- आगरा में मिली दस तेंदुओं की खालों से शुरू हुई जांच मध्यप्रदेश के वन क्षेत्रों और वाइल्डलाइफ एसओएस तक पहुंची.
- मध्यप्रदेश की वन्यजीव जांच में भगवान सिंह नामक आरोपी की दूसरी पहचान सलीम सामने आई और उसका रहस्य बना हुआ है.
- जांच में भारी प्रतिबंधित लोहे के फंदे बरामद हुए जो हरियाणा से मध्यप्रदेश तक कथित रूप से आपूर्ति किए गए थे.
उसका नाम भगवान सिंह था. लेकिन वन्यजीव तस्करी, मुखबिरों, शिकारियों और शिकार-रोधी अभियानों की इस रहस्यमयी दुनिया में जांचकर्ताओं के मुताबिक भगवान सिंह को एक और पहचान मिली. 'सलीम'. भगवान आखिर 'सलीम' कैसे बन गया? अब यही सवाल मध्यप्रदेश की एक बेहद सनसनीखेज वन्यजीव जांच के केंद्र में है.
कहानी की शुरुआत आगरा में बरामद 10 तेंदुओं की खालों से हुई. जांच की कड़ियां पीछे की ओर जुड़ीं तो मध्यप्रदेश के चीता परिदृश्य के जंगलों तक पहुंचीं. श्योपुर और मुरैना के जंगलों से प्रतिबंधित लोहे के फंदे मिले, कई गिरफ्तारियां हुईं, डिजिटल सबूत सामने आए और आखिरकार जांच की आंच दिल्ली स्थित देश की प्रमुख वन्यजीव संरक्षण संस्थाओं में शामिल वाइल्डलाइफ एसओएस तक पहुंच गई.
वन विभाग के सूत्रों का आरोप है कि संस्था से जुड़े लोगों ने भगवान सिंह को 'सलीम' के नाम से तैयार किया था. सूत्रों का आरोप है कि जरूरत पड़ने पर इस पहचान के जरिए मामले को सांप्रदायिक रंग दिया जा सकता था. अब जांच एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि भगवान को 'सलीम' किसने कहा, यह नाम कहां-कहां इस्तेमाल हुआ और वाइल्डलाइफ एसओएस से जुड़े लोगों के साथ उसके रिश्ते की वास्तविक प्रकृति क्या थी?
डिजिटल सबूतों से संस्था तक पहुंची जांच
एनडीटीवी से एक्सक्लूसिव बातचीत में मध्यप्रदेश की प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) एवं मुख्य वन्यजीव अभिरक्षक डॉ. समीता राजौरा ने कहा कि गिरफ्तार आरोपियों से मिली जानकारी और जांच के दौरान जुटाए गए डिजिटल सबूतों ने एजेंसियों को वाइल्डलाइफ एसओएस से जुड़े संपर्कों तक पहुंचाया.
डॉ. राजौरा के मुताबिक जांच में सामने आया कि आरोपियों के तार वाइल्डलाइफ एसओएस से जुड़े थे और इन्हीं संबंधों की भूमिका की अब जांच की जा रही है. गिरफ्तार आरोपियों में से दो ने पूछताछ में वाइल्डलाइफ एसओएस के मुख्य कार्यकारी अधिकारी और सह-संस्थापक कार्तिक सत्यनारायण का नाम लिया. इसके बाद उन्हें जांच अधिकारी के सामने उपस्थित होकर अपना बयान दर्ज कराने के लिए बुलाया.
वाइल्डलाइफ एसओएस कौन है और आरोप इतने गंभीर क्यों हैं?
वाइल्डलाइफ एसओएस दिल्ली स्थित एक प्रमुख वन्यजीव संरक्षण संस्था है. संस्था के मुताबिक वह पिछले 32 वर्षों से अधिक समय से 19 राज्यों में वन्यजीव बचाव, पुनर्वास और संरक्षण का काम कर रही है और विभिन्न वन विभागों के साथ मिलकर 5.31 लाख से अधिक जानवरों के बचाव में सहायता कर चुकी है.
