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देश में खत्म हुए नक्सली ! पूरे अभियान में नायक रहे IG सुंदरराज ने कहा- बंदूक से नहीं, भरोसे से जीती जंग

Naxalism Ends in Bastar: नक्सलवाद के खात्मे की 31 मार्च की तय समयसीमा पर बस्तर के आईजी सुंदरराज पी ने एनडीटीवी से खास बातचीत में बड़ा दावा किया है. उन्होंने कहा कि अब बस्तर से नक्सलवाद पूरी तरह खत्म हो चुका है. जानिए एक कृषक परिवार से निकलकर बस्तर की फिजा बदलने वाले इस जांबाज पुलिस अफसर के सफर, उनकी रणनीति और वर्दी के पीछे कैनवास पर सुकून ढूंढने वाले कलाकार की पूरी अनकही कहानी.

देश में खत्म हुए नक्सली ! पूरे अभियान में नायक रहे IG सुंदरराज ने कहा- बंदूक से नहीं, भरोसे से जीती जंग
  • नक्सलवाद खत्म करने की निर्धारित समयसीमा 31 मार्च के करीब आ चुकी है और बस्तर में शांति की स्थिति बन रही है
  • आईजी सुंदरराज पी ने तमिलनाडु के कृषक परिवार से उठकर नक्सल प्रभावित इलाकों में पुलिसिंग करियर समर्पित किया है
  • नक्सलवाद से निपटने के लिए पुलिस की रणनीति रिएक्टिव से प्रोएक्टिव मोड में बदली है
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Bastar IG Sundarraj P Interview: नक्सलवाद के खात्मे के लिए देश ने 31 मार्च की जो समयसीमा तय की थी, वह तारीख अब इतिहास के पन्नों में दर्ज होने के बेहद करीब है. इस ऐतिहासिक पड़ाव पर बस्तर एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां से पीछे मुड़कर देखना सिर्फ हिंसा की यादें दिलाता है और आगे का रास्ता शांति और विकास की ओर जाता है. बस्तर में आए इस अभूतपूर्व और युगांतकारी बदलाव के केंद्र में एक ऐसा चेहरा है, जिसकी यात्रा इस पूरे संघर्ष की जटिलता और उसे खत्म करने के फौलादी धैर्य दोनों को बखूबी दर्शाती है. यह चेहरा है बस्तर के आईजी सुंदरराज पी का, जिन्होंने बंदूक की गूंज वाले इस इलाके में शांति का कैनवास तैयार करने के लिए अपना पूरा करियर समर्पित कर दिया.

खेती की पृष्ठभूमि से लेकर बंदूक की चुनौती तक

एनडीटीवी से खास बातचीत के दौरान सुंदरराज पी अपने सफर की शुरुआत को याद करते हुए तमिलनाडु के कोयंबटूर का जिक्र करते हैं. वह बताते हैं कि वह एक सामान्य कृषक परिवार से आते हैं और आज भी उनके परिवार के ज्यादातर लोग खेती-किसानी के काम से ही जुड़े हुए हैं. इसी ग्रामीण पृष्ठभूमि के चलते उन्होंने तमिलनाडु एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी से कृषि विज्ञान की पढ़ाई पूरी की. इसके बाद उन्होंने देश की सबसे कठिन मानी जाने वाली सिविल सेवा की तैयारी शुरू की और साल 2003 में अपने पहले ही प्रयास में यूपीएससी की परीक्षा पास कर ली. उन्हें छत्तीसगढ़ कैडर अलॉट हुआ और इत्तेफाक देखिए कि तभी से उनका पूरा पुलिसिंग करियर सिर्फ और सिर्फ नक्सल प्रभावित इलाकों में ही बीता है.

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खौफ के दौर में संभाली कमान

जब सुंदरराज पी पहली बार बस्तर पहुंचे थे, तब छत्तीसगढ़ राज्य नया-नया बना था और यहां से आने वाली खबरें सिर्फ खून-खराबे, बारूदी सुरंगों और बड़ी नक्सली घटनाओं की ही होती थीं. वह याद करते हुए कहते हैं कि उस समय आज की तरह सोशल मीडिया का दौर नहीं था और हमारी समझ सिर्फ अखबारों और टीवी की खबरों तक ही सीमित थी. लेकिन उन्होंने कभी भी बस्तर की इस खौफनाक छवि को डर के तौर पर नहीं देखा. सुंदरराज बताते हैं कि उनके वरिष्ठ अधिकारियों ने उन्हें हमेशा एक ही सीख दी कि इसे एक बड़ी समस्या के तौर पर मत देखो, बल्कि इसमें समाधान खोजने के अवसर तलाशो.
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संवेदनशीलता और सख्ती का बेजोड़ संतुलन

वरिष्ठों से मिली यही सीख आगे चलकर आईजी सुंदरराज के काम करने के तरीके की सबसे बड़ी पहचान बन गई. पुलिस महकमे और जनता के बीच एक बेहद शांत और 'सॉफ्ट-स्पोकन' अधिकारी के रूप में पहचाने जाने वाले सुंदरराज का मानना है कि बस्तर जैसे इलाके में पुलिसिंग सिर्फ और सिर्फ बल प्रयोग या बंदूक के दम पर कतई नहीं की जा सकती. इसके लिए जनता के बीच जाकर विश्वास की बहाली करना, स्थानीय लोगों की भावनाओं को समझना और साथ ही जरूरत पड़ने पर देश के दुश्मनों के खिलाफ बेहद सख्त और निर्णायक कार्रवाई करना बेहद जरूरी है.

