Time Travel: टाइम ट्रैवल को लेकर वैज्ञानिकों ने बहुत खोज की हैं. लेकिन वे अभी तक इस अवधारण को सच में नहीं बदल सके हैं. कई फिल्मों में भी इस कांसेप्ट को यूज किया जाता है और दिखाया जाता है कि चाहे आधुनिक काल में इसे चुनौती माना जाता हो लेकिन इतिहास में लोग टाइम ट्रैवल किया करते थे. पर क्या सच में पुरातन भारतीय काल में ऋषि-मुनि, साधु, महात्मा या भगवान के अवतार समय के आर-पार जा पाते थे?
क्या प्राचीन भारत में टाइम ट्रैवल का वर्णन मिलता है?
टाइम ट्रैवल यानी समय में आगे या पीछे यात्रा करना. इसे Science Fiction का लोकप्रिय विषय माना जाता है. लेकिन क्या हजारों साल पहले हिंदू ग्रंथों में भी ऐसी अवधारणा का उल्लेख मिलता है, इस सवाल का जवाब पूरी तरह हां या ना में देना इतना आसान नहीं है.
हालांकि हिंदू धर्मग्रंथों में कई ऐसी कथाएं मिलती हैं, जिनमें अलग-अलग लोकों में समय के प्रवाह का अंतर दिखाई देता है. और इनका बखूबी वर्णन भी किया गया है. लेकिन इन्हें धार्मिक या प्रतीकात्मक कथाएं माना जाता है, और यही कारण है कि इन कथाओं को वास्तविक वैज्ञानिक टाइम ट्रैवल का प्रमाण नहीं माना जाता.
राजा ककुद्मी और रेवती की कथा
विष्णु पुराण और भागवत पुराण में राजा ककुद्मी (रैवत) और उनकी पुत्री रेवती की कहानी मिलती है. कथा के अनुसार, राजा ककुद्मी अपनी बेटी को साथ लेकर योग्य वर खोजने ब्रह्मलोक पहुंचते हैं. वहां ब्रह्मा जी के दरबार में संगीत कार्यक्रम चल रहा होता है. जब कार्यक्रम समाप्त होता है तो राजा बेटी के विवाह का विषय रखते हैं.
तब ब्रह्मा बताते हैं कि जब तक कार्यक्रम चल रहा होता है, तब तक पृथ्वी पर कई युग बीत चुके हैं और जिन लोगों को राजा जानते थे, वे बहुत पहले समाप्त हो चुके हैं. जब राजा और रेवती पृथ्वी पर लौटते हैं तो पाते हैं कि यहां समय पूरी तरह बदल चुका है.
बाद में रेवती का विवाह भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम से होता है. यह कथा समय के अलग-अलग प्रवाह की अवधारणा को दर्शाती है, जिसे कुछ लोग आधुनिक भौतिकी के टाइम डाइलेशन से जोड़कर देखते हैं.
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महाभारत में समय के अलग प्रवाह के संकेत हैं
महाभारत में कई प्रसंग ऐसे हैं, जहां देवताओं के लोक और पृथ्वी के समय में अंतर का वर्णन मिलता है. अर्जुन जब स्वर्ग लोक जाते हैं, तब वहां समय का अनुभव पृथ्वी से अलग बताया गया है. इन कथाओं का मुख्य उद्देश्य आध्यात्मिक और दार्शनिक संदेश देना है. इसलिए इन्हें आधुनिक अर्थों में टाइम मशीन या समय यात्रा का प्रमाण नहीं माना जाता है.
हिंदू दर्शन में समय की अवधारणा
हिंदू धर्म में समय (काल) को रैखिक (Linear) नहीं बल्कि चक्रीय (Cyclic) माना गया है-
चार युगों का चक्र
मन्वंतर
कल्प
ब्रह्मा का एक दिन और एक रात
इन विशाल समय चक्रों के माध्यम से सृष्टि के निर्माण, संरक्षण और विनाश की व्याख्या की गई है. यह दृष्टिकोण आधुनिक समय मापन से काफी अलग है.
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क्या यह आधुनिक विज्ञान से मेल खाता है?
आधुनिक भौतिकी में अल्बर्ट आइंस्टीन के सापेक्षता सिद्धांत (Theory of Relativity) के अनुसार, अत्यधिक गति या प्रबल गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में समय की गति अलग हो सकती है. इसे टाइम डाइलेशन कहा जाता है.
कुछ लोग हिंदू ग्रंथों की कथाओं और इस वैज्ञानिक सिद्धांत के बीच समानता देखते हैं. लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि धार्मिक कथाओं को आधुनिक वैज्ञानिक सिद्धांतों का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं माना जा सकता.
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