संस्था का काम शिकार-रोधी खुफिया जानकारी जुटाने, यानी वन्यजीव अपराध और शिकार से जुड़ी सूचनाएं इकट्ठा करने तक भी फैला है. और यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा विरोधाभास है.
जांचकर्ताओं के सामने सवाल है. क्या संदिग्ध शिकारियों को वन्यजीव तस्करों तक पहुंचने के लिए मुखबिर के तौर पर तैयार किया जा रहा था, या यह रिश्ता उस सीमा को पार कर गया जहां अपराध की जानकारी जुटाने और अपराध को कथित तौर पर बढ़ावा देने के बीच की लकीर धुंधली हो जाती है? वाइल्डलाइफ एसओएस का कहना है कि वैध शिकार-रोधी खुफिया काम को गलत तरीके से वन्यजीव अपराध में भागीदारी के रूप में पेश किया जा रहा है.
17 अगस्त को जारी अपने बयान में संस्था ने आरोपों को पूरी तरह खारिज किया. उसने चेतावनी दी कि यदि शिकार-रोधी खुफिया जानकारी जुटाने के काम को ही अपराध मान लिया तो भविष्य में मुखबिर, सूचना देने वाले लोग और वन्यजीव अपराध का खुलासा करने वाले व्यक्ति एजेंसियों की मदद करने से डरेंगे.

तेंदुए का शव मिलने के बाद उसे जांच के लिए लेब ले जाया गया.
'न्याय का घोर मजाक'- वाइल्डलाइफ एसओएस
वाइल्डलाइफ एसओएस ने अपने खिलाफ लगाए जा रहे आरोपों को 'न्याय का घोर मजाक' करार देते हुए कहा कि उसके पास आरोपों को गलत साबित करने के लिए रिकॉर्ड और पर्याप्त सबूत हैं और संस्था जांच में पूरा सहयोग कर रही है. कार्तिक ने संस्था के बयान में कहा कि यह घटनाक्रम चौंकाने वाला है और वे बेहद चिंतित हैं. उन्होंने देश में भालुओं को बचाने और इस प्रथा को समाप्त कराने में संस्था के काम का हवाला दिया.
यानी जांचकर्ताओं के सामने इस वक्त दो बिल्कुल विपरीत कहानियां हैं. वाइल्डलाइफ एसओएस का कहना है कि यह वन्यजीव अपराधियों के खिलाफ खुफिया जानकारी जुटाने का काम था. जांच एजेंसियां यह पता लगा रही हैं कि क्या डिजिटल और दूसरे सबूत कोई बिल्कुल अलग कहानी बताते हैं.
आगरा में मिलीं 10 खालें और खुलता चला गया जंगल का राज
पूरी कहानी आगरा से शुरू हुई. डॉ. राजौरा के मुताबिक आगरा में हुई कार्रवाई में चार आरोपी गिरफ्तार हुए और 10 तेंदुओं की खालें बरामद हुईं. पहली नजर में यह वन्यजीव तस्करी का एक बड़ा मामला था. लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसने एक बरामदगी को कहीं बड़े अभियान में बदल दिया. डॉ. राजौरा ने एनडीटीवी को बताया कि वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो और उत्तर प्रदेश वन विभाग से चर्चा के बाद मध्यप्रदेश की टीमें तत्काल मौके पर भेजी गईं. उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश की टीमों ने मिलकर जांच शुरू की. आरोपियों से मिली जानकारी को जांच में मिले डिजिटल सबूतों से मिलाया गया.
और फिर रास्ता सीधे मध्यप्रदेश की तरफ मुड़ा. वह भी किसी सामान्य जंगल की तरफ नहीं. जांच पहुंच गई चीता परिदृश्य में. वन विभाग के आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक जांच में कुल 10 तेंदुओं के शिकार की पुष्टि हुई. इनमें 6 कूनो वन्यजीव वनमंडल, 2 श्योपुर वनमंडल और 2 चंबल अभयारण्य, मुरैना वनमंडल में मारे गए थे.
