नोआखाली से संसद तक 15 अगस्त 1947 को गांधी, नेहरू, जिन्ना और फैज क्या कर रहे थे?
जब गांधी जी दिल्ली लौटे, तो उन्हें पता चला कि उनकी शिष्या सुभद्रा जोशी दिल्ली के किंग्सवे अस्पताल में भर्ती हैं. गांधी जी उनसे मिलने गए. उन्होंने सुभद्रा से पूछा कि सांप्रदायिक हिंसा में दिल्ली में कितने निर्दोष लोगों की जान गई?
20 फरवरी 1947 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने घोषणा की कि अंग्रेज भारत छोड़ देंगे. 3 जून को, वायसराय लॉर्ड लुइस माउंटबेटन ने अगले 72 दिनों में सत्ता हस्तांतरण की योजना जारी की. इस काम में उपमहाद्वीप का बंटवारा, उसकी सेना, सिविल सेवा, रेलवे, पुलिस और डाक प्रणाली का बंटवारा, और यहां तक की ऑफिस इक्विपमेंट आदि तक की संपत्ति का उचित हिस्सा तय करना शामिल था. माउंटबेटन की मेज पर एक टियर-ऑफ कैलेंडर था, जो दिखाता था कि काम पूरा होने में कितने दिन बचे हैं.
आजादी का उत्साह और खाली लिफाफा
15 अगस्त 1947 को, देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने आधी रात को संसद में एक प्रभावशाली भाषण दिया, जिसमें कहा गया, "बहुत पहले हमने नियति के साथ एक वादा किया था, और अब वह समय आ गया है जब हम अपना वादा पूरा करेंगे..." ऐतिहासिक भाषण के कुछ मिनटों बाद, नेहरू स्वतंत्र भारत के गवर्नर-जनरल बनने के लिए माउंटबेटन को औपचारिक रूप से आमंत्रित करने के लिए वायसराय पैलेस (अब राष्ट्रपति भवन) पहुंचे, और उन्हें एक लिफाफा सौंपा जिसमें माना जाता था कि उनके मंत्रिपरिषद के नाम थे. शायद आजादी के उत्साह में, किसी ने बिना सूची अंदर रखे ही लिफाफा सील कर दिया था.
माउंटबेटन के लिए एक 'अशुभ' दिन
कुछ ज्योतिषियों ने 15 अगस्त, 1947 को अशुभ माना था, लेकिन माउंटबेटन के लिए यह एक बहुत खास दिन था. 1945 में जापानी सेना ने टोक्यो में सरेंडर किया था, जहां माउंटबेटन 'एलाइड सुप्रीम कमांडर' के तौर पर काम कर रहे थे. 15 अगस्त, 1945 को 'विक्ट्री ओवर जापान' (V-J) डे के तौर पर याद किया जाता है.
सीमा के दूसरी तरफ, 14 अगस्त को पाकिस्तान बना. यह रमजान के महीने का 26वां दिन था. उसी दिन मोहम्मद अली जिन्ना ने लॉर्ड माउंटबेटन के लिए लंच रखा था, जबकि नए बने इस्लामिक देश में बहुत से लोग रोजा रख रहे थे. दिलचस्प बात यह है कि पाकिस्तान को 15 अगस्त को अस्तित्व में आना चाहिए था. ब्रिटिश संसद में 18 जुलाई, 1947 को पास हुए 'इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट' में लिखा है, "15 अगस्त, 1947 से भारत में दो आजाद डोमिनियन (राज्य) बनाए जाएंगे, जिन्हें क्रमशः भारत और पाकिस्तान के नाम से जाना जाएगा." इस तरह, कानूनी तौर पर पाकिस्तान को 15 अगस्त, 1947 को अस्तित्व में आना चाहिए था. लेकिन 14 अगस्त आधिकारिक तारीख बन गई, क्योंकि माउंटबेटन को कराची से नई दिल्ली जाना था.