परिवार का त्याग और टीम का अटूट भरोसा

बस्तर जैसे अति-संवेदनशील और युद्ध जैसे हालात वाले क्षेत्र में इतना लंबा कार्यकाल बिताना उनके परिवार के लिए भी कभी आसान नहीं रहा. लेकिन सुंदरराज पी इस बात को पूरी विनम्रता से स्वीकार करते हैं कि उनके परिवार, उनकी जांबाज टीम, जिला प्रशासन, स्थानीय जनता, मीडिया जगत और जनप्रतिनिधियों के सामूहिक सहयोग ने ही इस बेहद कठिन मिशन को लगातार आगे बढ़ाया है और सफलता के इस मुकाम तक पहुंचाया है.

रणनीति में बड़ा बदलाव: रिएक्टिव से प्रोएक्टिव मोड

वह खुलकर स्वीकार करते हैं कि शुरुआती दौर में नक्सलवाद से निपटने में सबसे बड़ी चुनौती पर्याप्त आधुनिक संसाधनों की कमी और क्षेत्र की भौगोलिक विशालता थी. वह इसे सुरक्षा बलों की गलती नहीं मानते, बल्कि एक बड़ी चुनौती कहते हैं. समय के साथ पुलिस की रणनीति पूरी तरह बदल गई. अब पुलिस सिर्फ नक्सली हमले के बाद रिएक्टिव ऑपरेशन करने तक सीमित नहीं रही, बल्कि लगातार जंगलों के अंदरूनी इलाकों में अपनी मौजूदगी बढ़ाकर नक्सलियों को बैकफुट पर धकेलने का काम किया गया.

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स्थानीय युवाओं की भागीदारी बनी सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट

बस्तर में सलवा जुडूम के दौर से लेकर डीआरजी (डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड), बस्तर फाइटर्स और बस्तरिया बटालियन के गठन तक, पूरा सिक्योरिटी मॉडल जड़ से बदल गया. इसमें सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट स्थानीय आदिवासी युवाओं की पुलिस में बड़े पैमाने पर भागीदारी साबित हुई. इन स्थानीय युवाओं को अपनी भाषा, बस्तर के बीहड़ भूगोल और नक्सलियों के काम करने के तौर-तरीकों की गहरी समझ थी, जिसने सुरक्षा बलों को नक्सलियों पर भारी बढ़त दिला दी.
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इंटेलिजेंस और लोकल कनेक्ट की ताकत

आईजी सुंदरराज कहते हैं कि सटीक इंटेलिजेंस और जनता के साथ लोकल कनेक्ट ही हमारी सबसे बड़ी ताकत रही है. उनके नेतृत्व में चलाए गए ऑपरेशन सिर्फ मुठभेड़ों तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि भटक चुके नक्सलियों को समाज की मुख्यधारा में लौटने का एक सम्मानजनक विकल्प भी दिया गया. सुरक्षा बलों के लगातार बढ़ते दबाव का ही नतीजा था कि बड़ी संख्या में सरेंडर हुए, गिरफ्तारियां हुईं और नक्सली नेटवर्क बेहद सीमित इलाकों में सिमट कर रह गया.

सप्लाई लाइन कटी और कमजोर हुआ शीर्ष नेतृत्व

वह बताते हैं कि बस्तर की फिजा में असली बदलाव तब महसूस होना शुरू हुआ जब सुरक्षा बलों ने घने अंदरूनी इलाकों में नए कैंप स्थापित किए. इससे नक्सलियों की सप्लाई लाइन पूरी तरह कट गई.

एक समय था जब बस्तर का भूगोल कई यूरोपीय देशों से भी ज्यादा कठिन और रहस्यमयी माना जाता था. लेकिन छत्तीसगढ़ बनने के बाद पुलिस की केंद्रित कोशिशों, बेहतर जवानों की तैनाती और कांकेर से लेकर मिजोरम तक मिले विशेष प्रशिक्षण ने हालात को पूरी तरह से पलट कर रख दिया.

बड़े सरेंडर और ढहता हुआ नक्सली साम्राज्य

डीआरजी, बस्तर फाइटर्स और बस्तरिया बटालियन जैसी स्थानीय इकाइयों ने इस पूरी जंग को एक नई दिशा देने का काम किया. सुंदरराज पी के नेतृत्व में कई ऐसे बड़े और सफल ऑपरेशन हुए, जिनसे नक्सलियों का शीर्ष नेतृत्व पूरी तरह से कमजोर हो गया. कई बड़े कमांडर या तो मारे गए या फिर उन्हें सरेंडर करने पर मजबूर होना पड़ा. हाल ही में दंडकारण्य क्षेत्र के अंतिम बड़े और खूंखार नक्सली नेता पापाराव का सरेंडर करना इस बड़े बदलाव का सबसे बड़ा और ताजा प्रमाण माना जा रहा है.