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए शिवपुरी, कूनो, मुरैना और चीता परिदृश्य में आने वाले दूसरे वन क्षेत्रों को मिलाकर बड़ा खुफिया तंत्र सक्रिय किया गया. गिरफ्तार आरोपियों ने जांचकर्ताओं को बताया कि उन्होंने फंदे कहां लगाए थे और जानवरों को किस तरीके से पकड़ा था. लेकिन आरोपियों की बातचीत खंगालते हुए जांचकर्ताओं की नजर बार-बार एक शब्द पर पड़ी. 'चीता'.
बातचीत में बार-बार 'चीता', लेकिन क्या शिकारी चीते और तेंदुए में फर्क जानते थे?
जांचकर्ताओं के लिए यह शब्द बेहद चिंताजनक था. आरोपी उसी इलाके में सक्रिय थे जहां भारत ने सात दशक से अधिक समय बाद चीते को दोबारा बसाया है. सूत्रों का दावा है कि ये शिकारी तेंदुए और चीते के बीच ठीक से फर्क तक नहीं कर पाते थे. अगर ऐसा है तो जंगल में छिपाए गए ये भारी लोहे के फंदे सिर्फ तेंदुओं के लिए खतरा नहीं थे. फंदा यह नहीं पहचानता कि उसमें पैर रखने वाला जानवर कौन है. तेंदुआ आता तो तेंदुआ फंसता. बाघ आता तो बाघ फंस सकता था. और चीता उस रास्ते से गुजरता तो वह भी उसी मौत के जाल में फंस सकता था.
एसटीएसएफ के आधिकारिक बयान में तीन लोहे के पांव-जकड़ फंदों की बरामदगी की पुष्टि की गई है. साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि शिकार का इलाका चीता परिदृश्य का हिस्सा है.
प्रतिबंधित फंदे मध्यप्रदेश पहुंचे कहां से?
जांच में अगला बड़ा सवाल था. इतने भारी और प्रतिबंधित फंदे आए कहां से? डॉ. राजौरा के मुताबिक मध्यप्रदेश में करीब एक दशक से इस तरह की घटना सामने नहीं आई थी. इस सवाल का जवाब तब मिलना शुरू हुआ जब गिरफ्तार आरोपी जांच टीम को वापस जंगल में उन जगहों पर ले गए जहां फंदे छिपाए गए थे. उन्होंने एनडीटीवी से कहा कि आरोपियों की निशानदेही पर फंदे बरामद किए गए. शुरुआती जांच में इनकी आपूर्ति का सिरा मध्यप्रदेश के बाहर हरियाणा से जुड़ता दिखाई दिया.
अब जांचकर्ता यह पता लगा रहे हैं कि इन फंदों को किसने बनाया या उपलब्ध कराया, ये हरियाणा से मध्यप्रदेश तक कैसे पहुंचे और क्या इनके पीछे कोई संगठित अंतरराज्यीय आपूर्ति तंत्र काम कर रहा था. यानी जांच अब केवल उस आदमी तक सीमित नहीं है जिसने जंगल में फंदा लगाया. अब सवाल है कि फंदा किसने दिया, शिकार किसके कहने पर हुआ, जानवर के अंग किसने संभाले और आखिर उनका खरीदार कौन था.

शिकार का तरीका: जंगल में बिछाया गया मौत का जाल
पूछताछ और एसटीएसएफ की कार्रवाई से शिकार के जिन कथित तरीकों की जानकारी सामने आई है, वे बेहद खौफनाक हैं. यह सिर्फ बंदूक लेकर जंगल में घुसने वाले शिकारियों की कहानी नहीं थी. जांचकर्ताओं के मुताबिक इसमें लोहे के छिपे हुए फंदे, जहर, देसी भरमार बंदूकें और जानवर को मारने के बाद उसके शरीर के अलग-अलग अंगों को व्यवस्थित तरीके से निकालना शामिल था.
