अल्लामा इक़बाल: कवि, समाज सुधारक और राजनीतिक कार्यकर्ता की शख्सियत

इकबाल की प्राथमिक भाषा पंजाबी थी लेकिन वे अरबी, फारसी, उर्दू और अंग्रेजी भाषाओं में निपुण थे, उन्हें एशिया का सबसे अग्रणी कवि माना जाता है

अल्लामा इक़बाल: कवि, समाज सुधारक और राजनीतिक कार्यकर्ता की शख्सियत

अल्लामा इकबाल (फाइल फोटो).

नई दिल्ली:

सारे जहां से अच्छा, हिन्दोस्तां हमारा, हम बुलबुलें हैं इसकी,ये गुलिस्तां हमारा  -अल्लामा इकबाल

सर अल्लामा मुहम्मद इकबाल (9 नवंबर 1877- 21 अप्रैल 1938) एक कवि, लेखक, दार्शनिक, समाज सुधारक, राजनीतिक कार्यकर्ता और कल्पना से परे शख्सियत थे. हालांकि वह पेशे से वकील थे और उनके 106 मामलों को तारीखी ( landmark) रूप में बताया जाता है, जो आज तक का रिकॉर्ड है. सियालकोट में जन्मे इकबाल की प्रारंभिक शिक्षा मदरसे और बाद में गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर से हुई. उस समय के प्रतिष्ठित विद्वानों, मीर हसन और थॉमस वॉकर अर्नोल्ड का उनके विचारों पर गहरा प्रभाव था उनकी कानून और पीएचडी (दर्शनशास्त्र) की उच्च शिक्षा क्रमशः इंग्लैंड और जर्मनी में हुई. इकबाल को कई विश्वविद्यालयों द्वारा प्रोफेसर के रूप में रखने की पेशकश की गई थी, लेकिन वह ऐसी नौकरियों से मुक्त होने और रचनात्मक लेखन पर ध्यान केंद्रित करना पसंद करते थे.

इकबाल की प्राथमिक भाषा पंजाबी थी लेकिन वे अरबी, फारसी, उर्दू और अंग्रेजी भाषाओं में निपुण थे. उन्हें एशिया का सबसे अग्रणी कवि माना जाता है और उन्हें 'अल्लामा' (विद्वान) कहा जाता है. उनकी कविता में रूमानियत के बजाय विषयों पर एक संदेश देने पर ध्यान केंद्रित किया गया है. उन्होंने भगवान राम, गुरु नानक, महात्मा गांधी, सर सैयद अहमद खान, गालिब, टीपू सुल्तान, हिटलर, मुसोलिनी, आदि सहित अन्य हस्तियों पर लिखा. उनके अन्य विषय देशभक्ति, बच्चे और बचपन, मां, प्रकृति, धर्म, दर्शन, समाज कल्याण, मानव कल्याण रहे.

अल्लामा इकबाल सर सैयद से बहुत प्रभावित थे और दोनों विभूतियों के रिश्तों ने अलीगढ़ मूवमेंट पर गहरा असर डाला था. अल्लामा इकबाल ने तीन बार अलीगढ़ का दौरा किया 9 फरवरी 1911, 18 नवंबर 1929 और 18 दिसंबर 1934. पहली यात्रा में उन्होंने स्ट्रैची हॉल में बहुत महत्वपूर्ण व्याख्यान दिया था. “इकबाल मेडल” की शुरुआत 1912 में हुई थी. इकबाल बरनी (1913) और भारत के तीसरे राष्ट्रपति डॉ ज़ाकिर हुसैन (1919) इस पदक के गौरवशाली विजेता थे. उनकी रचनाएं अलीगढ़ इंस्टीट्यूट गजट और अलीगढ़ मैगज़ीन में 8 मार्च 1911 से 1938 तक प्रमुखता से प्रकाशित हुईं. 


पूरी दुनिया में उनके कलाम को खूब पढ़ा और शोध किया जाता है, लखनऊ से “आतिफ़ हनीफ़” जो की उर्दू अदब और साहित्य से जुड़े हैं, बतातें हैं की उर्दू शेर -शायरी के लिए इक़बाल का कोई सानी नहीं, उनके चाहने वालों ने उनके जन्मदिन को इस कोरोना काल में "वेबिनार, ज़ूम मीटिंग्स या अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के ज़रिये सेलिब्रेट किया.

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खुदी को कर बुलंद इतना की हर तक़दीर से पहले,
खुदा बन्दे से खुदे पूछे बता तेरी रज़ा क्या है.  

-अल्लामा इकबाल