भोपाल... झीलों का शहर. गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल. नवाबी रिवायतों, पुराने बाजारों और तंग गलियों में बसी वह राजधानी, जिसे लोग अमन, अदब और तहजीब के नाम से जानते रहे हैं. लेकिन इसी शहर की कुछ गलियां अब जांच एजेंसियों की फाइलों में एक अलग वजह से दर्ज हो रही हैं. वजह है आतंक, कट्टरपंथ और वह डिजिटल अंधेरा, जहां एक मोबाइल फोन, कुछ बंद ग्रुप और सीमा पार बैठा एक हैंडलर किसी आम दिखने वाले आदमी को कथित तौर पर लोन वुल्फ (Lone Wolf) हमलावर में बदलने की कोशिश करता है. जांच एजेंसियों के मुताबिक, इस बंद ग्रुप में शामिल लोग मारे जा चुके पाकिस्तानी आतंकियों के नामों से अपनी पहचान चलाते थे.
मध्य प्रदेश एटीएस ने शुक्रवार को पुराने भोपाल के कांग्रेस नगर, काजी कैंप इलाके से 35 साल के मोहम्मद फराज को गिरफ्तार किया. शुरुआत में यह एक और एटीएस कार्रवाई लग रही थी, लेकिन जैसे-जैसे पूछताछ आगे बढ़ी, कहानी भोपाल की एक गली से निकलकर उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार और कथित तौर पर पाकिस्तान तक पहुंच गई.

भोपाल ATS ने ‘लोन वुल्फ' मॉड्यूल के संदिग्ध को गिरफ्तार किया.
कई हफ्तों से जांच एजेंसियों की थी नजर
जांच एजेंसियों के मुताबिक, फराज कोई अचानक पकड़ा गया नाम नहीं था. उस पर कई हफ्तों से नजर रखी जा रही थी. केंद्रीय खुफिया एजेंसियों से मिले इनपुट के बाद एटीएस ने उसके डिजिटल फुटप्रिंट, संपर्कों और ऑनलाइन गतिविधियों को खंगालना शुरू किया. दावा है कि वर्ष 2021 में, जब देश कोरोना की दूसरी और सबसे भयावह लहर से जूझ रहा था, उसी दौरान फराज इंटरनेट पर जिहाद से जुड़ी सामग्री तलाशने लगा.
होम्योपैथी क्लिनिक में करता था काम
फराज एक होम्योपैथी क्लिनिक में काम करता था. एक छोटी बेटी का पिता था. बाहर से सामान्य जीवन, भीतर कथित तौर पर कट्टरपंथी सामग्री की दुनिया. सूत्रों का दावा है कि उसके मोबाइल और अन्य डिजिटल उपकरणों से अरबी जिहादी साहित्य, आतंकियों का महिमामंडन करने वाले वीडियो, अफगानिस्तान और पश्चिम एशिया में आतंकी संगठनों की क्रूरता से जुड़े दृश्य, ट्रेनिंग से जुड़े फुटेज और उग्र इस्लामी भाषणों की सामग्री मिली है. आरोप है कि इसी सामग्री के जरिए उसके मन में यह धारणा मजबूत की जा रही थी कि उसका समुदाय खतरे में है और उसे किसी बड़े हिंसक रास्ते पर जाना चाहिए.
अफगानिस्तान जाने की तैयारी में था फराज!
जांचकर्ताओं के अनुसार, फराज सिर्फ प्रभावित नहीं था, बल्कि वह कथित तौर पर आगे बढ़ चुका था. उसने पासपोर्ट बनवा लिया था. एजेंसियों को शक है कि वह अफगानिस्तान जाने की तैयारी कर रहा था, जहां से आगे पश्चिम एशिया जाकर मुजाहिदीन के रूप में लड़ने की मानसिक तैयारी बना रहा था. लेकिन इससे पहले कि यह योजना किसी खतरनाक मोड़ तक पहुंचती, एटीएस ने उसे भोपाल से दबोच लिया.