श्योपुर और मुरैना के जंगलों से भारी लोहे के पांव-जकड़ फंदे और कसने वाले शिकंजे बरामद किए गए. इन्हें कथित तौर पर उन रास्तों पर छिपाया जाता था जहां जंगली जानवर पानी या शिकार की तलाश में नियमित रूप से आते-जाते थे. जानवर का पैर पड़ते ही लोहे के जबड़े बंद हो जाते और उसका पैर उनमें जकड़ जाता. इसके बाद बच निकलना बेहद मुश्किल था.
पूछताछ में सामने आई जानकारी के मुताबिक तेंदुए और बाघ जैसे बड़े जानवरों को मारने के लिए कथित तौर पर जहर का भी इस्तेमाल किया जाता था. जहर पानी के स्रोतों में डालने या मवेशियों के शव पर लगाने की बात सामने आई है ताकि बड़े मांसाहारी जानवर उसे खाएं. कुछ मामलों में देसी भरमार बंदूकों के इस्तेमाल की जानकारी भी जांचकर्ताओं को मिली है. लेकिन जानवर की मौत के साथ यह काम खत्म नहीं होता था.
जांचकर्ताओं के मुताबिक मृत जानवर की खाल बेहद सावधानी से निकाली और सुखाई जाती थी. हड्डियां, दांत और पंजे अलग किए जाते और फिर उन्हें बाजार में बेचने के लिए अलग-अलग छिपा दिया जाता था. यानी हर अंग की अपनी कीमत थी.
पहले भी हड्डियों ने खोला था बाघ के शिकार का राज
मौजूदा जांच इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि शिवपुरी का जंगल पहले भी वन्यजीव तस्करों के निशाने पर आ चुका है. एक पुराने मामले में शिवपुरी के पडोरा चौराहे के पास पकड़े गए आरोपियों के पास से बड़ी मात्रा में जानवरों की हड्डियां मिली थीं. शुरुआत में आरोपियों ने जांच को भटकाने की कोशिश की. उन्होंने दावा किया कि हड्डियां तेंदुए और लकड़बग्घे की हैं. लेकिन हड्डियां वैज्ञानिक जांच के लिए भेजी गईं. देहरादून प्रयोगशाला की डीएनए रिपोर्ट आई तो कहानी पलट गई. हड्डियां तेंदुए या लकड़बग्घे की नहीं थीं. वे बाघ की हड्डियां थीं.
इसके बाद आरोपियों से दूसरे दौर की पूछताछ हुई. जांचकर्ताओं के मुताबिक एक आरोपी ने स्वीकार किया कि राजस्थान-मध्यप्रदेश गलियारे और शिवपुरी क्षेत्र में बाघ को जहर देकर मारा गया था. मौजूदा कूनो-श्योपुर-मुरैना जांच के बीच वह पुराना मामला अब फिर महत्वपूर्ण हो गया है.
सवाल है. क्या ये अलग-अलग शिकार की घटनाएं हैं या इनके पीछे बड़े वन्यजीवों को मारने, उनके अंग निकालने और उन्हें अंतरराज्यीय बाजार तक पहुंचाने वाला कोई गहरा नेटवर्क मौजूद है? और फिर जांच वाइल्डलाइफ एसओएस तक पहुंच गई. आरोपियों से पूछताछ और उनके डिजिटल संपर्कों की जांच के दौरान मामले ने सबसे अप्रत्याशित मोड़ लिया. डॉ. राजौरा के मुताबिक गिरफ्तार लोगों और वाइल्डलाइफ एसओएस के बीच संपर्क सामने आए.
11 अगस्त को मध्यप्रदेश एसटीएसएफ और केंद्र सरकार के वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो की संयुक्त टीम ने वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर दिल्ली से एक आरोपी को गिरफ्तार किया. इसके दो दिन बाद, 13 अगस्त को उत्तम नगर, नई दिल्ली निवासी वसीम अकरम, पिता नसीम अहमद को गिरफ्तार किया.
अब एजेंसी यह जानना चाहती है कि इस पूरे नेटवर्क में और कौन-कौन शामिल था, इतनी गोपनीयता से यह कथित अभियान क्यों चल रहा था और सबसे महत्वपूर्ण, देश के सबसे संवेदनशील चीता परिदृश्य में आखिर यह सब क्यों हो रहा था?