गांधी जी की अजीब तरकीब
आजादी के समय, महात्मा गांधी बंगाल के नोआखाली जिले में दंगों के कारण बने तनावपूर्ण माहौल में नंगे पैर एक गांव से दूसरे गांव जा रहे थे और लोगों को दूसरों की जान न लेने का संकल्प दिला रहे थे. वे अपने साथ धार्मिक किताबें रखते थे और हिंदुओं व मुसलमानों से शांति बनाए रखने की अपील करते थे. एक गांव में एक दिल को छू लेने वाली घटना हुई, जहां गांधी ने स्थानीय हिंदुओं और मुसलमानों से शांति के लिए एक साथ प्रार्थना और संकल्प लेने के लिए अपनी झोपड़ियों से बाहर आने को कहा. लेकिन कोई नहीं आया. गांधी ने आधे घंटे तक इंतजार किया, पर कोई नहीं आया. फिर उन्हें एक अनोखा विचार आया. वे गेंद लिए हुए कुछ लड़कों के पास गए और बोले, "इस गांव के नन्हे बच्चों, तुम्हारे माता-पिता एक-दूसरे से डरे हुए हैं, लेकिन तुम्हें किस बात का डर हो सकता है? बूढ़े हिंदू और मुसलमान शायद एक-दूसरे से डरते हों, लेकिन बच्चे तो मासूम होते हैं. तुम ईश्वर की संतान हो. मैं तुम्हें गेंद का खेल खेलने के लिए बुला रहा हूं." उनके साथ आधे घंटे तक खेलने के बाद, गांधी ने गांव वालों से कहा, "तुममें हिम्मत नहीं है, लेकिन अगर तुम वह हिम्मत चाहते हो, तो उसे अपने बच्चों से सीखो."
किंग्सवे अस्पताल का दौरा
जब गांधी जी दिल्ली लौटे, तो उन्हें पता चला कि उनकी शिष्या सुभद्रा जोशी दिल्ली के किंग्सवे अस्पताल में भर्ती हैं. गांधी जी उनसे मिलने गए. उन्होंने सुभद्रा से पूछा कि सांप्रदायिक हिंसा में दिल्ली में कितने निर्दोष लोगों की जान गई? जब सुभद्रा ने अनुमान लगाया कि यह संख्या एक हजार से अधिक हो सकती है, तो गांधी जी ने पूछा कि क्या इसमें कुछ कांग्रेसी शांति कार्यकर्ता भी शामिल हैं. सुभद्रा ने याद किया कि उनका जवाब 'कोई नहीं' सुनकर गांधी जी निराश हो गए. उन्हें आश्चर्य हुआ कि फिर वे कैसे मान सकते हैं कि उन्होंने और अन्य कांग्रेसी शांति कार्यकर्ताओं ने निर्दोष लोगों की जान बचाने की कोशिश की थी. सुभद्रा ने कहा, "जब मैंने कहा कि हमने हिंसा रोकने की कोशिश की, लेकिन पुलिस ने हमारी बात नहीं सुनी, तो गांधी जी ने पलटकर कहा, 'यह मैं क्या सुन रहा हूं! तुमने अंग्रेजों की गोलियों का सामना किया और अब तुम कहती हो कि तुम अपनी ही पुलिस को संभाल नहीं सकती?'"
सिविल सेवक और लेखक एस.एस. गिल ने अपनी पुस्तक 'द डायनेस्टी - ए पॉलिटिकल बायोग्राफी ऑफ द प्रीमियर रूलिंग फैमिली ऑफ मॉडर्न इंडिया' (हार्परकॉलिन्स) में 15 अगस्त, 1947 को 'धुंधली सुबह' के रूप में वर्णित किया है.
कवि फैज अहमद फैज 15 अगस्त, 1947 को श्रीनगर में थे. उन्होंने 'सुब्ह-ए-आजादी' (स्वतंत्रता का सवेरा) शीर्षक से कविता लिखी.
ये दाग उजाला, ये शब गज़ीदा सहर
वो इंतज़ार था जिसका ये सहर तो नहीं
ये वो सहर तो नहीं, जिसकी आरज़ू ले कर
चले थे यार के मिल जाए गी कहीं ना कहीं
फ़लक के दश्त में तारों की आखिरी मंजिल
कहीं तो होगा शब-ए सुस्त मौज का साहिल
कहीं तो जा के रुके गा सफ़ीना-ए ग़म-ए दिल.
(यह मलिन, दागदार प्रकाश, यह रात की धुंधली सुबह,
जिसका हम इंतज़ार कर रहे थे, यह वह सुबह नहीं है.
यह वह सुबह नहीं है, जिसकी लालसा में,
हम इस उम्मीद से निकले थे कि हम ज़रूर पाएंगे,
आकाश के निर्जन वीरान इलाके में, तारों का अंतिम गंतव्य,
कहीं न कहीं रात की थकी लहरें अपना किनारा पाएंगी,
कोई न कोई जगह हमारे दिल के दुखों की नाव का अंतिम पड़ाव होगी.)
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