होम्योपैथी क्लिनिक में काम करता था मोहम्मद फराज.
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'नौजवानों को भड़काने का प्रयास'
इस मामले में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने एनडीटीवी के सवाल के जवाब में इसे केवल एक गिरफ्तारी नहीं, बल्कि समय रहते नाकाम की गई साजिश बताया. उन्होंने कहा, 'हमारे राज्य के अंदर मोदी जी के माध्यम से देश में कानून व्यवस्था की उत्कृष्ट स्थिति है. आज केन्द्र और राज्यों के बीच सुगठित रूप से देश में होने वाले षड्यंत्रों को घटित होने से पहले पकड़ा जा रहा है. हम सब जानते हैं वर्षों से पाकिस्तान ऐसी हरकतें करता आ रहा है कि ऐसे तत्व पनपें और हमारे देश में जो युवा हैं, उनका मन बिगाड़ करके उनको गलत मार्ग पर ले जाएं. इनका हैंडलर पाकिस्तान का था. उसने बहुत गंदे साहित्य, जो पाकिस्तान का तरीका है, हिन्दू-मुस्लिम के बीच दरार पैदा करने वाले, हमारे नौजवानों को भड़काने का प्रयास किया. हमारी पुलिस ने समय रहते उन्हें ट्रेस किया, सारा साहित्य पकड़ा और पूरा भंडाफोड़ हुआ. मुझे संतोष है कि सतर्कता, सजगता और प्रशासनिक दक्षता से हम इससे निपट सकते हैं. हमारे प्रशासन में इन बातों का लाभ मिल रहा है.'
अलग-अलग राज्यों से हुई गिरफ्तारी
एटीएस की जांच में फराज के बाद उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से नईम अब्दुल्ला कुरैशी, राजस्थान के अलवर से मोहम्मद शाकिर मेव और बिहार के मधुबनी से 65 वर्षीय मौलाना इजहार-उल-हक की गिरफ्तारी हुई. जांच एजेंसियों को शक है कि इजहार-उल-हक इस पूरे समूह का “अमीर” या वैचारिक मार्गदर्शक था. आरोप है कि वही अलग-अलग राज्यों के युवाओं को ऑनलाइन बैठकों के जरिए जोड़ता, दिशा देता और कथित तौर पर लोन वुल्फ हमलों के लिए तैयार करने की कोशिश करता था.

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'खालिद सैफुल्लाह' के नाम से सक्रिय था फराज
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जांच सूत्रों के मुताबिक इस बंद ग्रुप में शामिल लोग मारे जा चुके पाकिस्तानी आतंकियों के नामों से अपनी पहचान चलाते थे. दावा है कि फराज “खालिद सैफुल्लाह” के नाम से सक्रिय था, जो भारत में कई आतंकी वारदातों से जुड़े एक पाकिस्तानी आतंकी का नाम रहा है. एजेंसियों को शक है कि यह केवल नाम बदलने का खेल नहीं था, बल्कि कट्टरपंथी मनोविज्ञान का हिस्सा था, जिसमें आरोपी खुद को किसी बड़े हिंसक अभियान का सैनिक समझने लगते थे. लेकिन सवाल केवल फराज का नहीं है, सवाल भोपाल का भी है.
5 सालों में आतंकी नेटवर्क से जुड़े कई लोग गिरफ्तार
वर्ष 2022 में ऐशबाग की अहमद नगर कॉलोनी से जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश यानी जेएमबी मॉड्यूल का खुलासा हुआ था. उसी साल पीएफआई नेटवर्क से जुड़े कथित नेता डॉ. अनवर सिद्दीकी को गिरफ्तार किया गया. वर्ष 2023 में एटीएस ने भोपाल और छिंदवाड़ा से हिज्ब-उत-तहरीर से जुड़े 11 लोगों को गिरफ्तार किया. वर्ष 2025 में ऐशबाग में टेरर फंडिंग और निशातपुरा में पाकिस्तान आधारित सोशल मीडिया नेटवर्क से जुड़े मामलों में कार्रवाई हुई. इसी साल अक्टूबर में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने आईएसआईएस से जुड़े एक केस में भोपाल निवासी अदनान को गिरफ्तार किया.
इन घटनाओं को अलग-अलग देखा जाए तो यह सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई लगती हैं. लेकिन इन्हें एक साथ जोड़ा जाए तो एक बेचैन करने वाली तस्वीर सामने आती है. भोपाल, जो कभी तहजीब और तालों का शहर कहा जाता था, अब कट्टरपंथी नेटवर्क की नजरों में बार-बार क्यों आ रहा है?
भोपाल में आतंकी नेटवर्क का भंडाफोड़
फराज को कोर्ट ने न्यायिक हिरासत में भेज दिया है. नईम, शाकिर और इजहार-उल-हक से पूछताछ के बाद एजेंसियां यह जानने की कोशिश कर रही हैं कि इस कथित नेटवर्क में और कितने लोग शामिल हैं, क्या देश के दूसरे हिस्सों में भी ऐसे मॉड्यूल सक्रिय हैं और क्या भोपाल केवल एक कड़ी है या किसी बड़े षड्यंत्र का अहम पड़ाव.
फिलहाल भोपाल की झीलें शांत हैं. पुराने शहर की गलियों में वही चहल-पहल है. बाजार खुले हैं. लोग अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में व्यस्त हैं. लेकिन सुरक्षा एजेंसियों की फाइलों में एक सवाल अब भी खुला है. क्या भोपाल में आतंक की साजिश पकड़ी गई है, या किसी और बड़े नेटवर्क का केवल पहला दरवाजा खुला है?
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