आंकड़ों से परे शहीदों के बलिदान की कसम

इस लंबे और खूनी संघर्ष की मानवीय कीमत भी दोनों तरफ से बहुत बड़ी रही है. साल 2000 में छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के बाद से अब तक 2000 से ज्यादा बेकसूर नागरिक और 1500 से ज्यादा देश के वीर जवान इस जंग में अपनी शहादत दे चुके हैं. आईजी सुंदरराज बेहद भावुक होकर कहते हैं कि ये हमारे लिए सिर्फ कागजी आंकड़े नहीं हैं. यही वो शहादतें हैं, जो इस समस्या को जड़ से मिटाने के लिए हमारी प्रतिबद्धता और जिद की सबसे बड़ी वजह बनी हुई हैं.

बंदूक के समानांतर चलता विकास का पहिया

वह बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि यह लड़ाई कभी भी सिर्फ बंदूक और गोलियों की नहीं रही. हमने हमेशा भटके हुए लोगों को हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौटने का पूरा मौका और विकल्प दिया. कई लोग इस अपील को समझकर वापस भी आए, लेकिन जो लोग इसके बाद भी नहीं सुधरे, उनके खिलाफ कानून ने बेहद सख्त और निर्णायक कार्रवाई की.

स्कूल और अस्पताल में तब्दील होते पुलिस कैंप

जिन गांवों पर कभी बंदूकधारी नक्सलियों का पूरी तरह से खूनी नियंत्रण हुआ करता था, वहां के आदिवासियों का भरोसा वापस जीतने के लिए सुरक्षा के साथ-साथ विकास को भी समानांतर तौर पर लेकर चलना पड़ा.

सुंदरराज पी का मानना है कि सिर्फ बंदूक और सुरक्षा बलों के पहरे से काम नहीं चल सकता था, आदिवासियों के लिए पक्की सड़क, अच्छे स्कूल और अस्पताल भी उतने ही जरूरी हैं.

आज बस्तर में कई पुराने सुरक्षा कैंपों का स्कूलों और अस्पतालों में बदल जाना ही इस ऐतिहासिक बदलाव का सबसे बड़ा और जीवंत प्रतीक है.

वर्दी के पीछे का कलाकार और कैनवास का सुकून

लेकिन इस कड़क वर्दी, कठिन ऑपरेशनों और खूनी संघर्ष के बीच आईजी सुंदरराज पी की एक और बेहद शांत और खूबसूरत दुनिया भी समानांतर चलती है. वह खाली समय में पेंटिंग ब्रश उठाकर कैनवास पर रंग बिखेरते हैं. वह मुस्कुराते हुए बताते हैं कि उनकी पत्नी और बेटियां बहुत अच्छी पेंटिंग करती हैं और उन्हीं को देखकर वह भी फुर्सत के पलों में थोड़ी बहुत पेंटिंग करने की कोशिश करते हैं.

संतुलन जो पुलिस अफसर को इंसान बनाए रखता है

बस्तर जैसे देश के सबसे बड़े और तनावपूर्ण संघर्ष क्षेत्र के बीच घिरे रहकर भी वह कैनवास और रंगों पर अपनी जिंदगी का सुकून ढूंढ लेते हैं. उनके लिए पेंटिंग करना सिर्फ एक शौक या टाइमपास भर नहीं है, बल्कि यह खुद से अंदरूनी तौर पर जुड़ने का एक बेहद खूबसूरत जरिया है. यही वो मानसिक संतुलन है, जो एक बेहद कड़क पुलिस अधिकारी को भीतर से एक संवेदनशील इंसान भी बनाए रखता है.

फिल्म 'धुरंधर' और मानवीय पहलू

वह अनौपचारिक बातचीत में हाल ही में देखी गई फिल्म 'धुरंधर' को भी बड़े चाव से याद करते हैं. यह सुनने में भले ही एक बेहद छोटी सी बात लगे, लेकिन यह एक इतने बड़े और जिम्मेदार पुलिस अधिकारी के सहज मानवीय पक्ष को जनता के सामने लाती है कि वह भी एक आम इंसान की तरह सिनेमा और कला से लगाव रखते हैं. अगर आईजी सुंदरराज पी की इस पूरी ऐतिहासिक यात्रा और बस्तर के इस अभूतपूर्व बदलाव को सिर्फ एक छोटी सी लाइन में समेटना हो, तो शायद वह लाइन यही होगी कि देश की यह सबसे बड़ी और कठिन आंतरिक लड़ाई सिर्फ आधुनिक हथियारों के दम पर नहीं जीती गई है, बल्कि यह अटूट धैर्य, स्थानीय लोगों के अटूट विश्वास और एक सच्चे पवित्र उद्देश्य के बल पर जीती गई है.
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