सबसे गंभीर आरोप: क्या शिकार-रोधी सफलता का कृत्रिम चित्र बनाया जा रहा था?
जांच से जुड़े वन विभाग के सूत्र इससे भी ज्यादा सनसनीखेज आरोप लगा रहे हैं. सूत्रों का आरोप है कि मध्यप्रदेश में संस्था की पहुंच और गतिविधियों पर कुछ समय से दबाव या प्रतिबंध की स्थिति के कारण शिकार-रोधी सफलताएं दिखाने की जरूरत पैदा हुई हो सकती है, जिससे संस्था की छवि मजबूत हो और संभावित तौर पर विदेशी धन जुटाने में मदद मिले.
सूत्रों ने यहां तक आरोप लगाया है कि इस उद्देश्य से वन्यजीवों के शिकार का सिलसिला करीब एक साल से चल रहा हो सकता है. वाइल्डलाइफ एसओएस इन आरोपों की बुनियाद को ही खारिज करता है. संस्था का कहना है कि वन्यजीव अपराधियों के नेटवर्क में घुसकर जानकारी हासिल करने के लिए मुखबिरों और ऐसे लोगों से संपर्क रखना पड़ता है जिनकी पहुंच शिकारियों तक हो.
संस्था ने सवाल उठाया है कि यदि ऐसे मुखबिरों और शिकार-रोधी कर्मियों को ही आरोपी मान लिया गया तो भविष्य में वन्यजीव अपराध की सूचना देने के लिए कौन आगे आएगा.
मध्यप्रदेश वन विभाग से वाइल्डलाइफ एसओएस का पुराना रिश्ता
इस कहानी को संवेदनशील बनाने वाली एक और बात है. वाइल्डलाइफ एसओएस का मध्यप्रदेश वन विभाग के साथ पहले से संबंध रहा है. संस्था ने भोपाल के वन विहार में भी काम किया है. ऐसे में सवाल उठा कि क्या वन विभाग का कोई अधिकारी या कर्मचारी भी संदेह के घेरे में है?
डॉ. राजौरा ने इस संभावना को मौजूदा मामले से स्पष्ट रूप से अलग किया. उन्होंने कहा कि वन विहार के साथ वाइल्डलाइफ एसओएस का समझौता कलंदर समुदाय से छुड़ाए गए भालुओं से संबंधित था. उन्होंने स्पष्ट किया कि वन विहार और वहां के कर्मचारियों का इस मामले से कोई संबंध नहीं है.
आखिर भगवान 'सलीम' क्यों बना?
दस मरे हुए तेंदुए. चीता परिदृश्य में छिपे लोहे के फंदे. हरियाणा से जुड़ती उनकी कथित आपूर्ति. डिजिटल सबूत. दिल्ली तक पहुंचती गिरफ्तारियां. और वाइल्डलाइफ एसओएस से जुड़े संपर्क. इन तमाम कड़ियों के बीच जांच फिर उसी आदमी पर लौटती है जिससे यह कहानी शुरू हुई थी. भगवान सिंह. और उसकी दूसरी पहचान 'सलीम'. वन विभाग के सूत्रों का आरोप है कि भगवान को जानबूझकर 'सलीम' के रूप में तैयार किया गया और जरूरत पड़ने पर उसकी इस पहचान का इस्तेमाल मामले को सांप्रदायिक रंग देने के लिए किया जा सकता था.
आगरा की सड़क पर मिली 10 तेंदुओं की खालों से शुरू हुई यह जांच अब कूनो के जंगल, हरियाणा के कथित फंदा आपूर्तिकर्ताओं, दिल्ली और देश की एक जानी-मानी वन्यजीव संरक्षण संस्था तक पहुंच चुकी है. लेकिन इस पूरी कहानी की शायद सबसे छोटी और सबसे बड़ी पहेली अभी बाकी है. भगवान आखिर 'सलीम' क्यों बना?
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