Special Marriage Act 1954: भारत में हिंदुओं के लिए एक पत्नी के जीवित रहते अथवा पहली पत्नी को तलाक दिए बिना दूसरी शादी अवैध है और उसे शून्य करार दी जाती है, जबकि मुस्लिमों के लिए अधिकतम चार शादी कानूनन मान्य है, लेकिन विशेष विवाह अधिनियम 1954 के तहत संपन्न हुईं शादियों के लिए हिंदू और मुस्लिम दोनों के लिए समान प्रावधान है, क्योंकि विशेष विवाह अधिनियम के तहत हुई शादी के बाद मुस्लिम युवक की निजी धार्मिक अधिकार निष्प्रभावी हो जाते हैं और ऐसे में वह बिना पहली पत्नी से तलाक दिए बिना दूसरी शादी नहीं कर सकता है.
ये भी पढ़ें-शादी के 6 महीने बाद ही छोड़कर गई पत्नी 48 साल बाद वापस लौटी, खुशी से रो पड़ा पति
पहली पत्नी को तलाक दिए बिना मुस्लिम नहीं कर सकता है दूसरी शादी
मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरिया) के मुताबिक एक मुस्लिम को अधिकतम चार शादियों की अनुमति है, लेकिन विशेष विवाह अधिनियम, 1954 (Special Marriage Act, 1954) के तहत संपन्न या पंजीकृत हुई शादी के मामले में मुस्लिम और हिंदू दोनों के एक प्रावधान हैं और दोनों के लिए कानून अधिकार भी समान हो जाते है, दोनों पहली पत्नी को तलाक दिए बिना दूसरी शादी नहीं कर सकते हैं.
शरिया के तहत मुस्लिम को अधिकतम 4 शादी करने की अनुमति है
गौरतलब है हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत हिंदू व्यक्ति कानूनी रूप से केवल एक ही शादी कर सकता है, अगर वह दूसरी शादी करता है तो दूसरी शादी अवैध मानी जाती है. इसी तरह मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरिया) के तहत मुस्लिम युवक को अधिकतम चार शादी करने की कानूनी अनुमति है. हालांकि यह नियम मुस्लिमों में सिर्फ पुरुषों तक ही सीमित है.
ये भी पढ़ें-फिल्मी है ये लव स्टोरी! प्यार हुआ, जेल गए, फिर सुप्रीम कोर्ट ने खुद कराई दो प्रेमियों की 'हैप्पी वेडिंग'
ये भी पढ़ें-तलाक की तारीख पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, पति के एलान की तारीख ही मानी जाएगी आखिरी
एक धर्मनिरपेक्ष (Secular) कानून है विशेष विवाह अधिनियम, 1954
दरअसल, विशेष विवाह अधिनियम 1954 एक धर्मनिरपेक्ष कानून है. कोई मुस्लिम इस कानून के दायरे में शादी पंजीकृत करवाता है, तो उसके व्यक्तिगत धार्मिक कानून (जैसे मुस्लिम पर्सनल लॉ) निष्प्रभावी हो जाते हैं. एक विवाह (Monogamy) की अनिवार्य शर्त वाले इस अधिनियम की धारा 4(a) स्पष्ट रूप से प्रावधान है कि विवाह के समय दोनों पक्षों (वर और वधू) में से किसी का भी कोई जीवित जीवनसाथी (पति या पत्नी) नहीं होना चाहिए.
शादी के बाद निष्प्रभावी हो जाते हैं मुस्लिम के निजी धार्मिक अधिकार
उल्लेखनीय है मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरिया) के तहत एक मुस्लिम युवक को चार शादियां करने की अनुमति है, लेकिन अगर मुस्लिम पुरुष ने अपनी पहली शादी विशेष विवाह अधिनियम के तहत की है, तो पहली पत्नी को कानूनी तलाक दिए बिना वह दूसरी शादी नहीं कर सकता. अगर वह दूसरी शादी करता है तो अधिनियम की धारा 24 के तहत दूसरी शादी कानूनी रूप से अमान्य (शून्य) मानी जाएगी.
ये भी पढ़ें-मियां-बीवी राजी, तो खत्म शादी, मुस्लिमों में 'मुबारात' क्या है?
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं