Inspirational Sports Success Story: मध्यप्रदेश के बड़वानी जिले के छोटे से गांव मोरदड़ के दिव्यांग क्रिकेटर लोकेंद्र आर्य ने अपनी मेहनत और हौसले से यह साबित कर दिया कि शारीरिक कमजोरी सफलता की राह में बाधा नहीं बन सकती. दिव्यांग क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ऑफ इंडिया द्वारा आयोजित होने वाले केसरी दिव्यांग टूर्नामेंट 2026 के लिए लोकेंद्र का चयन इंडिया ए टीम में हुआ है. यह टूर्नामेंट 13 से 15 जून तक हरियाणा के यमुनानगर में खेला जाएगा. किसान परिवार से आने वाले लोकेंद्र जन्म से ही एक पैर से दिव्यांग हैं, लेकिन उन्होंने कभी इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया. उनके चयन से न केवल परिवार, बल्कि पूरे गांव और क्षेत्र में खुशी का माहौल है.
मोरदड़ गांव से राष्ट्रीय स्तर तक का सफर
लोकेंद्र आर्य बड़वानी जिले के मोरदड़ गांव के निवासी हैं. एक साधारण किसान परिवार में जन्मे लोकेंद्र ने सीमित संसाधनों के बावजूद अपने खेल को निखारा और आज राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने में सफलता हासिल की. उनकी इस उपलब्धि से गांव और आसपास के क्षेत्रों में गर्व का माहौल है.

Inspirational Sports Success Story: लोकेंद्र आर्य
जन्म से दिव्यांग, लेकिन हौसले बुलंद
26 वर्षीय लोकेंद्र आर्य जन्म से ही एक पैर से दिव्यांग हैं. इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और बचपन से क्रिकेट के प्रति अपने जुनून को बनाए रखा. उन्होंने अपनी दिव्यांगता को कभी बाधा नहीं बनने दिया और लगातार अभ्यास करते हुए खुद को एक बेहतर खिलाड़ी के रूप में तैयार किया.
इंडिया ए टीम में चयन
दिव्यांग क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ऑफ इंडिया द्वारा 13 से 15 जून तक हरियाणा के यमुनानगर में केसरी दिव्यांग टूर्नामेंट 2026 का आयोजन किया जा रहा है. इस टूर्नामेंट के लिए लोकेंद्र आर्य का चयन इंडिया ए टीम में हुआ है. मध्यप्रदेश से कुल पांच खिलाड़ियों का चयन हुआ है, जिनमें लोकेंद्र भी शामिल हैं.
गांव में खुशी की लहर
लोकेंद्र के चयन की खबर मिलते ही गांव में उत्साह का माहौल बन गया. गांववालों और दोस्तों ने उन्हें फूल-मालाएं पहनाकर और मिठाई खिलाकर स्वागत किया. हर कोई उनकी उपलब्धि पर गर्व महसूस कर रहा है.

Inspirational Sports Success Story: गांव में स्वागत
संघर्ष और मेहनत की कहानी
लोकेंद्र ने बताया कि उन्होंने पद्मश्री कांता विकलांग सेवा ट्रस्ट, झाकर में रहकर अपनी पढ़ाई पूरी की. वहीं रहते हुए उन्होंने साथियों के साथ क्रिकेट खेलना शुरू किया और धीरे-धीरे अपनी बल्लेबाजी को मजबूत बनाया. पिछले चार वर्षों से उन्होंने लगातार अभ्यास किया और कई प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया.
सीमित संसाधनों में भी बनाई पहचान
लोकेंद्र ने अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए बताया कि लेदर बॉल क्रिकेट खेलने के लिए उनके पास पर्याप्त संसाधन नहीं थे. टीम के खिलाड़ियों ने मिलकर पैसे जमा किए, किसी ने 500 रुपये तो किसी ने 200 रुपये दिए और करीब 5 हजार रुपये में पहली क्रिकेट किट खरीदी गई. बल्ले की कमी होने पर उनके मित्र पीयूष जाधव ने बैट उपलब्ध कराया था.

टीमवर्क से मिली ताकत
लोकेंद्र की टीम में सेंधवा, निवाली और बड़वानी के खिलाड़ी शामिल हैं. टीम में बल्लेबाज, गेंदबाज और ऑलराउंडर सभी अपनी-अपनी भूमिका निभाते हैं. प्रैक्टिस के लिए खिलाड़ी अलग-अलग स्थानों से आकर सेंधवा में जुटते हैं, जहां नियमित अभ्यास किया जाता है.
पहले भी कर चुके हैं प्रदर्शन
लोकेंद्र ने राज्य स्तर पर भी शानदार प्रदर्शन किया है. वर्ष 2025 में पुणे में आयोजित प्रतियोगिता में उन्होंने मध्यप्रदेश का प्रतिनिधित्व किया था. उनकी बल्लेबाजी की खासियत बड़े शॉट लगाने की क्षमता है.
बड़ा सपना: टीम इंडिया की नीली जर्सी
लोकेंद्र का सपना भारतीय दिव्यांग क्रिकेट टीम की मुख्य टीम में जगह बनाकर नीली जर्सी में देश का प्रतिनिधित्व करना है. उनका मानना है कि मेहनत और लगन से यह लक्ष्य भी हासिल किया जा सकता है.
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