरूरी सुविधाएं तय करेंगी कि महिलाएं नौकरी में बनी रहेंगी या फिर काम छोड़ देंगी.
(Source: NDTV Profit, अनुवाद- मधुलिका)
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