मध्य प्रदेश से साइबर ठगी का एक खौफनाक मामला सामने आया है. भोपाल के एक बुजुर्ग दंपती को जालसाजों ने लगभग तीन महीने तक डिजिटल अरेस्ट में रखा. साइबर ठगों ने खुद को दिल्ली पुलिस का अफसर, चीफ इन्वेस्टिगेशन ऑफिसर और सुप्रीम कोर्ट का जज बताया था. ठगों ने दंपती को करोड़ों के मनी लॉन्ड्रिंग केस में फंसाने की धमकी दी. डर के मारे दंपती ने जेवर गिरवी रखकर 22 लाख रुपये तक दे दिए, फिर भी ठगों ने पीछा नहीं छोड़ा.
पुलिस के अनुसार, भोपाल के कोलार स्थित कृष्णा कॉम्प्लेक्स गणपति एन्क्लेव में रहने वाले सुवर्णा लक्ष्मी और नरसिम्हा राव मूल रूप से आंध्र प्रदेश के पलनाडु जिले से हैं. वह फरवरी में शिवरात्रि मनाने परिवार के साथ आंध्र प्रदेश गए थे और यहीं से ठगी का खेल शुरू हुआ था.
19 मई को आया था पहला कॉल
पुलिस के अनुसार, पहला कॉल 19 मई को सुवर्णा के मोबाइल पर आया था. तब जालसाज ने खुद को दिल्ली के दरियागंज थाने का अफसर बताते हुए कहा था कि आपके नाम गिरफ्तारी वारंट जारी हुआ है. दिल्ली के केनरा बैंक खाते से नरेश गोयल के मनी लॉन्ड्रिंग केस में करोड़ों रुपये के लेनदेन का आरोप लगाया.
इसके बाद वीडियो कॉल पर पूछताछ शुरू हुई. दंपती को किसी से बात करने और घर से बाहर निकलने से रोक दिया गया.
जांच अधिकारी, फर्जी जज से कराई बात
फिर 21 मई को एक मिला ने कॉल किया और खुद को चीफ इन्वेस्टिगेशन अधिकारी बताया. फिर अगले ही दिन वीडियो कॉल पर फर्जी जज से बात कराई. उसने दंपती के आधार कार्ड की डिटेल दिखाकर कार्रवाई की धमकी दी. फिर 9 जून को फर्जी जज कॉल किया और दंपती की संपत्ति सीज करने का आदेश सुनाया. इसके बाद निशा पटेल नाम की महिला ने दंपती को भोपाल लौटने को कहा.
FD तुड़वाओ, जेवर बेचो या गिरवी रखो
दंपती 10 जून को आंध्र प्रदेश से रवाना होकर 11 जून को भोपाल पहुंचे. 12 जून को जेवर गिरवी रखकर 22 लाख रुपये जुटाए. आरोपियों ने मामला खत्म करने के नाम पर एफडी और जेवर बेचने या गिरवी रखने को कहा था. इसके बाद वह आरोपियों के बताए अलग-अलग बैंक खातों में पांच बार में रकम जमा की.
23 अगस्त तक चलती रही निगरानी
आरोपी जालसाजों ने बुजुर्ग दंपती से बात करने के लिए 7 अलग-अलग वॉट्सऐप नंबरों का इस्तेमाल किया था. 22 लाख देने के बाद भी दंपती को नहीं छोड़ा गया. 23 अगस्त तक वीडियो कॉल के जरिए निगरानी चलती रही.
जब पता चला, सब फर्जी है
काफी दिनों तक जालसाजों के चंगुल में फंसे रहने के दौरान दंपती को शक हुआ, फिर मामले की जानकारी जुटाई तो पता चला कि सुप्रीम कोर्ट का बताया गया आदेश फर्जी था. 19 मई से 23 अगस्त तक कुल 96 दिन डिजिटल अरेस्ट का घटनाक्रम चला था. फिर दंपती ने साइबर सेल से संपर्क किया और शिकायत की. 27 अगस्त को मामले में एफआईआर दर्ज की गई, फिर केस की डायरी कोलार थाने भेजी. पुलिस अब सातों WhatsApp नंबरों, वीडियो कॉल और पांच अलग-अलग खातों में हुए ट्रांजेक्शन की जांच कर रही है.
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