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पहली पत्नी को तलाक दिए बिना मुस्लिम और हिंदू दोनों नहीं कर सकते दूसरी शादी...अगर? 

अमूमन यह माना जाता है कि मुस्लिम अधिकतम चार शादियों की कानूनी अनुमित है, लेकिन अगर कोई मुस्लिम विशेष विवाह अधिनियम 1954 के तहत विवाह कर लेता है, उसके निजी धार्मिक अधिकार निष्प्रभावी हो जाते हैं.

पहली पत्नी को तलाक दिए बिना मुस्लिम और हिंदू दोनों नहीं कर सकते दूसरी शादी...अगर? 
विशेष विवाह अधिनियम 1984
Special Marriage act 1954

Special Marriage Act 1954: भारत में हिंदुओं के लिए एक पत्नी के जीवित रहते अथवा पहली पत्नी को तलाक दिए बिना दूसरी शादी अवैध है और उसे शून्य करार दी जाती है, जबकि मुस्लिमों के लिए अधिकतम चार शादी कानूनन मान्य है, लेकिन विशेष विवाह अधिनियम 1954 के तहत संपन्न हुईं शादियों के लिए हिंदू और मुस्लिम दोनों के लिए समान प्रावधान है, क्योंकि विशेष विवाह अधिनियम के तहत हुई शादी के बाद मुस्लिम युवक की निजी धार्मिक अधिकार निष्प्रभावी हो जाते हैं और ऐसे में वह बिना पहली पत्नी से तलाक दिए बिना दूसरी शादी नहीं कर सकता है.

विशेष विवाह अधिनियम 1954 में एक मुस्लिम और हिंदू दोनों के लिए एक समान प्रावधान है. सामान्यतया मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरिया) एक मुस्लिम पुरुष को चार शादियां करने की अनुमति देता है, लेकिन विशेष विवाह अधिनियम 1954 के तहत विवाह रचाने वाले मुस्लिम युवक भी पहली पत्नी को कानूनी तलाक दिए बिना अब दूसरी शादी नहीं कर सकता है. 

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पहली पत्नी को तलाक दिए बिना मुस्लिम नहीं कर सकता है दूसरी शादी

मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरिया) के मुताबिक एक मुस्लिम को अधिकतम चार शादियों की अनुमति है, लेकिन विशेष विवाह अधिनियम, 1954 (Special Marriage Act, 1954) के तहत संपन्न या पंजीकृत हुई शादी के मामले में मुस्लिम और हिंदू दोनों के एक प्रावधान हैं और दोनों के लिए कानून अधिकार भी समान हो जाते है, दोनों पहली पत्नी को तलाक दिए बिना दूसरी शादी नहीं कर सकते हैं. 

शरिया के तहत मुस्लिम को अधिकतम 4 शादी करने की अनुमति है

गौरतलब है हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत हिंदू व्यक्ति कानूनी रूप से केवल एक ही शादी कर सकता है, अगर वह दूसरी शादी करता है तो दूसरी शादी अवैध मानी जाती है. इसी तरह मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरिया) के तहत मुस्लिम युवक को अधिकतम चार शादी करने की कानूनी अनुमति है. हालांकि यह नियम मुस्लिमों में सिर्फ पुरुषों तक ही सीमित है. 

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विशेष विवाह एक्ट के तहत पहली शादी करने वाला हिंदू हो या मुस्लिम अगर दूसरी शादी करता है तो दूसरी शादी शून्य मानी जाएगी. भारतीय कानून के तहत यह एक दंडनीय अपराध है. इस एक्ट के तहत दूसरी शादी करने से पहले पहली शादी को कानूनी रूप से अंत होना अनिवार्य है, चाहे व्यक्ति का धर्म कुछ भी क्यों न हो.

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एक धर्मनिरपेक्ष (Secular) कानून है विशेष विवाह अधिनियम, 1954

दरअसल, विशेष विवाह अधिनियम 1954 एक धर्मनिरपेक्ष कानून है. कोई मुस्लिम इस कानून के दायरे में शादी पंजीकृत करवाता है, तो उसके व्यक्तिगत धार्मिक कानून (जैसे मुस्लिम पर्सनल लॉ) निष्प्रभावी हो जाते हैं. एक विवाह (Monogamy) की अनिवार्य शर्त वाले इस अधिनियम की धारा 4(a) स्पष्ट रूप से प्रावधान है कि विवाह के समय दोनों पक्षों (वर और वधू) में से किसी का भी कोई जीवित जीवनसाथी (पति या पत्नी) नहीं होना चाहिए.

शादी के बाद निष्प्रभावी हो जाते हैं मुस्लिम के निजी धार्मिक अधिकार

उल्लेखनीय है मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरिया) के तहत एक मुस्लिम युवक को चार शादियां करने की अनुमति है, लेकिन अगर मुस्लिम पुरुष ने अपनी पहली शादी विशेष विवाह अधिनियम के तहत की है, तो पहली पत्नी को कानूनी तलाक दिए बिना वह दूसरी शादी नहीं कर सकता. अगर वह दूसरी शादी करता है तो अधिनियम की धारा 24 के तहत दूसरी शादी कानूनी रूप से अमान्य (शून्य) मानी जाएगी.

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